लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर प्रदीप कुमार और उनकी टीम ने रसोई के जैविक कचरे और पशुओं के गोबर से सस्ती स्वच्छ ऊर्जा बनाने का आसान तरीका खोजा है। अरुणाचल प्रदेश के नॉर्थ ईस्टर्न रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (एनईआरआईएसटी) समेत अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ किए गए इस शोध से ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस उत्पादन की नई राह खुली है।
अध्ययन में सामने आया कि रसोई के कचरे और गोबर को 1:1 अनुपात में मिलाकर अवायवीय पाचन कराने पर गैस का उत्पादन बढ़ जाता है। इस मिश्रण से अधिकतम 68.4 फीसदी मीथेन प्राप्त हुई। गैस का सर्वाधिक उत्पादन प्रक्रिया के छठे से 12वें दिन के बीच दर्ज किया गया।
सामान्य तापमान पर मिली सफलता
शोध की खास बात यह रही कि प्रयोग 22 से 24 डिग्री सेल्सियस के सामान्य तापमान में किया गया। इसके लिए किसी महंगे लैब कंट्रोल की जरूरत नहीं पड़ी। जीवाणुओं की सक्रियता से जैविक कचरे का अपघटन हुआ और लगातार बायोगैस का उत्पादन होता रहा।
गांवों के लिए उपयोगी
ग्रामीण क्षेत्रों में रसोई का जैविक कचरा और पशुओं का गोबर आसानी से उपलब्ध होता है। इस तकनीक से कचरे का बेहतर निस्तारण होने के साथ खाना पकाने और बिजली उत्पादन के लिए स्थानीय स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा मिल सकेगी।
भविष्य में इसे बड़े स्तर पर लागू करने के लिए और परीक्षण किए जाएंगे, ताकि गांव-गांव तक इस तकनीक का लाभ पहुंचाया जा सके।
-प्रो. प्रदीप कुमार