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UP News: 4.5 लाख हेक्टेयर वन भूमि का अधिग्रहण अधूरा, दशकों से प्रक्रिया अटकी; अधिसूचना हो चुकी है जारी

Sun, 31 May 2026 08:31 AM IST
Bhupendra Singh अजित बिसारिया, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी में 4.5 लाख हेक्टेयर वन भूमि का अधिग्रहण अधूरा है। दशकों से इसकी प्रक्रिया अटकी है। जबकि, धारा-4 की अधिसूचना जारी हो चुकी है। अभी एफएसओ कोर्ट में हजारों दावे और आपत्तियां लंबित हैं। आगे पढ़ें पूरी खबर...
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सांकेतिक इमेज। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश में वन विभाग की करीब 4.59 लाख हेक्टेयर भूमि पर अब तक सरकारी स्वामित्व की अंतिम मुहर नहीं लग पाई है। भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा-4 (प्रारंभिक अधिसूचना) के तहत इन जमीनों को आरक्षित वन घोषित करने की प्रक्रिया वर्षों पहले शुरू हुई थी लेकिन लंबित दावों और आपत्तियों के कारण ज्यादातर भूमि अब भी धारा-20 की अंतिम अधिसूचना तक नहीं पहुंच सकी है। ये मामले जिलों में तैनात वन व्यवस्थापन अधिकारियों (एफएसओ) के यहां लंबित हैं। नतीजतन प्रदेश में वन भूमि अधिग्रहण की बड़ी प्रक्रिया दशकों बाद भी अधूरी है।
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वन विभाग ने 1952 के बाद से अब तक प्रदेश में धारा-4 के तहत 1223718.26 हेक्टेयर जमीन लेने का इरादा जाहिर किया है। यह प्रक्रिया विभिन्न चरणों से होते हुए तब पूरी होती है जब धारा-20 की अधिसूचना जारी होती है। इसमें भूमि अंतिम रूप से वन भूमि के रूप में दर्ज हो जाती है। इस अधिसूचना में वन की सटीक सीमाएं तय की जाती हैं और यह स्पष्ट कर दिया जाता है कि बिना अनुमति के उस भूमि पर प्रवेश, पेड़ काटना या मवेशी चराना दंडनीय अपराध है।

आपत्तियों की सुनवाई एफएसओ कोर्ट में होती है

धारा-4 की प्रारंभिक अधिसूचनाएं मिर्जापुर, सोनभद्र, लखनऊ, सीतापुर, उन्नाव, लखीमपुर खीरी, सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद और अमरोहा समेत प्रदेश के अधिकतर जिलों में जारी की जा चुकी हैं। अधिसूचना जारी होने के बाद स्थानीय लोगों के दावों और आपत्तियों की सुनवाई एफएसओ कोर्ट में होती है। वन विभाग ने धारा-4 के तहत जो प्रारंभिक अधिसूचना जारी की है उसमें से 705780.36 हेक्टेयर भूमि ही धारा-20 में विज्ञापित की गई है। 458829 हेक्टेयर भूमि अब भी धारा-4 से धारा-20 के बीच की प्रक्रिया में है। 59108 हेक्टेयर भूमि स्थानीय लोगों के पक्ष में छोड़ी जा चुकी है।

नियमित पैरवी और समीक्षा जरूरी

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक लंबित प्रकरणों के निपटारे के लिए अतिरिक्त चार्ज के रूप में नहीं, बल्कि समर्पित एफएसओ तैनात करने की जरूरत है। अधिकारियों को भी अपने स्तर पर नियमित पैरवी और समीक्षा करनी होगी। वन विभागाध्यक्ष सुनील कुमार चौधरी कहते हैं कि इन जमीनों के मामले धारा-4 से धारा-17 के बीच प्रक्रियाधीन हैं। संबंधित प्रभागीय वनाधिकारी स्थानीय एफएसओ कोर्ट में पैरवी कर रहे हैं।

ये है धारा-4 और धारा-20 के बीच की प्रक्रिया

धारा-5 : धारा 4 की अधिसूचना जारी होने के बाद उस भूमि पर कोई भी नया अधिकार (जैसे जमीन खरीदना, नया निर्माण, या खेती शुरू करना) तब तक नहीं हो सकता जब तक कि वो उत्तराधिकार या सरकार की लिखित अनुमति से न मिला हो।

धारा 6 (घोषणा) : एफएसओ स्थानीय भाषा में नोटिस जारी कर लोगों से 3 से 6 महीने में अपने दावों (जैसे- खेती, रास्ता, मवेशी चराने या वन उपज का अधिकार) को पेश करने को कहता है।
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धारा 11 (भूमि के अधिग्रहण की शक्ति) : यदि एफएसओ किसी व्यक्ति के जमीन या निजी अधिकार के दावे को स्वीकार कर लेता है तो उसके पास तीन रास्ते होते हैं-उस जमीन को प्रस्तावित वन सीमा से बाहर कर दे। मालिक के साथ समझौता करके उसके अधिकार ले ले। भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत उस भूमि का अधिग्रहण करे और मालिक को मुआवजा दे।

धारा 17 व 18 (अपील) : यदि कोई व्यक्ति एफएसओ के मुआवजे या जमीन अधिग्रहण के फैसले से संतुष्ट नहीं है तो वह इसके खिलाफ निर्धारित अवधि में जिला जज या राजस्व प्राधिकरण के पास अपील कर सकता है।

धारा 20 : यह पूरी प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है। जब धारा 6 के तहत दावों की अवधि समाप्त हो जाती है तो एफएसओ सभी दावों (धारा 11 से 16) का निपटारा कर देता है। अगर कोई अपील (धारा 17) की गई थी तो उसका भी फैसला आ जाता है, तब राज्य सरकार इस धारा का उपयोग करती है। इसमें सरकार आधिकारिक अधिसूचना जारी कर उस वन को आरक्षित वन घोषित कर देती है। इस तरह से धारा 20 सभी विवादों व अधिग्रहणों के निपटारे के बाद सरकारी स्वामित्व की अंतिम मुहर है।
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