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सद्भाव की अयोध्या जहां डाल-डाल अल्लाह लिखा है, पात-पात पर राम... संतों ने दिया मानवता का संदेश

धीरेंद्र सिंह/अमर उजाला, अयोध्या Published by: ishwar ashish Updated Sat, 09 Nov 2019 09:39 AM IST
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अंबेडकरनगर के अहिरौली में गोविंद साहेब की समाधि (बायें) व अयोध्या में संत पलटू राम की समाधि स्थल। - फोटो : amar ujala

डाल-डाल अल्लाह लिखा है, पात-पात पर राम। कौन चिरैया असगुन बोली, जंगल जरा तमाम। ...कट्टरता के खिलाफ यह आवाज 18वीं शताब्दी में अयोध्या की संत परंपरा के दूसरे कबीर कहे गए संत पलटू साहब ने उठाई थी।

विवादित परिसर में विराजमान रामलला को लेकर जहां सुप्रीमकोर्ट से निर्णय की प्रतीक्षा है वहीं ठीक चंद कदम दूर रामकोट में पलटू साहब का अखाड़ा भी बना है जो अयोध्या में सद्भाव का प्रतीक है।


ऐसे निर्गुणोपासक तमाम संतों ने अयोध्या की भूमि पर सदियों से राष्ट्रीय-सामाजिक जागरण के साथ सौहार्द की परंपरा संजोए रखी। यहां संत रविदास, कबीरदास, साईंदाता आदि की शिष्य परंपरा भी खूब फली-फूली।

अयोध्या में भगवान श्रीराम के शील-भक्ति समन्वित लोक मंगलकारी स्वरूप की प्रतिष्ठा रही है। लेकिनरसिकोपासना से बदले हालात के मद्देनजर जन साधारण में धार्मिक, सामाजिक चेतना का संचार करने के उद्देश्य से यहां निर्गुणोपासक संत सामाजिक जागरण के लिए आगे आए।

इसी दौर में नानकसाही संत श्रीचंद ने रानोपाली में उदासीन पंथ, गोविंदसाहब के शिष्य पलटू साहब ने रामकोट में अखाड़ा और संत रविदास की शिष्य परंपरा ने अपना स्थान हनुमान कुंड वार्ड में स्थापित किया। अयोध्या के आगे जियनपुर गांव में कबीरपंथी मठ स्थापित है।

जिले के जनौरा, मिल्कीपुर, मीठेगांव, नौली-दसौली आदि स्थानों पर साईंदाता संप्रदाय के प्रवर्तक संत मोहनशाह की शिष्य परंपरा का विस्तार हुआ है। यहां अहमकशाह, सचनाशाह, विजनशाह, महानंदशाह, शाह बालाशाह, पृथ्वीशाह आदि अवधी के श्रेष्ठ वाणीकर संत हुए थे।

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अंबेडकरनगर के अहिरौली में गोविंद साहेब की समाधि (बायें) व अयोध्या में संत पलटू राम की समाधि स्थल। - फोटो : amar ujala
डाल-डाल अल्लाह लिखा है, पात-पात पर राम। कौन चिरैया असगुन बोली, जंगल जरा तमाम। ...कट्टरता के खिलाफ यह आवाज 18वीं शताब्दी में अयोध्या की संत परंपरा के दूसरे कबीर कहे गए संत पलटू साहब ने उठाई थी।

विवादित परिसर में विराजमान रामलला को लेकर जहां सुप्रीमकोर्ट से निर्णय की प्रतीक्षा है वहीं ठीक चंद कदम दूर रामकोट में पलटू साहब का अखाड़ा भी बना है जो अयोध्या में सद्भाव का प्रतीक है।
ऐसे निर्गुणोपासक तमाम संतों ने अयोध्या की भूमि पर सदियों से राष्ट्रीय-सामाजिक जागरण के साथ सौहार्द की परंपरा संजोए रखी। यहां संत रविदास, कबीरदास, साईंदाता आदि की शिष्य परंपरा भी खूब फली-फूली।

अयोध्या में भगवान श्रीराम के शील-भक्ति समन्वित लोक मंगलकारी स्वरूप की प्रतिष्ठा रही है। लेकिनरसिकोपासना से बदले हालात के मद्देनजर जन साधारण में धार्मिक, सामाजिक चेतना का संचार करने के उद्देश्य से यहां निर्गुणोपासक संत सामाजिक जागरण के लिए आगे आए।

इसी दौर में नानकसाही संत श्रीचंद ने रानोपाली में उदासीन पंथ, गोविंदसाहब के शिष्य पलटू साहब ने रामकोट में अखाड़ा और संत रविदास की शिष्य परंपरा ने अपना स्थान हनुमान कुंड वार्ड में स्थापित किया। अयोध्या के आगे जियनपुर गांव में कबीरपंथी मठ स्थापित है।

जिले के जनौरा, मिल्कीपुर, मीठेगांव, नौली-दसौली आदि स्थानों पर साईंदाता संप्रदाय के प्रवर्तक संत मोहनशाह की शिष्य परंपरा का विस्तार हुआ है। यहां अहमकशाह, सचनाशाह, विजनशाह, महानंदशाह, शाह बालाशाह, पृथ्वीशाह आदि अवधी के श्रेष्ठ वाणीकर संत हुए थे।

संतों के दखल से रुका जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन

बाराबंकी जिले के कोटवा, कमोली, मधनापुर, हरचंदपुर, उमापुर समेत रायबरेली जिले के धर्मेधाम, लखनऊ के समेसी गांव में सतनामी संप्रदाय के जगजीवन साहब व उनकी शिष्य परंपरा का विस्तार हुआ। इस संप्रदाय से जगजीवन साहब, गोसाईंदास, दूलनदास, देवीदास, ख्यामदास, नवलदास जैसे अवधी भाषा के श्रेष्ठ रचनाकार संत हुए हैं।

रामनगरी के रानोपाली में स्थित उदासीन संगत ऋषि आश्रम के महंत डॉ स्वामी भरत दास कहते हैं कि जगतगुरु आचार्य श्रीचंद ने उदासीन पंथ की स्थापना की थी। वे कहते थे- वाद-विवाद मिटाओ आपा..। जब मुगल आक्रांताओं का कहर लाहौर व पंजाब में बढ़ा और जबरदस्ती हिंदुओं को मुसलमान बनाने लगे, तब श्रीचंद जी ने अपने चमत्कार से इसे रोकने का काम किया। मुगल शरणागत हुए और जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन रुका और आचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा की।

पहले फैजाबाद अब अंबेडकरनगर के पूर्वी छोर पर स्थित अहिरौली गांव में गोविंदसाहब का अविर्भाव हुआ। वे गुलाबपंथी संत कहलाए। गोविंदसाहब मठ के महंत भगेलू दास कहते हैं कि महान संत महात्मा गोविन्द साहब का जन्म अंबेडकरनगर जिले के जलालपुर कस्बे में भारद्वाज गोत्रीय सरयूपारी ब्राह्मण कुल में संवत 1782 के अगहन मास शुक्ल पक्ष की दशमी को पृथुधर द्विवेदी व दुलारी देवी के पुत्र के रूप में हुआ था।

इंसानियत के हो रहे कत्लेआम और मानवीय आदर्शों की लुटती गरिमा के विरूद्ध कौमी एकता और आपसी सौहार्द व सद्भाव का संदेश देने वाले इस सिद्ध पुरूष ने गाजीपुर जिले के भुड़कुड़ा में संत भीखा दास से दीक्षा ली थी।

अहिरौली गांव में उनकी साधना भूमि गोविंदसाहब मठ पर हिंदू-मुसलमान दोनों आते हैं, और उनकी मुरादें पूरी होती है। यहां अगहन दशमी से एक माह तक मेला में लाखों भक्त दर्शन व खिचड़ी चढ़ाने आते हैं। वे बताते हैं कि सैय्यद हजरत मखदूम अशरफ सिमनानी किछौछवी व संत पलटूदास से इनका जबरदस्त शास्त्रार्थ हुआ था, इसके बाद दोनों ने शिष्यत्व स्वीकार कर इनकी महानता बखानी।

सूफी-संतों ने दिया मानवता का संदेश

गोविंद साहब स्थान के पास ही उनके शिष्य पलटू साहेब की समाधि है, यहां के महंत दिलीप दास कहते हैं कि- हिंदू पूजा देवगड़ा, मुसलमान मसजिद/पलटू पूजै बोलता, खायदीद बरदीद..। पलटू साहब की ख्याति दूसरे कबीर के रूप में है। इनकी वाणी में वैसी ही स्पष्टवादिता और अक्खड़पन देखने को मिलता है, जैसा कबीर की वाणियों में है।

अवधी साहित्य पर काफी कुछ लिखने वाले लखनऊ में रह रहे सेवानिवृत शिक्षक डॉ रामबहादुर मिश्र कहते हैं कि अयोध्या की भूमि से तमाम सूफी-संतों ने सद्भाव व मानवता के संदेश दिए हैं। कबीर की निर्गुण भक्तिधारा सगुणोपासकों की प्रधान नगरी अयोध्या में भी प्रवाहित है।

रामसूरत साहब ने करीब पांच दशक पूर्व रामनगरी के आग्नेय कोण पर ज्ञान मार्गी भक्ति की लौ रोशन की। बताते हैं कि डॉ सत्यप्रकाश त्रिपाठी, डॉ जनार्दन उपाध्याय, प्रो. गौरीशंकर पांडेय, डा. रामशंकर त्रिपाठी, डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित आदि ने शोध परक लेख लिखे हैं।

साकेत पीजी कालेज के प्राचार्य रहे राधिका प्रसाद त्रिपाठी ने गोविंद साहब समेत तमाम संतों की बिखरी पड़ी रचनाओं को आकार दिया था।
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