डाल-डाल अल्लाह लिखा है, पात-पात पर राम। कौन चिरैया असगुन बोली, जंगल जरा तमाम। ...कट्टरता के खिलाफ यह आवाज 18वीं शताब्दी में अयोध्या की संत परंपरा के दूसरे कबीर कहे गए संत पलटू साहब ने उठाई थी।
विवादित परिसर में विराजमान रामलला को लेकर जहां सुप्रीमकोर्ट से निर्णय की प्रतीक्षा है वहीं ठीक चंद कदम दूर रामकोट में पलटू साहब का अखाड़ा भी बना है जो अयोध्या में सद्भाव का प्रतीक है।
ऐसे निर्गुणोपासक तमाम संतों ने अयोध्या की भूमि पर सदियों से राष्ट्रीय-सामाजिक जागरण के साथ सौहार्द की परंपरा संजोए रखी। यहां संत रविदास, कबीरदास, साईंदाता आदि की शिष्य परंपरा भी खूब फली-फूली।
अयोध्या में भगवान श्रीराम के शील-भक्ति समन्वित लोक मंगलकारी स्वरूप की प्रतिष्ठा रही है। लेकिनरसिकोपासना से बदले हालात के मद्देनजर जन साधारण में धार्मिक, सामाजिक चेतना का संचार करने के उद्देश्य से यहां निर्गुणोपासक संत सामाजिक जागरण के लिए आगे आए।
इसी दौर में नानकसाही संत श्रीचंद ने रानोपाली में उदासीन पंथ, गोविंदसाहब के शिष्य पलटू साहब ने रामकोट में अखाड़ा और संत रविदास की शिष्य परंपरा ने अपना स्थान हनुमान कुंड वार्ड में स्थापित किया। अयोध्या के आगे जियनपुर गांव में कबीरपंथी मठ स्थापित है।
जिले के जनौरा, मिल्कीपुर, मीठेगांव, नौली-दसौली आदि स्थानों पर साईंदाता संप्रदाय के प्रवर्तक संत मोहनशाह की शिष्य परंपरा का विस्तार हुआ है। यहां अहमकशाह, सचनाशाह, विजनशाह, महानंदशाह, शाह बालाशाह, पृथ्वीशाह आदि अवधी के श्रेष्ठ वाणीकर संत हुए थे।