गांव के काम-धाम से जुड़े एक बड़े अफसर इसी 30 सितंबर को रिटायर होने वाले हैं। सोच रहे थे कि, गांव पहुंचने के पहले वहां कुछ ऐसा कर लेंगे कि, नौकरी भर गांव न जाने का दंश न झेलना पड़े।
और कुछ न सही, दुआ-सलाम, नमस्ते, बंदगी तो कम से कम वहां भी मिलती रहे। इसी सोच में बतौर आला हाकिम अपने जिले और गांव में निरीक्षण की योजना बनाई।
दो मौका निकाला, दोनों ही बार झगड़े की नौबत। उन्हें अंदाजा हो गया कि, चाहे जितना बड़का साहब हो जाएं, अपने गांव में हुक्म नहीं चलेगा।
खैर, महकमे के मातहत अफसरों से जब भी साबका होता है एक ही निर्देश देते, गांव में सारी सुविधाएं हो जानी चाहिए। छोटे-मोटे कुछ काम होने शुरू हुए तो गांव वालों की भीड़ सचिवालय तक आने लगी।
जहां काम शुरू हुए वहां शिकायत का अंबार। साहब को पता चल गया कि गांवों में काम कितनी मुश्किल से होता है और विवाद कितनी जल्दी पीछा पकड़ लेता है। पांच-छह महीने में ही गांव की राजनीति से आजिज आए साहब को अब जाकर सुकून मिल पाया है।
वजह, उस विभाग से तबादला जो हो गया। अब गांव वाले आते हैं तो उन्हें समझा देते हैं कि, वह विभाग चला गया...अफसर से बात करनी पड़ेगी।