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नोट बंदी के बाद क्या हैं नेपाल बॉर्डर पर हालात, पढ़ें इस LIVE रिपोर्ट में

Sat, 26 Nov 2016 06:50 PM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
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नेपाल बॉर्डर - फोटो : amar ujala
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नौगढ़, सिद्धार्थनगर में उसका रोड पर स्टेट बैंक की शाखा पर गुरुवार को सुबह करीब पौने आठ बजे करीब 15 लोगों की लाइन लगी है। दूसरे या तीसरे नंबर पर खड़े हैं रिटायर्ड टीचर परमात्मा प्रसाद चौधरी। चौधरी, नौगढ़ से करीब 12 किलोमीटर दूर बजहा बाजार के करीब रमवापुर गांव से चलकर सुबह 6 बजे ही लाइन में लग गए। 
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चूंकि वह दूसरे नंबर पर हैं इसलिए उन्हें पूरा भरोसा है कि दस बजे जब बैंक खुलेगा तो उन्हें अपने खाते से 2 हजार रुपये जरूर मिल जाएंगे। कैश सप्लाई में कमी की वजह से यह बैंक पिछले कई दिनों से अपने ग्राहकों को दो हजार ही दे पा रहा है। 

लोग बताते हैं कल तक आधी रात के बाद 2 बजे से ही लाइन लगनी शुरू हो जाती थी। करीब एक किलोमीटर लंबी लाइन को निपटाते- निपटाते बैंक में शाम हो जाती है। बैंक में पैसे खत्म हो जाते हैं लेकिन लाइन खत्म नहीं होती। रुपये नहीं मिलने से निराश लोग फिर दूसरे दिन पहले दिन की अपेक्षा जल्दी आकर लाइन में लग जाते हैं। 
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इस लाइन में आगे खड़े कई लोग दूसरी बार कतार में हैं। बैंकों में हो रही दिक्कतों से परेशान लोग कुछ लोग अव्यवस्था के लिए सरकार को कोस रहे हैं तो कुछ ऐसे भी मिले जो कह रहे हैं ये दिक्कतें अब जल्दी ही खतम हो जाएंगी। पांच सौ के नोट आने के बाद बाजार को भी राहत मिलने की उम्मीद की जा रही है। फिलहाल सौ रुपये से ऊपर के केवल 2000 के नोट ही उपलब्ध होने से कई समस्याएं हो रही हैं। 

होटल के मैनेजर शैलेंद्र कुमार सिंह कहते हैं, अभी भले लोगों को थोड़ी बहुत दिक्कत हो रही है लेकिन इसके बाद जो हालात बनेंगे उससे सबको सुकून मिलने वाला है। महंगाई पर रोक लगेगी। बैंकों का ब्याज कम होगा। तब जाकर सबको लगेगा कि सरकार का यह फैसला कितना सही था।

संभाल कर खर्च करने पड़ रहे हैं पैसे

नेपाल बॉर्डर - फोटो : amar ujala
शैलेंद्र मानते हैं कि नोटबंदी से सबके कामकाज पर असर पड़ा है। होटल में भी कम कस्टमर आ रहे हैं। आ भी रहे हैं तो पैसे कम खर्च कर रहे हैं या संभल कर रहे हैं। नकद की दिक्कत है। शहर के एक बड़े बेकर्स धीरज कहते हैं हमारा काम 30 फीसदी रह गया है। 

धीरज होटलों में बेकरी उत्पाद की बल्क सप्लाई का काम करते हैं। कहते हैं थोक मांग कम हो गई है। हमारा रिटेल कारोबार भी मंदा हो गया है। लेकिन वे भी काले धन के खिलाफ सरकार के इस फैसले के साथ दिखे। कहते हैं, काला धन वाले ऐसे ही थोड़े हिल गए हैं। सही व्यवस्था बनाने के लिए कड़ा फैसला तो करना ही पड़ता है।

लेकिन उसका रोड पर बैंक की लाइन में खड़े इकबाल अहमद इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि सरकार ने यह फैसला करते हुए लोगों की दिक्कतों का ख्याल नहीं किया। रही बात काले धन की तो वे इस बात से मुतमईन नहीं दिखते कि इस तरह काले धन की समस्या का अंत हो जाएगा। वे एक देहाती कहावत का हवाला देते हैं, तू जईब घर से हम निकलब तड़ (भीतर) से। 

कहते हैं जिस तरह बोए गए बीज खेतों में अचानक ही पौध के रूप में किसान केसामने होता है वैसे ही ये काला धन फिर से उग आएगा। बैंकों के सामने दिन भर खड़ी लंबी लाइनों में इसी तरह की बातें और बहस होती रहती है। इन बहसों का अंत इसी बात से होता है कि देखें इस कठिनाई केबाद कैसी व्यवस्था सामने आती है?

लाइन लंबी, पैसे कम

बैंको के बाहर लगी भीड़ - फोटो : amar ujala
लुम्बिनी रोड पर रेडिमेड का कारोबार करने वाले कमलेश कहते हैं, यह मोदी का साहसिक फैसला है। हम उनके साथ हैं। ये हिम्मत का काम है। हमें कारोबार करने का तौर तरीका बदलना होगा। अधिक से अधिक ट्रांजेक्शन कार्ड के जरिए होगा तो व्यवसाय में भी साफगोई आएगी। आमतौर पर व्यापारियों को टैक्स चोर समझा जाता है। हम जब साफ-सुधरा धंधा करने लगेंगे तो अपना मार्जिन रखकर ही सौदा करेंगे। लेकिन काला धन बाजार खतम हो गया तो सोचिए लोगों को कितना फायदा होगा।

लेकिन सभी व्यापारी मोदी के इस फैसले से खुश हैं ऐसा भी नहीं। सबसे ज्यादा मार ज्वैलर्स के धंधे पर पड़ा है। लुम्बिनी रोड पर शाम होते ही कसौधन ज्वैलर्स, दिव्यांश ज्वैलर्स और कई दुकानें बंद मिलीं। इस सड़क पर ज्वैलर्स की दूसरी कई और दुकानें हैं लेकिन सहालग के बावजूद वहां कस्टमर दिखे नहीं। जाहिर है सोने-चांदी के धंधे में भारी गिरावट है। 

स्टेशनर्स की दुकान चलाने वाले मनमोहन सिंह नोटबंदी को छोटेे कारोबारियों पर बज्रपात बताते हैं। कहते हैं, सेल गिरकर आठ सौ और हजार रह गया है। आप समझ सकते हैं कि औसत 10 से 15 परसेंट के धंधे वाले लोग किस तरह अपना घर चला पाएंगे। मोदी कोई भी फैसला करते हुए अपने मंत्रियों की भी नहीं सुनते। अगर उनकी सरकार केतीन साल पूरे हो गए होते तो इस फैसले के बाद उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ जाता।

नौगढ़ से नेपाल सीमा की ओर जाने वाली सड़क पर एक कस्बा है बर्डपुर। बर्डपुर में भी पर करीब नौ बजे तक स्टेट बैंक के सामने दो सौ से अधिक लोगों की लाइन लगी है। यहां लाइन में खड़े एक ग्रामीण जहीर मियां बताते हैं, यहां हर रोज इसी तरह लंबी लंबी लाइन लग रही है। बैंक के पास पैसे कम पड़ जाते हैं।
 
सभी को पैसे मिल नहीं पा रहे। कल लाइन में लगे लोगों को तीन बजे तक दो-दो हजार मिले आज पहले ही बैंक की ओर से ऐलान हो गया है सभी को केवल एक हजार दिए जाएंगे। देखिए आज हजार-हजार रुपये कितने को मिल जाते हैं। दस बजते-बजते ये लाइन और लंबी हो जाएगी। सबको तो पैसा नहीं ही मिल पाएगा।
लाइन से एक सज्जन सवाल उछालते हैं शादी-बियाह वाला घर में तो और तबाही है। 

लाइन में खड़े लोग लोगों को होने वाली तरह तरह की दिक्कतों का जिक्र करने लग जाते हैं। एक बुजुर्ग कहने लगता है, जिसकी रिश्तेदारी में शादी है, उसे भी तो पैसे की जररूत होगी। बैंक से पूरे रुपये निकल ही नहीं पा रहे। लोग क्या करें। देखिए इस दिक्कत के बाद यदि कुछ अच्छा हो जाए तो ठीक है वरना मोदी की सरकार को इसका खामियाजा तो भुगतना ही होगा।

भविष्य को लेकर तरह तरह की आशंकाएं

भव‌िष्य को लेकर लोग परेशान - फोटो : amar ujala
लाइनों में बात केवल पैसे मिलने की समस्या पर नहीं हो रही। पूरे सिस्टम को मथा जा रहा है। समस्या पर बातचीत शुरू करते ही लोग सवाल उठा रहे हैं कि अभी ये समझ में ही नहीं आ रहा है कि आगे सिस्टम क्या बनेगा? लोग खरीददारी कार्ड से करेंगे कि बैंक पूरा पैसे देने लग जाएगा और सब कुछ ऐसे ही चलेगा जैसे आजतक चलता आया है। 

वे सवाल करते हैं आप ही बताइए ये सब कब तक ठीक होगा। आखिर आदमी कब तक अपने ही पैसे केलिए बैंक के चक्कर लगाएगा। कोई कब तक सब्र करेगा। पैसा तो हर कदम पर जरूरी है। बांसी में बैंक की लाइन में खड़े दिनेश्वर प्रसाद कहते हैं पांच आदमी का परिवार है तो सबको अपने अपने काम के लिए पैसा चाहिए। अभी तो घर में सबके नाम से अकाउंट भी नहीं है। एक और दो हजार में पांच आदमी के परिवार का सारा खर्चा उठाना मुश्किल है। सब ठप है। किसी तरह सब्जी भाजी करके घर चल रहा है।
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सीमाई कस्बे में नेपाली नोट बन गया है सहारा

नेपाली नोट का सहारा - फोटो : amar ujala
नेपाल ने भले ही भारतीय नोटों पर पाबंदी लगा दी है लेकिन नोटबंदी ने सीमावर्ती भारतीय इलाकों में नेपाली नोट बाजार और कारोबार का फौरी सहारा बन गए हैं। नेपाल सीमा पर आखिरी भारतीय कस्बा अलीगढ़वा में आमतौर पर अधिकतर व्यापारी नेपाली नोट स्वीकर करते हैं। 

नेपाल के100 रुपये की भारतीय कीमत बैंकों में 62.50 रुपये है लेकिन व्यापारी इसे 60 रुपये के बदले धड़ल्ले से स्वीकार करते हैं। इस तरह नेपाल के 500 के नोटों की बाजार कीमत 300 भारतीय रुपये है. दरअसल अलीगढ़वा का बाजार आसपास केभारतीय गांवों केसाथ ही नेपाल की सीमा के भीतर के लोगों की जरूरतों को पूरा करता है। 

ऐसे में यहां अधिकतर व्यापारी नेपाली नोटों को स्वीकार करते हैं, जिन्हें वे नेपाल में जाकर बदल लेते हैं। अब जबकि सौ के ऊपर भारत में कोई बड़ा नोट नहीं है तो नेपाली पांच सौ का नोट तीन सौ के बदले उनके बहुत काम आ रहा है।
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