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Lucknow News: कोशल साहित्य महोत्सव में सजी कला-संस्कृति की महफिल

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कोशल साहित्य महोत्सव में सजी कला-संस्कृति की महफिल
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लखनऊ। तहजीब और रचनात्मकता की राजधानी लखनऊ में बृहस्पतिवार को कोशल साहित्य महोत्सव के चौथे संस्करण की शुरुआत हुई। यूपी दर्शन पार्क में आयोजित इस चार दिवसीय उत्सव में साहित्य, कला, लोक-संस्कृति और संवाद का बेहतरीन संगम देखने को मिला। शहर के लेखक, कलाकार, शोधकर्ता और युवा साहित्य-प्रेमियों की मौजूदगी ने पहले दिन के माहौल को जीवंत बना दिया।
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उद्घाटन सत्र में शिक्षाविद डॉ. निशी पांडे, रंगकर्मी संदीप यादव, उद्यमी व फिल्म निर्माता अजय जैन और महोत्सव के संस्थापक प्रशांत कुमार सिंह ने बदलते समय में साहित्य की भूमिका, लोककलाओं के पुनरुत्थान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर अपने विचार व्यक्त किए।

कव्वाली महज संगीत नहीं दिलों को जोड़ने वाली भाषा है
कव्वाली और सूफी संगीत, सरहद से परे दिलों को जोड़ने वाली भाषा है। कव्वाली में करुणा और आध्यात्मिकता शामिल है। राॅकस्टार जैसी कई फिल्मों की पहचान उनमें शामिल- ''कुन फाया कुन'' जैसे सूफी संगीत और कव्वाली की वजह से है। ये बातें कोशल साहित्य महोत्सव के शुरुआती सत्र में प्रसिद्ध नृत्यांगना और सांस्कृतिक शोधकर्ता मंजरी चतुर्वेदी ने कहीं। मंच पर माैजूद कव्वाल गुफरान ने इस माैके पर- भर दे झोली, ख्वाजा मेरे ख्वाजा और अमीर खुसरो की- छाप तिलक सब छीनी जैसी कव्वाली सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया। देवांशी सेठ से बातचीत में मंजरी चतुर्वेदी ने कहा कि दुर्भाग्य है कि बाॅलीवुड में कव्वाली अब कव्वाल से नहीं बल्कि किसी से भी गवा देते हैं जो गलत है।
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लखनऊ में बने बाॅलीवुड जैसा सेटअप

दूसरे सत्र- ''लाइट्स, कैमरा, लखनऊ'' के दाैरान बातचीत में बाॅलीवुड के वरिष्ठ अभिनेता व रंगकर्मी डाॅ. अनिल रस्तोगी ने कहा कि कुछ वर्षों से लखनऊ में बहुत सी मशहूर फिल्मों की शूटिंग हुई और उन्हें काफी पसंद किया गया। कई कलाकार यहां से बड़ा नाम और काम कर रहे हैं। ओटीटी के लिए भी तमाम सीरीज यहां बन रही हैं। अब लखनऊ में भी बाॅलीवुड जैसा सेटअप होना चाहिए। इस सत्र में सिनेमा, रंगमंच और मंचीय कलाओं पर लखनऊ की अमिट छाप पर गंभीर चर्चा हुई। संदीप यादव, अर्चना शुक्ला, अनिल रस्तोगी व देवाशीष मिश्रा ने कहा कि लखनऊ की नजाकत, ऐतिहासिकता और कहानी कहने की शैली भारतीय कलाओं को एक अलग आयाम दे रही है।

करीब से समझा है हिंदू-मुस्लिम के बीच का विरोधाभास
तीसरे सत्र में ''द हिंदी हार्टलैंड'' पर चर्चा हुई। लेखिका गजाला वहाब ने समाजसेवी जयंत कृष्णा व ज्योत्सना मोहन के सवालों के जवाब दिए। ज्योत्सना मोहन ने कहा कि कई बार लेखकों के लिए ऐसा होता है कि जहां लेखन की शुरुआत करते हैं और जहां समापन होता है, उसमें काफी दूरी हो जाती है। इस पर गजाला वहाब ने कहा कि वर्ष 2019 में दिल्ली में हुए प्रोटेस्ट से शुरुआत की। हिंदू और मुस्लिमों के बीच जो विरोधाभास है, उस पर भी काम किया। उसे करीब से समझा। सत्र में हिंदी हृदयभूमि के सांस्कृतिक, राजनीतिक और जनसांख्यिक महत्व पर गहन चर्चा की, इसमें भारत की तकरीबन 40% आबादी प्रतिनिधित्व करती है।

अलग है लोक कथाओं का रोमांच

लोककथाओं का रोमांच अलग होता है। यह जीवन दर्शन प्रस्तुत करती हैं। ऐसे ही पौराणिक कथाओं में धर्म-अध्यात्म व जीवन के गूढ़ रहस्यों का जो समन्वय मिलता है, वह जीवन का आधार बनता है। पौराणिक कथाओं, लोकथाओं व कहानी के विकास की ऐसी यात्रा पर कोशल महोत्सव के सत्र टेल्स वी कैरी में सुनने को मिला। सत्र में अमर चित्रकथा की संपादक रीना पुरी और लेखिका अश्विता जयकुमार ने अर्श अली के साथ पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं व कहानी की विकास यात्रा पर विचार-विमर्श किया। वक्ताओं ने कहा कि कहानियां स्मृति, पहचान व कल्पना की वाहक होती हैं।

कोशल साहित्य महोत्सव में सजी कला-संस्कृति की महफिल

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