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Lucknow News: 13 बार गर्भपात के बाद जन्मे बच्चे को बिना ओपन सर्जरी दिया नया जीवन

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पीजीआई।
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लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई के डॉक्टरों ने एक बार फिर अपनी चिकित्सा विशेषज्ञता का लोहा मनवाया है। संस्थान के कार्डियोलॉजी और नियोनेटोलॉजी विभाग की टीम ने 34 सप्ताह में जन्मे शिशु के हृदय का छेद (पीडीए) बिना किसी ओपन सर्जरी के बंद करने में सफलता हासिल की है। 76 दिनों तक चले गहन उपचार के बाद अब शिशु पूरी तरह स्वस्थ है और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।
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यह मामला चिकित्सकीय और भावनात्मक, दोनों दृष्टि से जटिल था। कार्डियोलॉजी विभाग के डॉ. अंकित साहू ने बताया कि शिशु की मां का इससे पहले 13 बार गर्भपात हो चुका था। उच्च जोखिम वाली इस गर्भावस्था में फीटल ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन जैसी समस्या भी थी। जन्म के तुरंत बाद शिशु को सांस लेने में गंभीर तकलीफ हुई, जिसके चलते उसे वेंटिलेटर पर रखकर एनआईसीयू में भर्ती किया गया।

जांच में डॉक्टरों ने पाया कि बच्चा पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस (पीडीए) नामक बीमारी से ग्रसित है। इसमें जन्म के बाद बंद होने वाली हृदय की रक्त वाहिका खुली रह जाती है, जिससे फेफड़ों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। दवाओं से सुधार न होने पर डॉक्टरों ने ट्रांसकैथेटर डिवाइस क्लोजर तकनीक से इलाज का निर्णय लिया। 45वें दिन कैथेटर के जरिये बिना कोई चीरा लगाए एक छोटा उपकरण डालकर हृदय की उस वाहिका को बंद कर दिया गया।
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संस्थान के निदेशक डॉ. आरके धीमन ने इस बड़ी उपलब्धि के लिए डॉक्टरों की टीम को बधाई दी है। कार्डियोलॉजी विभाग के डॉ. अंकित साहू ने बताया कि इतने छोटे और प्रीटर्म शिशु में यह प्रक्रिया बेहद चुनौतीपूर्ण थी। सफल इलाज के बाद अब शिशु सामान्य रूप से दूध पी रहा है और उसका वजन भी बढ़ रहा है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम
इस सफलता में हृदय रोग विभाग की टीम का नेतृत्व डॉ. अंकित साहू, डॉ. आदित्य कपूर, सीनियर रेजिडेंट डॉ. बिभास रहे। नियोनेटोलॉजी विभाग की क्लीनिकल टीम में डॉ. फौजिया फरहत, डॉ. अभिषेक पॉल, डॉ. अनीता सिंह, डॉ. आकांक्षा वर्मा, डॉ. आरोही गुप्ता, डॉ. आरके श्वेताभ और सीनियर रेजिडेंट डॉ. अंकिता एवं डॉ. अन्बारसन शामिल रहे।
जानें, क्या है पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस
यह नवजात शिशुओं में होने वाला जन्मजात हृदय दोष है, जिसमें जन्म के बाद डक्टस आर्टेरियोसस नामक रक्त वाहिका बंद नहीं हो पाती है। इसमें महाधमनी और फुफ्फुसीय धमनी के बीच एक खुला जुड़ाव बना रहता है, जिससे फेफड़ों में रक्त का प्रवाह असामान्य हो जाता है और हृदय पर दबाव बढ़ता है। जन्म से पहले, यह वाहिका भ्रूण को फेफड़ों से रक्त को दूर रखने में मदद करती है, लेकिन जन्म के बाद इसे स्वाभाविक रूप से बंद हो जाना चाहिए। जब यह वाहिका जन्म के बाद भी खुली रह जाती है, तो ऑक्सीजन युक्त रक्त शरीर में जाने के बजाय फेफड़ों में वापस चला जाता है।
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