सीतापुर। स्वच्छता के मामले में हम एक बार फिर फिसड्डी साबित हुए। सफाई पर करीब 12 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी रैंकिंग में कोई सुधार नहीं कर सके। नगर पालिका सीतापुर पिछले बरस जहां राष्ट्रीय स्वच्छ सर्वेक्षण में 407 नंबर पर थी। इस पर इसमें इजाफा करते हुए 408 नंबर पर पहुंच गए है। रिजल्ट से मालूम हो रहा है कि हमने पिछली बरस से कोई सबक नहीं लिया। बल्कि अपनी ढर्रे पर ही चलते रहे। अधिकारियों ने भी पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस सर्वेक्षण में जहां अन्य जनपदों ने अपनी रैंकिंग में सुधार किया। वहीं जिला प्रशासन ने न तो कोई मुहिम छेड़ी और न तो लोगों से इसमें सहयोग की अपील की। इसी का नतीजा यह रहा है कि गंदगी फैलाने के मामले में एक बरस से एक कदम और आगे बढ़ गए। यानि अब शहर पूरा गंदगी की चपेट में है। जगह-जगह लगे कूड़े के ढेर इसकी गवाही दे रहे है।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत केंद्र सरकार हर बरस प्रत्येक जिले का स्वच्छ सर्वेक्षण करा रही है। यह सर्वेक्षण पांच बिंदुओं पर होता है। इसके जरिए जिले की स्वच्छता की रैंकिंग निकलकर आती है। पिछले बरस सीतापुर नगर पालिका पूरे देश में स्वच्छता के मामले में 407 नंबर पर थी। इस बार हुए सर्वे में यह रैंकिंग घटने के बजाए बढ़ गई है। अब हम 408 नंबर पर आ गए है। इससे प्रतीत होता है कि पिछले बरस से स्वच्छता में कोई सुधार नहीं हुआ है। न तो कोई संसाधन बढ़ाए गए हैं। बल्कि अव्यवस्थाओं में एक कदम और आगे बढ़ गए हैं। नगर पालिका इस सर्वे के प्रति कितना संजीदा था, इसकी हकीकत पूरे साल हुए कार्य बता रहे है। स्वच्छता व सुविधाओं को लेकर न तो कोई अभियान चला और न ही लोगों को इसके प्रति जागरूक किया गया। इस बरस न तो कोई वाहन खरीदा गया न ही सफाईकर्मियों की नियुक्ति की गई। सिर्फ पुराने ढर्रे पर ही पालिका चलती रही। जबकि अगर खर्चे की बात की जाए तो करीब साढ़े 10 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष सफाई कर्मचारियों के वेतन पर खर्च होता है। इसके अलावा करीब 60 लाख रुपये डीजल पर खर्च होता है। दो लाख रुपये वाहनों की मरम्मत पर खर्च होता है। इतना भारी भरकम खर्च करने के बाद भी रिजल्ट शून्य साबित हुआ।
इन बिदुंओं पर हुआ था सर्वे
अपशिष्ट प्रबंधन, सामुदायिक सहभागिता, बाजारों में साफ सफाई, डोर टू-डोर कूडा कलेक्शन, स्वच्छता व पब्लिक ओपनियन शामिल है।
नगर पालिका के पास संसाधन कम
अगर नगर पालिका के संसाधनों की बात की जाए तो यहां पर संसाधन ही बहुत कम है। सबसे पहला कारण यह है कि यहां पर कूड़ा निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है न ही डंपिंग की। इससे शहर में जहां पर खाली जगह मिलती है, वहीं पर कूड़ा डाल दिया जाता है। दूसरे डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन के लिए न तो पर्याप्त ठेलिया है न ही डस्टविन। एक मानक के मुताबिक 10 हजार की आबादी पर 28 सफाईकर्मी होने चाहिए। लेकिन इस समय करीब एक सैकड़ा सफाईकर्मियों की कमी बनी हुई है। वही इस सर्वे को लेकर पालिका को पहले से जानकारी थी। इसके बावजूद न तो शहरवासियों को जागरूक किया गया न ही साफ सफाई व्यवस्था के इंतजाम किए गए।
किए जा रहे हैं प्रयास
स्वच्छ सर्वेक्षण के मामले में काफी प्रयास किए गए हैं। पहले रैंकिंग के लिए अधिक शहर थे। तब 407 नंबर पर थे। इस बार शहरों की संख्या कम हुई है, तब 408 पर आए हैं। कुछ संसाधनों की कमी है। इसी वजह से बेहतर परिणाम नहीं आ सका है। लगातार स्वच्छता को लेकर जन जागरूकता अभियान, प्रसाधन व अन्य काम तेजी से किए जा रहे है।ं
- निहाल चंद, ईओ