सरैंया (सीतापुर)। एक तरफ लोग दहशत में जी रहे हैं। बार-बार तेंदुआ देखे जाने की बात कह रहे हैं। दूसरी तरफ वन विभाग क्षेत्र मेें तेंदुआ की मौजूदगी को नकार रहा है। इस बात की सच्चाई जानने के लिए शनिवार की रात अमर उजाला की टीम ने खुद ही सदरपुर क्षेत्र का रुख किया। ऐसे में जो सच्चाई सामने आई। वह बेहद चौंकाने वाली थी। क्योंकि टीम ने जो कुछ भी देखा, उसे कोई नकार भी नहीं सकता है।
सदरपुर क्षेत्र में रात करीब 11 बजे टीम का वाहन नहर पटरी पर आगे बढ़ रहा थ। जैसे ही टीम बेनी माधवपुर के करीब पहुंची, नहर के अंदर झाड़ियोें से निकल कर तेंदुआ सड़क पर आ गया। उसे देख कर चालक को कार रोकनी पड़ी। वहीं यह भी पुष्टि करनी थी कि सामने मौजूद जानवर तेंदुआ ही है, या कुछ और। कैमरे से जब उसकी फोटो ली गई और उसे देखा गया तो वह तेंदुआ ही निकला। हालांकि पांच मिनट के बाद तेंदुआ सड़क से हटकर नहर की पटरी पर चला गया। जिसके बाद वह सड़क पर गुजरने वाले वाहनों को ताकने लगा। वाहन की लाइट देखकर वह गुर्राता था। इसके बाद वाहन को करीब आते देख वह नहर में उतर जाता था। इस दौरान तेंदुआ दहाड़ता भी रहा। करीब एक घंटे तक तेंदुआ कभी नहर पटरी की सड़क पर, कभी झाड़ियों में तो कभी नहर के अंदर चहलकदमी करता रहा। करीब 12 बजे तेंदुआ उस तरफ चल दिया, जहां पर पिंजड़ा रखा हुआ था। वह पिंजड़े के पास गया, करीब दस मिनट तक पिंजड़े के आसपास ही घूमता रहा। जिसके बाद वह नहर के करीब मौजूद जंगल में जाकर गुम हो गया। इस घटनाक्रम से एक बात की पुष्टि हो गई कि तेंदुआ तो क्षेत्र में मौजूद है, लेकिन वन विभाग ही उसके आगे बेबस है।
पकड़ने के प्रयास जारी
क्षेत्र में तेंदुआ मौजूद है, इस बात की पुष्टि हो चुकी है। पिंजड़ा लगाया गया है। उसे पकड़ने के प्रयास जारी हैं। जरूरत पड़ने पर लखनऊ चिड़िया घर व दुधवा नेशनल पार्क के एक्सपर्टों की मदद ली जाएगी।
- डॉ. अनिरुद्ध पांडेय, डीएफओ
वनकर्मी भी असुरक्षित
तेंदुआ देखने के बाद क्षेत्र के बाशिंदे वन विभाग से बड़ी उम्मीद लगाए हुए हैं। लेकिन लोगों को शायद यह नहीं पता है कि वनकर्मी खुद ही असुरक्षित हैं। हालत यह है कि वनकर्मी बाइक से डंडा लेकर गश्त पर निकलते हैं। ऐसे में अगर तेंदुआ से उनका सामना हो जाए, तो उनका खुद का बच पाना मुश्किल होगा। जानकारों का कहना है कि तेंदुआ भी बाघ जैसा ही खूंखार होता है। ऐसे में खुले मैदान में उसके आगे जाना खतरे से खाली नहीं होगा। क्योंकि वह हमला कर सकता है। ऐसे में साफ है कि बाइकों से गश्त करने वाले वनकर्मी खुद भी असुरक्षित हैं।
सांझ ढलते ही घरों में दुबक जाते हैं लोग
संसारपुर, बेनी माधवपुर, लक्ष्मनपुर आदि क्षेत्र के 50 गांवों का हाल यह है कि सांझ ढलते ही लोग घरों में दुबक जाते हैं। तेंदुआ का भय इस कदर है कि लोग सफर करना सुरक्षित नहीं समझते। शाम होते ही क्षेत्र की सड़कें सूनी हो जाती हैं। रात के वक्त बहुत जरूरी काम पड़ने पर ही लोग घरों से निकलते हैं, वह भी चौपहिया वाहन से। अगर किसी के पास चौपहिया वाहन नहीं है, तब वह सुबह होने का इंतजार करता है।