मोहनलालगंज के जबरौली गांव में शादी कार्यक्रम में बनी चने की दाल खाकर एक ही परिवार के 25 लोग बीमार हो गए। खाना खाने के बाद अचानक सभी ने एक साथ उल्टी-दस्त और घबराहट की शिकायत की।
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आनन-फानन में 108 नंबर पर फोन कर एंबुलेंस बुलाई गई और सभी पीड़ितों को सीएचसी पहुंचाया गया। सीएचसी पर भीड़ बढ़ने की सूचना पर डॉक्टरों की टीम गांव पहुंची।
गंभीर मरीजों को सीएचसी में भर्ती कर शेष मरीजों का उपचार घर पर ही किया गया। डॉक्टरों का कहना है कि फूड पॉइजनिंग के चलते तबीयत बिगड़ी, जबकि परिवारीजनों का आरोप है कि किसी ने साजिश के तहत कुछ मिला दिया है। घटना से नाराज पीड़ित परिवार के मुखिया ने मामले की शिकायत पुलिस में करने की बात कही है।
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सुबह की दाल को शाम की दाल में मिला दिया
जबरौली में राकेश कुमार की बेटी अंजलि की सोमवार को शादी थी। समारोह के लिए घर में परिवारीजन और रिश्तेदार आए हुए थे। रविवार को सुबह के खाने में चने की दाल बनी थी।
सुबह खाने के बाद किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई। बची हुई दाल को शाम को बनी दाल में मिला दिया गया। रात में तो सब ठीक था, लेकिन सोमवार को दोपहर में एक-एक कर लोगों को उल्टी, दस्त, तेज पेट दर्द और घबराहट होने लगी। आनन-फानन में सभी को सीएचसी पहुंचाया गया।
वहां मौजूद सीएचसी अधीक्षक डॉ. केपी त्रिपाठी ने बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश, डॉ. पारुल सक्सेना, डॉ. अनिल गुप्ता और डॉ. मंगेश श्रीवास्तव को पीड़ितों के इलाज में लगाया।
फूड पॉइजनिंग के शिकार लोगों को भर्ती कर इलाज शुरू हुआ। करीब दो घंटे बाद पीड़ितों की हालत सामान्य हो सकी। राकेश कुमार का आरोप है कि किसी ने साजिश के तहत ये किया है। इस मामले की शिकायत पुलिस में करेंगे।
राकेश कुमार (45), पत्नी बिट्टन (43), बेटी अंजलि (18), अमन (15), रंजीत (16), मोहित (16), कोसला (76), आशीष (22), नितिन (10), सुबोध (26), वीरू (18), शोभा (30), सुमित (20), नितिन (18), सानू (12), सोनी (20), रामलली (76), अनिता (40), शुभम (19), रंजीत (20) को मोहनलालगंज सीएचसी में भर्ती कराया गया।
जबकि जबरौली गांव पहुंचे डॉ. अखिलेश और डॉ. पारुल सक्सेना ने वीरेंद्र, सुबोध, अभिषेक, अमित, सरोज समेत अन्य मरीजों का घर पर ही उपचार किया और जरूरी सावधानी बरतने की सलाह दी।
नहीं लिया गया दाल का सैंपल
जिस दाल को खाकर लोग बीमार हुए, उसका सैंपल तक नहीं लिया गया। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी मरीजों के इलाज में जुटे रहे लेकिन किसी ने दाल का सैंपल लेने के बारे में नहीं सोचा। गांव के लोगों का कहना था कि दाल की जांच होती तो ये पता चल जाता कि दाल में आखिर क्या था, जिससे लोग बीमार हो गए।