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सोलर उपकरणों की मरम्मत में आ रही दिक्कतें

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बहराइच। यूपी सरकार के अतिरिक्त ऊर्जा मंत्री ने पांच वर्ष में 50 फीसदी बिजली सौर ऊर्जा से मिलने का दावा किया है। जिले में सोलर प्लांट की स्थापना होने के बाद बिजली की कटौती से पूरी तरह से निजात मिल सकेगी, अभी इस पर सवालिया निशान है। कारण, जिले में सोलर उपकरणों की मरम्मत की बेहतर व्यवस्था नहीं है।
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कई महीने बाद भी खराब पड़े सोलर सिस्टम कारीगरों की कमी की वजह से ठीक नहीं हो पा रहे हैं। बहराइच के 14 विकासखंडों व छह तहसील क्षेत्रों में 40 लाख की आबादी निवास करती है। इस आबादी को बिजली की आपूर्ति देने के लिए पावर कॉर्पोरेशन को लगभग दो सौ मेगावाट बिजली प्रतिदिन चाहिए होती है।

इसके सापेक्ष महज 90 मेगावाट की आपूर्ति ही मिल पा रही है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में काफी दिक्कतों होती है। शहरी इलाकों में बिजली की समस्या कुछ हद तक कम हो गई है। मगर ग्रामीण इलाकों में समस्या बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में दस से बारह घंटे की आपूर्ति की जा रही है।
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यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री बृजेश पाठक ने सोलर पावर प्लांट की स्थापना किए जाने का दावा किया है। इससे बहराइच में भी सोलर लाइटों को ग्रामीण इलाकों में दिए जाने से पावर कॉर्पोरेशन पर बिजली आपूर्ति का बोझ कम होगा।

22 हजार 500 रुपये आती लागत
नेडा के परियोजना निदेशक श्रीराम ने बताया कि एक सोलर लाइट की लागत 22 हजार 500 रुपये आती है। इससे बारह वाट की ट्यूबलाइट जलाई जाती है, जो लगभग बारह घंटे तक जल सकती है। सोलर पंखा भी चलाया जा सकता है।

कारीगरों की है कमी
सोलर लाइटों को लगवाने के बाद कारीगरों की समस्या आड़े आ रही है। इसके मिस्त्री कम होने के कारण खराबी आने पर काफी दिक्कत होती है। विकासखंड महसी के ग्राम एरिया निवासी गुड्डू मिश्रा ने सोलर लाइट लगा रखी है। उनका कहना है कि विभाग द्वारा अनुदान देने की बात कही गई थी।

मगर कोई अनुदान नहीं मिला। मैकूपुरवा निवासी मान सिंह ने कहा कि सोलर लाइट लगाने से पंखा भी चल सकता है लेकिन इसमें और क्षमता की जरूरत है। विकासखंड शिवपुर के सिसवारा निवासी कंधईलाल ने कहा कि 22 हजार रुपये में लाइट लगवाई थी, जो बेहतर ढंग से काम कर रही है।

गांव निवासी मुस्तकीम का कहना है कि पांच माह पूर्व लाइट लगवाई थी, तभी से खराबी आ गई। सोलर लाइट के मिस्त्री नहीं होने से अभी तक वह ठीक नहीं हो सकी है।

बेकार हो चुका स्वास्थ्य विभाग का प्लांट
जिला अस्पताल में सोलर लाइट से विद्युत व्यवस्था की गई थी। लगभग 180 प्लेटों को लगवाया गया था। पांच लाख रुपये खर्च हुए थे। लेकिन प्लांट एक माह भी नहीं चल सका। कई साल तक सोलर प्लांट की प्लेटें सड़ती रहीं। इसके बाद उसे कबाड़ में बेच दिया गया।
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