अयोध्या। श्रीराम जन्मोत्सव को लेकर रामनगरी में उत्सव का माहौल है। मंदिरों में बधाई गान व सोहर गीतों का सिलसिला जारी है। कोशलेश सदन में ज.गु. वासुदेवाचार्य, बड़ाभक्तमाल में ज.गु. राघवाचार्य, श्रीरामबल्लभाकुंज में प्रेममूर्ति प्रेमभूषण, बड़ास्थान में रामकुमार दास, झुनकीघाट में प्रभंजनानंद सहित अन्य मंदिरों में श्रीरामकथा का रसपान श्रद्धालु कर रहे हैं।
दशरथ महल बड़ास्थान में बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्र प्रसाद आचार्य की अध्यक्षता में संचालित श्रीरामकथा में प्रवचन करते हुए रामशंकर दास शास्त्री कहते हैं कि जीव श्रेष्ठ कर्म करे यदि उसमें अभिमान आ जाए तो समझो कर्म फूट गया। देवर्षि नारद जी के हृदय में विवाह की अभिलाषा जागृत हो गई और वह भगवान विष्णु के पास सुंदरता मांगने गए। भगवान ने उन्हें बंदर का रूप दे दिया। कथावाचक कहते हैं कि स्वयंवर सभा में भगवान द्वारा माया से रचित अनके राजागण बैठे थे। माया रूपी विश्व मोहनी राजकुमारी ने किसी के गले में बरमाला नहीं डाली। उसी समय भगवान पहुंचे राजकुमारी ने उनके माला पहना दी जिसे देखकर नारद जी क्रोधित हो गए और भगवान को श्राप दे दिया।
हिंदू घाम में वाल्मीकीय रामायण की नौ दिवसीय कथा को आगे बढ़ाते हुए पूर्व सांसद डॉ. रामविलास दास वेदांती ने माता सीता की खोज में निकले वीर बंदरों के प्रस्थान का वर्णन किया। पवन पुत्र हनुमान के नेतृत्व में निकले इस दल में जामवंत, अंगद, सुग्रीव, नल, नील जैसे चुनिंदा वीर वानर शामिल होते हैं। सुग्रीव और श्रीराम के बीच हनुमान जी ने मित्रता का संबंध कराया। मित्र के सुख-दुख में मित्र ही काम आता है। सीता की खोज में निकले दल को एक दिव्य गुफा दिखाई पड़ती है। यहां स्वयं प्रभा नामक तपस्वनी ध्यानमग्न मिलती है। वानर उनसे माता जानकी के बारे में पूछते हैं। तपस्वनी के जरिए आगे बढ़ने का मार्ग उन्हें मिलता है।