लखनऊ। दिनभर में आठ से 10 गिलास साफ पानी पीना चाहिए। इससे किडनी में मौजूद हानिकारक तत्व पेशाब के साथ बाहर निकल जाते हैं। आप किडनी के रोगों से बचे रहते हैं। चाहें तो पानी में नींबू के रस को निचोड़ कर भी पी सकते हैं इससे शरीर को विटामिन सी व पानी दोनों साथ मिलता है। यह जानकारी केजीएमयू के डॉ. मनोज कुमार ने दी। वह रविवार को अटल विहारी वाजपेयी साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में आयोजित यूरो ऑन्कोकॉन की कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे।
डॉ. मनोज ने कहा कि किडनी कैंसर स्मोकिंग और तंबाकू चबाने से सबसे ज्यादा होता है। इसमें मौजूद हानिकारक तत्व धीरे-धीरे किडनी में पहुंचते हैं और वहां इकट्ठा होकर कैंसर को बढ़ावा देते हैं। शुद्ध पानी पीते रहा जाए तो हानिकारक तत्व काफी हद तक बाहर निकलते रहते हैं।
कार्यशाला के समापन समारोह में 10 अतिथि व्याख्यान हुए। इसकी अध्यक्षता केजीएमयू वीसी प्रो. एमएलबी भट्ट ने की। इस दौरान एम्स के यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. अमलेश सेठ, डॉ. अनिल एल्हेंस, डॉ. राजीव गुप्ता, डॉ. सुषमा अग्रवाल, डॉ. मधुप रस्तोगी भी मौजूद रहे। आयोजन सचिव प्रो. एचएस पहवा ने बताया कि कार्यशाला में सर्जरी की नई तकनीक के साथ ही नई दवाओं के प्रयोग पर भी विशेषज्ञों ने जानकारी दी। कार्यशाला को डॉ. दिवाकर दलेला, डॉ. अनीश, डॉ. विनीत तलवार, जर्मनी से आए प्रो. जेम्स बेडके, यूएसए के प्रो. क्रिस्टोफर वुड, डॉ. सुधीर रावल, डॉ. संजय सुरेखा ने भी संबोधित किया। वहीं एसजीपीजीआई के डॉ. एमएस अंसारी, केजीएमयू के प्रो. विश्वजीत सिंह ने भी किडनी कैंसर के बदलते स्वरूप पर चर्चा की। चिकित्सकों ने सात असामान्य और चार रोचक क्लीनिकल वीडियो प्रस्तुत करते हुए किडनी कैंसर को बढ़ावा देने वाले विभिन्न ट्यूमर के बारे में जानकारी दी।
किडनी कैंसर में कारगर है टीकेआई
किडनी कैंसर के मरीजों में शरीर के दूसरे हिस्से में कैंसर सेल को रोकने के लिए ऑपरेशन के बाद टाइरोसीन काइनेज इन्हीबिटर (टीकेआई) और इम्यूनो ऑन्कोलॉजी थेरेपी कारगर हो रही है। अभी यह काफी महंगी है। किडनी कैंसर के मरीजों में कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी कारगर नहीं होती है। इसके विकल्प के रूप में टीकेआई का प्रयोग किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि किडनी कैंसर के करीब 30 फीसदी मरीजों में ऑपरेशन के बाद लिवर, लंग, ब्रेन एवं हड्डियों के कैंसर का खतरा रहता है। क्योंकि रक्त सेल में कहीं न कहीं कैंसर को बढ़ावा देने वाले सेल रह जाते हैं। इन सेल को निष्क्रिय करने के लिए टीकेआई का प्रयोग किया जाता है।
एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीरज रस्तोगी, एसजीपीजीआई
स्टिरियोटैट्रिक रेडियो सर्जरी है कारगर
कैंसर के जिन मरीजों में सर्जरी की गुंजाइश नहीं रहती है, उनके लिए नई तकनीक प्रयोग की जा रही है। इसे स्टिरियोटैट्रिक रेडियो सर्जरी कहते हैं। इससे फेफड़े, लिवर व हड्डियों के कैंसर को ठीक किया जा रहा है। यह नॉन सर्जिकल रेडियेएशन थेरेपी है। इसे प्रभावित हिस्से में तीन दिन तक रेडियेशन देते हैं।
डॉ. प्रमोद गुप्ता, कैंसर संस्थान
नेफरेक्टामी सर्जरी भी है कारगर
रेडिकल नेफरेक्टॉमी से किडनी, एड्रेनल ग्लैंड के आसपास के लिम्फ नोड्स और फैटी टिश्यू को निकाल दिया जाता है। इसमें बहुत छोटे चीरे लगते हैं। इसमें कैंसरग्रस्त हिस्से के सेल्स निकाल दिए जाते हैं। इसी तरह जब किडनी कैंसर पर दवाओं का असर नहीं होता है तो इम्यूनो ऑन्कोलॉजी थेरेपी दी जाती है। इससे कैंसर को बढ़ावा देने वाली रासायनिक क्रियाएं नियंत्रित हो जाती हैं। ऐसे में बायोलॉजिकल थेरेपी या इम्यूनो ऑन्कोलॉजी थेरैपी का प्रयोग किया जाता है। यह शरीर के प्राकृतिक प्रतिरक्षा सुरक्षा को कैंसर के सेल्स को मारने में मदद करती है।
- प्रो. एसएन शंखवार, यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष, केजीएमयू