Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि 2026 कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
11 अक्तूबर 2026 को मां के स्वागत और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 06 बजकर 19 मिनट से लेकर 10 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। इस तरह से कलश स्थापना के लिए करीब 4 घंटे का समय मिलेगा। कलश स्थापना के लिए सुबह का समय पूजा के लिए बहुत ही शुभ और उत्तम माना जाता है।
Shardiya Navratri 2026: कलश स्थापना में चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग
- शास्त्रों में प्रातःकाल में देवी आह्वान और घटस्थापना का विधान है। 11 अक्तूबर को चित्रा नक्षत्र रात्रि 10:32 बजे तक और वैधृति योग रात्रि 09:05 बजे तक रहेगा।
- शास्त्रों के अनुसार चित्रा नक्षत्र के शुरुआती दो चरणों को छोड़कर अथवा अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना श्रेष्ठ मानी गई है।
- कलश स्थापना (घटस्थापना) का शुभ मुहूर्त
- चौघड़िया मुहूर्त: प्रातः 10 बजकर 4 मिनट से दोपहर 11 बजकर 55 मिनट तक बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त: प्रातः 11 बजकर 32 मिनट से दोपहर 12 बजकर 18 मिनट तक
हाथी पर होगा मां दुर्गा का आगमन
मां दुर्गा का आगमन इस बार हाथी पर होगा। देवी भागवत पुराण के अनुसार हाथी पर देवी का आगमन शुभ माना जाता है। हाथी को शक्ति, स्थिरता, धैर्य और समृद्धि का प्रतीक माना गया है, इसलिए माता का हाथी पर आगमन देश में अच्छी वर्षा, कृषि समृद्धि और सुख-शांति का संकेत देता है।
Navratri Kalash Sthapana 2026: घर पर ऐसे करें कलश स्थापना
- कलश स्थापना से पहले पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ कर लें।
- इसके बाद वहां मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- अब जिस स्थान पर जौ बोने हैं, वहां साफ मिट्टी से एक छोटा पात्र तैयार करें।
- इसमें जौ के बीज डालकर ऊपर से हल्की मिट्टी डाल दें।
- इसके बाद कलश तैयार करें।
- कलश के बाहर मौली बांधें और उस पर रोली से तिलक लगाएं।
- अब कलश में स्वच्छ जल और थोड़ा गंगाजल डालें।
- इसमें सुपारी और सिक्का भी रखा जा सकता है।
- इसके बाद कलश के मुंह पर आम या अशोक के पत्ते रखें।
- ऊपर जटा वाला नारियल स्थापित करें।
- नारियल को लाल कपड़े या चुनरी में लपेटकर कलश पर रखा जाता है।
- कलश और जौ की स्थापना के बाद मां दुर्गा का ध्यान करें और विधि-विधान से पूजा करें।
- नवरात्रि के दौरान जौ में नियमित रूप से आवश्यकता के अनुसार पानी का छिड़काव करते रहें।
शारदीय नवरात्रि के पहले दिन, श्रद्धालु काली मंदिर में पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
Shardiya Navratri 2026: नवरात्रि के पहले दिन पूजा विधि
- सबसे पहले एक साफ चौकी पर माता रानी की मूर्ति स्थापित करें।
- इसके बाद देवी मां का विधि-विधान से श्रृंगार कर उन्हें लाल चुनरी अर्पित करें।
- माता को फूल और इत्र चढ़ाएं। साथ ही फल, मिठाई, मेवे और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
- इसके बाद जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें और उसके ऊपर नारियल व लाल चुनरी रखें।
- कलश स्थापना के साथ जौ भी बोएं।
- फिर दीप जलाकर देवी मां की पूजा-अर्चना करें और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
- अंत में माता रानी की आरती करें।
नवरात्रि पूजा सामग्री
- लोटा, जल, गंगाजल, मौली, सुपारी, दूर्वा और जटा नारियल।
- लाल चुनरी, वस्त्र और माता के श्रृंगार की सामग्री जैसे बिंदी, सिंदूर, गजBB रा और चूड़ियां।
- फूल-माला, पान, सूखा नारियल और साफ-साबुत चावल।
- पीतल का दीया, रुई की बत्ती, घी या तिल का तेल, कपूर और धूप-बत्ती।
- कंघी, शीशा, पायल, इत्र, मेहंदी और अन्य श्रृंगार सामग्री।
- मिट्टी, मिट्टी का पात्र, जौ, कलावा, बताशे, फल और मिठाई।
- अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान की सामग्री भी रख सकते हैं।
Shardiya Navratri 2026: मां दुर्गा के नौ रूप और उनके प्रतीक
शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। जिनमें प्रथम दिन शैलपुत्री: पर्वतराज हिमालय की पुत्री। वृषभ पर सवार। स्थिरता और मन की दृढ़ता प्रदान करती हैं। द्वितीय ब्रह्मचारिणी: कठोर तपस्या का प्रतीक। ज्ञान, वैराग्य और संयम की अधिष्ठात्री हैं। तृतीय चंद्रघंटा: मस्तक पर अर्धचंद्र से सुशोभित। इनकी आराधना से भय का नाश और शत्रु बाधा दूर होती है। चतुर्थ कूष्मांडा: अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाली। आयु, यश और आरोग्य देने वाली हैं।पंचम स्कंदमाता: भगवान कार्तिकेय की माता। संतान सुख और वात्सल्य की प्रदायिनी हैं। षष्ठम कात्यायनी: महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में अवतरित। दांपत्य जीवन में सुख और शत्रुओं पर विजय दिलाती हैं। सप्तम देवी दुर्गा कालरात्रि अंधकार का नाश करने वाली हैं। भक्तों को अभय प्रदान कर ग्रह बाधा को दूर करती हैं।अष्टम महागौरी: गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र धारिणी। पापों का क्षय कर शुद्धता और समृद्धि देती हैं। नवम सिद्धिदात्री: सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। इनकी कृपा से साधक को मोक्ष और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
मां शैलपुत्री की पूजा क्यों की जाती है?
मां शैलपुत्री को नवदुर्गा का प्रथम स्वरूप माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। इसी कारण उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। मां शैलपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल सुशोभित होता है। वे वृषभ यानी बैल पर सवार रहती हैं। शारदीय नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि उनकी आराधना से भक्तों को सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मां की कृपा से जीवन में सकारात्मकता आती है और भक्तों को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
मां शैलपुत्री की पूजा विधि
- नवरात्रि के पहले दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके मां दुर्गा और मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से कलश स्थापना करें और मिट्टी के पात्र में जौ बोएं।
- इसके बाद मां शैलपुत्री को फूल, अक्षत, चंदन, धूप, दीप और फल अर्पित करें।
- मां को सफेद रंग के फूल और सफेद रंग की मिठाई अर्पित करना शुभ माना जाता है।
- इसके बाद मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें और श्रद्धापूर्वक दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
- अंत में मां की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।
मां शैलपुत्री की जन्म कथा
माँ दुर्गा अपने पहले स्वरुप में 'शैलपुत्री' के नाम से पूजी जाती हैं।पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा ।अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं तब इनका नाम सती था।इनका विवाह भगवान शंकर जी से हुआ था।एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया किन्तु शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया,सती ने जब सुना कि हमारे पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं,तब वहां जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।अपनी यह इच्छा उन्होंने भगवान शिव को बताई।
Shardiya Navratri 2026:11 अक्तूबर को इस समय करें कलश स्थापना
शारदीय नवरात्रि के पहले दिन यानी 11 अक्तूबर, रविवार को सुबह कलश स्थापना की जा सकती है। दिए गए पंचांग के अनुसार, घटस्थापना के लिए सुबह 5:31 बजे से 9:26 बजे तक शुभ समय रहेगा। इसके अलावा अभिजित मुहूर्त सुबह 11:00 बजे से 11:47 बजे तक रहेगा। यानी सुबह घटस्थापना के लिए करीब 3 घंटे 55 मिनट का समय और अभिजित मुहूर्त में 47 मिनट का समय उपलब्ध रहेगा। पूजा के लिए संभव हो तो साफ-सफाई करके पहले से ही सारी सामग्री व्यवस्थित कर लें, ताकि शुभ मुहूर्त में बिना किसी परेशानी के कलश स्थापना की जा सके।
कलश स्थापना के लिए क्या-क्या चाहिए?
- तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश
- स्वच्छ जल और गंगाजल
- आम या अशोक के पत्ते
- जटा वाला नारियल
- मौली या कलावा
- रोली और अक्षत
- सुपारी और सिक्का
- फूल और माला
- धूप, दीपक और कपूर
- लाल या पीला कपड़ा
- पूजा की थाली
- फल और मिठाई
- जौ के दाने
- मिट्टी का पात्र
- साफ और उपजाऊ मिट्टी
घर पर ऐसे करें कलश स्थापना
- कलश स्थापना से पहले पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ कर लें।
- इसके बाद वहां मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- अब जिस स्थान पर जौ बोने हैं, वहां साफ मिट्टी से एक छोटा पात्र तैयार करें।
- इसमें जौ के बीज डालकर ऊपर से हल्की मिट्टी डाल दें।
- इसके बाद कलश तैयार करें।
- कलश के बाहर मौली बांधें और उस पर रोली से तिलक लगाएं।
- अब कलश में स्वच्छ जल और थोड़ा गंगाजल डालें।
- इसमें सुपारी और सिक्का भी रखा जा सकता है।
- इसके बाद कलश के मुंह पर आम या अशोक के पत्ते रखें।
- ऊपर जटा वाला नारियल स्थापित करें।
- नारियल को लाल कपड़े या चुनरी में लपेटकर कलश पर रखा जाता है।
- कलश और जौ की स्थापना के बाद मां दुर्गा का ध्यान करें और विधि-विधान से पूजा करें।
- नवरात्रि के दौरान जौ में नियमित रूप से आवश्यकता के अनुसार पानी का छिड़काव करते रहें।
नवरात्रि नौ दिन की पूजा के मंत्र
- मां शैलपुत्री का मंत्र- ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः
- मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:
- मां चन्द्रघण्टा का मंत्र- ॐ देवी चन्द्रघंटायै नमः
- देवी कूष्माण्डा का मंत्र - ॐ कूष्माण्डायै नमः
- देवी स्कंदमाता का मंत्र - ॐ स्कन्दमात्राय नमः
- देवी कात्यायनी का मंत्र - ॐ कात्यायनै नमः
- देवी कालरात्रि का मंत्र - ॐ कालरात्र्यै नमः
- देवी महागौरी का मंत्र - ॐ महागौर्यै नमः
- देवी सिद्धिदात्री का मंत्र- ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः
नौ दिन में कई शुभ योग
नवरात्र के दौरान चार से पांच दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और दो दिन अमृत सिद्धि योग बनने का संयोग है। इसके अलावा महाष्टमी और महानवमी पर भी विशेष योग रहेंगे। शुभ मुहूर्त में भूमि, भवन और वाहन की खरीदारी के साथ गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। इस बार शारदीय नवरात्र रविवार से शुरू हो रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रविवार को नवरात्र शुरू होने पर मां दुर्गा का आगमन हाथी पर माना जाता है। हाथी को सुख-समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना गया है। नवरात्र के पहले दिन मंदिरों में घट स्थापना के साथ मां दुर्गा की पूजा-अर्चना शुरू होगी।
नवरात्रि में भोजन और व्रत के नियम
- सात्विक भोजन करें और अपनी परंपरा के अनुसार अनाज से परहेज करें।
- फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक का सेवन करें।
- दिनभर फलाहार करें और व्रत के नियमों के अनुसार भोजन करें।
- निर्जल उपवास रखने से बचें, खासकर जब स्वास्थ्य इसकी अनुमति न देता हो।
- मांसाहार, शराब और अन्य मादक पदार्थों से दूर रहें।
- धार्मिक परंपरा के अनुसार प्याज और लहसुन का सेवन न करें।
- क्रोध, आलस्य और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
- ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम के नियमों का पालन करें।
- घर और पूजा स्थल में स्वच्छता व सात्विक वातावरण बनाए रखें।
- व्रत के दौरान पर्याप्त पानी पिएं और सेहत का ध्यान रखें।
नवरात्रि व्रत के महत्वपूर्ण नियम
- सात्विक भोजन करें और फलाहार व सेंधा नमक का सेवन करें।
- प्याज, लहसुन, मांसाहार और मदिरा से परहेज करें।
- क्रोध, असत्य बोलने और दूसरों की निंदा करने से बचें।
- ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम का पालन करें।
- अपनी ऊर्जा को पूजा-पाठ और मां दुर्गा की भक्ति में लगाएं।
- प्रतिदिन सुबह-शाम मां दुर्गा की आरती करें।
- मां दुर्गा के मंत्रों का जाप और ध्यान करें।
- घर और पूजा स्थल की स्वच्छता बनाए रखें।
- व्रत के दौरान अपनी सेहत और शरीर की जरूरतों का ध्यान रखें।
नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाने के नियम
नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाने से पहले नौ दिनों तक दीपक प्रज्ज्वलित रखने का संकल्प लिया जाता है। इसके लिए पीतल या मिट्टी के दीपक का इस्तेमाल कर सकते हैं। दीपक को सीधे जमीन पर रखने के बजाय चौकी या पाटे पर स्थापित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अखंड ज्योति के लिए गाय के शुद्ध घी का उपयोग करना शुभ माना जाता है। यदि घी उपलब्ध न हो, तो अपनी परंपरा के अनुसार तिल या सरसों के तेल का दीपक भी जला सकते हैं।
नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती पाठ के नियम
- पाठ शुरू करने से पहले मां दुर्गा का स्मरण करें और श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।
- दुर्गा सप्तशती की पुस्तक को लाल कपड़े से ढकी स्वच्छ चौकी पर रखें।
- पाठ करते समय लाल कपड़े या कुश के आसन पर बैठें।
- मंत्रों और श्लोकों का उच्चारण स्पष्टता और एकाग्रता के साथ करें।
- यदि पाठ के बीच में रुकना पड़े, तो संभव हो तो अध्याय पूरा करने के बाद ही विराम लें।
- प्रतिदिन पाठ पूरा होने पर मां दुर्गा से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें और पाठ उन्हें समर्पित करें।
- पाठ के दौरान मन को शांत रखें और दूसरों के प्रति द्वेष या नकारात्मक भावनाओं से बचने का प्रयास करें।
- पाठ करते समय स्वच्छता, श्रद्धा और एकाग्रता का विशेष ध्यान रखें।
नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्व
शारदीय नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ करना भी विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पाठ से भक्तों को साहस, आत्मविश्वास और मानसिक शांति की अनुभूति होती है। नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना करते समय दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा और देवी मंत्रों का पाठ किया जा सकता है। इस प्रकार, शारदीय नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करके भक्त मां दुर्गा से सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।
नवरात्रि पर क्या करें और क्या नहीं
नवरात्रि पर देवी दुर्गा की पूजा-उपासना करने का विशेष महत्व होता है। ऐसे में इस दिन किसी से वाद-विवाद करने करने से बचें, झूठ न बोलें, गुस्सा करने से बचें, भूलकर किसी महिला या फिर गरीब का अपमान ना करें. स्त्रियों का सम्मान करें। देवी दुर्गा की पूजा-आराधना करते समय ब्रह्राचर्य के नियमों का पालन करें।
दुर्गा अष्टमी और महानवमी पर होंगे विशेष अनुष्ठान
नवरात्रि के आठवें दिन दुर्गा अष्टमी और नौवें दिन महानवमी का विशेष महत्व होता है। इन दिनों कई घरों में कन्या पूजन किया जाता है। छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराया जाता है। इसके साथ ही श्रद्धा के अनुसार उपहार और दक्षिणा दी जाती है। महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु इस दिन हवन और कन्या पूजन के साथ अपने नवरात्रि व्रत का समापन करते हैं। हालांकि, अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन और व्रत पारण की परंपरा परिवार की मान्यता के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
किस दिन कौन सा रंग पहनना होगा शुभ?
शारदीय नवरात्रि 2026
- फोटो : अमर उजाला AI
11 अक्तूबर 2026 - नवरात्रि का पहला दिन, मां शैलपुत्री पूजा और घट स्थापना, शुभ रंग: नारंगी
12 अक्तूबर 2026 - नवरात्रि का दूसरा दिन, मां ब्रह्मचारिणी पूजा, शुभ रंग: सफेद
13 अक्तूबर 2026 - नवरात्रि का तीसरा दिन, मां चंद्रघंटा पूजा, शुभ रंग: लाल
14 अक्तूबर 2026 - नवरात्रि का चौथा दिन, मां कूष्मांडा पूजा, शुभ रंग: नीला
15 अक्तूबर 2026- नवरात्रि का पांचवां दिन, मां स्कंदमाता पूजा, शुभ रंग: पीला
16 अक्तूबर 2026 - नवरात्रि का छठा दिन, षष्ठी पूजा और मां कात्यायनी पूजा, शुभ रंग: हरा
17 अक्तूबर 2026- नवरात्रि का सातवां दिन, सप्तमी पूजा और मां कालरात्रि पूजा, शुभ रंग: काला
18 अक्तूबर 2026 - नवरात्रि का आठवां दिन, अष्टमी पूजा, शुभ रंग: बैंगनी
19 अक्तूबर 2026 - नवरात्रि का नौवां दिन, नवमी पूजा, शुभ रंग: मोरपंखी हरा
नवरात्रि में प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाते?
हिंदू धर्म में भोजन को केवल शरीर की जरूरत नहीं, बल्कि मन और व्यवहार से भी जोड़कर देखा जाता है। पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं में नवरात्रि के दौरान सात्विक भोजन करने पर जोर दिया जाता है, ताकि साधक पूजा-पाठ और ध्यान में मन लगा सके। इसी कारण अनेक परिवारों में इन नौ दिनों तक प्याज और लहसुन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत बांट रहे थे, तब स्वर्भानु नामक असुर देवता का रूप धारण करके देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। उसने अमृत पी लिया, लेकिन सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान उजागर कर दी। इसके बाद भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। मान्यता है कि अमृत की कुछ बूंदें धरती पर गिरने से प्याज और लहसुन उत्पन्न हुए। इस कथा की अलग-अलग धार्मिक व्याख्याएं मिलती हैं। कुछ परंपराओं में प्याज और लहसुन को इसी कारण पूजा और सात्विक आहार से दूर रखा जाता है। हालांकि, यह एक पौराणिक मान्यता है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उत्पत्ति की कहानी नहीं।
नवरात्रि में सात्विक भोजन करने का क्या महत्व है?
नवरात्रि के दौरान सात्विक भोजन का उद्देश्य पूजा-पाठ के साथ-साथ संयम और अनुशासन बनाए रखना माना जाता है। आमतौर पर इस दौरान हल्का, ताजा और कम मसाले वाला भोजन पसंद किया जाता है। फल, दूध, दही, मेवे और कुछ विशेष अनाज या कंद का सेवन व्रत के नियमों के अनुसार किया जाता है। संतुलित और आसानी से पचने वाला भोजन रोजमर्रा की दिनचर्या में भी उपयोगी हो सकता है। हालांकि, सात्विक भोजन का मतलब केवल सादा खाना नहीं है, बल्कि भोजन की गुणवत्ता, मात्रा, ताजगी और शरीर की जरूरतों का ध्यान रखना भी जरूरी है। नवरात्रि में कुछ लोग नौ दिन तक व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग पहले और अंतिम दिन या केवल अष्टमी-नवमी पर उपवास करते हैं। ऐसे में हर व्यक्ति के लिए एक जैसा खानपान जरूरी नहीं है। व्रत की अवधि और भोजन का चुनाव अपनी दिनचर्या, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपराओं को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
दुर्गा अष्टमी और महानवमी पर होंगे विशेष अनुष्ठान
नवरात्रि के आठवें दिन दुर्गा अष्टमी और नौवें दिन महानवमी का विशेष महत्व होता है। इन दिनों कई घरों में कन्या पूजन किया जाता है। छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराया जाता है। इसके साथ ही श्रद्धा के अनुसार उपहार और दक्षिणा दी जाती है। महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु इस दिन हवन और कन्या पूजन के साथ अपने नवरात्रि व्रत का समापन करते हैं। हालांकि, अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन और व्रत पारण की परंपरा परिवार की मान्यता के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
नवरात्रि में इन बातों का रखें ध्यान
- नवरात्रि के दौरान पूजा स्थल की साफ-सफाई रखें और श्रद्धापूर्वक मां दुर्गा की आराधना करें।
- यदि कलश स्थापना कर रहे हैं, तो उसकी देखभाल और पूजा नियमित रूप से करें।
- व्रत रखने वाले लोग अपनी सेहत और क्षमता के अनुसार व्रत का पालन करें।
- पूजा-पाठ में परिवार की परंपराओं और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं का ध्यान रखें।
- इस तरह शारदीय नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की भक्ति, पूजा और साधना के लिए विशेष माने जाते हैं।
- घटस्थापना से लेकर महानवमी और फिर विजयादशमी तक पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ यह पर्व मनाया जाएगा।
शारदीय नवरात्र का महत्व
शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। जिनमें प्रथम दिन शैलपुत्री: पर्वतराज हिमालय की पुत्री। वृषभ पर सवार। स्थिरता और मन की दृढ़ता प्रदान करती हैं। द्वितीय ब्रह्मचारिणी: कठोर तपस्या का प्रतीक। ज्ञान, वैराग्य और संयम की अधिष्ठात्री हैं। तृतीय चंद्रघंटा: मस्तक पर अर्धचंद्र से सुशोभित। इनकी आराधना से भय का नाश और शत्रु बाधा दूर होती है। चतुर्थ कूष्मांडा: अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाली। आयु, यश और आरोग्य देने वाली हैं।पंचम स्कंदमाता: भगवान कार्तिकेय की माता। संतान सुख और वात्सल्य की प्रदायिनी हैं। षष्ठम कात्यायनी: महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में अवतरित। दांपत्य जीवन में सुख और शत्रुओं पर विजय दिलाती हैं। सप्तम देवी दुर्गा कालरात्रि अंधकार का नाश करने वाली हैं। भक्तों को अभय प्रदान कर ग्रह बाधा को दूर करती हैं।अष्टम महागौरी: गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र धारिणी। पापों का क्षय कर शुद्धता और समृद्धि देती हैं। नवम सिद्धिदात्री: सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। इनकी कृपा से साधक को मोक्ष और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
कल नवरात्रि का दूसरा दिन
नवरात्रि के पहले दिन भक्तों ने कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की। वहीं, कल 12 अक्तूबर को नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाएगी। इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 29 मिनट से दोपहर 12 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, संयम और धैर्य का आशीर्वाद मिलता है।
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए जपें ये मंत्र
मां ब्रह्मचारिणी का सरल पूजा मंत्र
“ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥”
मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान मंत्र
“दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥”
मां ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र
“या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”