यूपी सरकार की मंत्रियों ने छठें सत्र में महिला कल्याण एवं बाल विकास मंत्री बेबीरानी मौर्य, माध्यमिक शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) गुलाब देवी, उच्च शिक्षा राज्यमंत्री रजनी तिवारी, महिला कल्याण एवं बाल विकास राज्य मंत्री प्रतिभा शुक्ला और ग्राम्य विकास राज्यमंत्री लक्ष्मी गौतम ने अपने अनुभव साझा किए।
अंत में जया किशोरी ने भजन भी सुनाया। "मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है, मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है", करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है। मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। किशोरी कुछ ऐसा इंतजाम हो जाए, किशोरी कुछ ऐसा इंतजाम हो जाए, जुबां पर राधा-राधा नाम हो जाए, जुबां पर राधा-राधा नाम हो जाए। किशोरी कुछ ऐसा इंतजाम हो जाए।
जया किशोरी ने कहा कि आध्यात्म आपको सिखाता है कि जो कुछ चल रहा है, वह स्थायी नहीं है। कुछ भी स्थायी नहीं है। आप जिस बात पर आज रो रहे हैं, 10 साल बाद आप उसी बात पर हंसेंगे। मैथ्स में जब मेरे नंबर कम आए, तब मैं परेशान थी। लेकिन आप अपनी जिंदगी में कुछ न कुछ कर लेते हैं। जब ये मान लेते हैं कि यही सब कुछ है, तब दिक्कत होती है। आध्यात्म सिखाता है कि ईश्वर के सिवाए कुछ भी सच नहीं है। ये ऊपर वाले की पिक्चर चल रही है। आप एक्टर हैं, आप अपना रोल अच्छे से निभाइए। काम ऐसे करें कि आंख मिलाने लायक रहें। हर व्यक्ति अपनी जिंदगी में कुछ न कुछ कर लेता है। आप किसी से तुलना करके बच्चे को उसके जैसा मत बनाइए। अगर आपका बच्चा मैथ्स में अच्छा है और इकोनॉमिक्स में खराब है तो इकोनॉमिक्स के बजाय मैथ्स की ही ट्यूशन लगाइए। जहां वह बेहतर है, वहां मेहनत कीजिए। जहां वह कमजोर है, वहां उससे बेवजह मेहनत मत करवाइए। मेरे माता-पिता ने मैथ्स की बजाय आध्यात्म की शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि बस पास हो जाना। हमें यह नहीं चाहिए कि आप 100 में से 95 नंबर लेकर आइए। जहां बच्चे की दिलचस्पी है, वह काम उसे करने दीजिए। जहां दिलचस्पी नहीं है, वहां वह डिग्री तो ले लेगा कि काम नहीं कर पाएगा। जो काम देगा, वह कहेगा कि डिग्री अलग रखो, काम करके बताओ। कॉम्पीटिशन के चक्कर में बच्चे गलत रास्ते अपना लेते हैं। स्कूल में वह शायद चीटिंग करके आगे रह लेगा। जिंदगी में चीटिंग करेगा यानी गलत रास्ते पर जाएगा। उसे यह सिखाइए कि काम इतना कीजिए कि भले ही एक रोटी कम खाएं, लेकिन सुकून से नींद आए। याद रखें कि चोर अपनी परछाई से डरता है।
जया किशोरी ने कहा कि निजी क्षति यानी मृत्यु, जिसके बारे में सबको पता है कि एक न एक दिन मृत्यु आएगी। जब हम किसी अपने को खोते हैं तो हमें भरपूर दुख होता है। यह कैसे हो गया, यह सोचकर हम दुखी होते हैं। हम क्यों सोचते हैं कि इतनी उम्र तो पक्की है। इसी वजह से आप अपने परिवार के साथ समय नहीं बिता पाते। हम कहते हैं कि ये सब हम परिवार के लिए ही तो कर रहे हैं। हम ये मानकर बैठते हैं कि पूरी जिंदगी हमारे पास है। भगवान जब बीच में अपना काम कर देते हैं तो हमारी सपनों की दुनिया टूट जाती है, तब आप उससे उबर नहीं पाते। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कुछ परिस्थितियां सहने के लिए होती हैं, जैसे ऋतु चक्र। आप मौसम को हटा नहीं सकते। जिसे ठंड नहीं पसंद, वह गर्म कपड़े पहन सकता है, लेकिन मौसम को नहीं बदल सकता। परिवार सबसे महत्वपूर्ण होता है। फैमिली टाइम हमेशा रखें। काम वापस आ सकता है, पैसे दोबारा कमा सकते हैं, लेकिन अपने लौटकर नहीं आएंगे। जिंदगी में मुझे उतना तनाव कभी महसूस नहीं हुआ, जितना कोरोना के दौर में हुआ। मेरे माता-पिता मेरी ताकत और मेरी कमजोरी हैं। एक ही चीज है जो मुझे डरा सकती है, वो है मेरे माता-पिता। उनके साथ कुछ गलत न हो। बाकी मैं हर परिस्थिति का सामना न करूं।
इस सवाल के जवाब में जया किशोरी ने कहा कि बिल्कुल, मैं एक उदाहरण देती हूं कि जब मां-बाप बच्चों को खाना खिलाते हैं, तो उनका उद्देश्य है कि बच्चा खाना खा ले, अब चाहे बच्चा भाग रहा होगा तो वो उसके पीछे भागेंगे, बच्चे को कहानी सुननी है तो कहानी सुनाएंगे। खेल खेलना है तो खेल खिलाएंगे, उसको है कि खाना खा ले। मेरा काम है भगवान की बातें अच्छी बातें हैं, वो आप तक पहुंचें। वो तरीका कथा होगा तो मैं कथा करूंगी, मोटिवेशन होगा तो मैं मोटिवेशन करूंगी। भजन होगा तो मैं भजन करूंगी, और दस तरीके होंगे तो वो दस तरीके भी करूंगी।
जया किशोरी ने कहा कि हमें तुरंत हर चीज चाहिए। यह बंद करिए। टाइम लीजिए। सोचिए समझिए फिर फैसले करिए। जया किशोरी ने कहा कि इमोशनल होना अच्छी बात है, और उसको अपनी वीकनेस बना लेना गलत बात है। मैं खुद भी इमोशनल हूं। लेकिन उसको अपने ऊपर हावी नहीं होने देती अपने ऊपर, एक समय तक वो मुझे फील होगा। उसके बाद जो प्रेक्टिकल सोल्यूशन हैं, मैं उसकी तरफ आगे बढ़ जाऊंगी। मैं उसको एक-दो हफ्ता, एक महीना टांग नहीं सकती। इसलिए जल्दी अटैच हो तो जल्दी डिअटैच भी होना सीखिए।
जया किशोरी ने कहा कि लोगों ने कामयाबी के मायने निकाल लिए कि चीजों को इकट्ठा कैसे करना है। इसलिए लोग कहते हैं कि जब पैसे नहीं थे, तब सुखी थे। आप भागदौड़ करके पैसे इकट्ठा करके रखते जा रहे हो। पैसा यानी स्वतंत्रता। आप मन से छुट्टियां लें, मर्जी से जिंदगी जी लीजिए, पैसा इसी के लिए होता है। हम एक गाड़ी खरीदते हैं, फिर दूसरे के बारे में सोचने लग जाते हैं। फ्लैट लेकर सोचते हैं कि अब मकान बनाएंगे। या तो आप अतीत में जी रहे होते हैं या भविष्य की ओर देख रहे होते हैं। कोरोना ने सिखा दिया कि आपको नहीं पता कि अगले पल क्या होने वाला है। सब घर बैठ गए।
जया किशोरी ने कहा कि शास्त्र पढ़िए। आपके जीवन में बड़ा बदलाव आ जाएगा। शास्त्र आपको पूजा-पाठ नहीं सिखा रहे। शास्त्र आपको जीवन जीना सिखा रहे हैं। बाहरी युद्ध से तो अर्जुन डरा ही नहीं। वह मन के युद्ध में नहीं जीत पा रहा था, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें रास्ता दिखाया। वे युद्ध लड़ रहे थे, लेकिन भगवान उन्हें सात्विक, राजसिक, तामसिक के मायने सिखा रहे थे, क्योंकि वे अंदर से उन्हें मजबूत होना सिखा रहे थे। कोरोना में भी डॉक्टरों ने कहा कि इम्युनिटी मजबूत है तो बचे रहेंगे। अंदरूनी ताकत और मानसिक ताकत होनी चाहिए, यही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सिखाया, लेकिन इंसान की रोने की आदत हो गई है। उसके रोने खत्म नहीं होते। जब बीमार होते हैं तो हम डॉक्टर के पास जाते हैं। जब मानसिक दिक्कतें आती हैं तो हम रोने लग जाते हैं। आप दुखी गाने ही चलाओगे।
जया किशोरी ने कहा कि श्रीराम के आदर्शों के साथ जिंदगी बहुत अच्छे से जी जा सकती है। जीवन दुखों, संकटों, दिक्कतों से भरा हुआ है। फिर भी श्रीराम के चेहरे से मुस्कान गायब नहीं होती। उनके जिंदगी में सुख कितना था? वे जहां रहे, खुश रहे। जो बात हम मोटिवेशनल स्पीकर बनकर बात कर रहे हैं, श्रीराम तो सबसे पहले सिखा गए कि परिस्थितियां विपरीत हों, लेकिन मुस्कुराएं। श्रीकृष्ण अपने जन्म से ही मृत्यु को सामने देख रहे थे, लेकिन कृष्ण सबसे खुश रहे। जिनके पास सब कुछ है, वो आकर कहते हैं कि हमारे पास सब है, लेकिन खुशी नहीं है। श्रीराम और श्रीकृष्ण को चरित्र आपको जीवन में बहुत ताकत दे सकता है। परिस्थिति कोई भी हो, आप संभाल लेंगे।
जया किशोरी ने कहा कि बदलाव ही प्रकृति का नियम है। जैसे-जैसे समय बदलेगा आपको बदलना पड़ेगा। हर अवतार सीखाता है कि किस परिस्थिति में क्या करना है। मुझे लगता है कि एक ही चीज है जो मुझे थोड़ा डरा सकती हैं, थोड़ा पीछे कर सकती है, वो मेरे मां-बाप हैं, इनके साथ कुछ गलत नहीं होना चाहिए, बाकि में हर परिस्थिति का सामना कर सकती हूं।
हम यह नहीं तय कर सकते कि हमारा जीवन कब खत्म होगा। हम यह मानकर बैठे होते हैं कि हम सत्तर-अस्सी साल जिंदा ही रहेंगे। ऐसा नहीं सोचना चाहिए। ये हमारे हाथ में नहीं होता। कुछ हालात हमारे हाथ में नहीं होते जैसे मौसम तो बदलेंगे ही हमें उनके अनुसार ढलना होता है। मेरे लिए सब भगवान एक हैं। बस अलग-अलग अवतार लिए हैं। कृष्ण ही राम है। राम ही कृष्ण है।
जया किशोरी ने कहा कि जब मैं घर में रहती हूं तो कोशिश करते हैं कि हम पूरा दिन साथ में रहे। सुबह की चाय लेकर शाम के खाने तक सब साथ में रहें। अगर फिल्म देखती हूं तो भी सब साथ देखते हैं। पड़ोसियों और रिश्तों पर उन्होंने कहा कि कुछ लोग मेरे बदलाव से खुश होते हैं। जबकि कुछ को इससे चिढ़ होती है। कई जगह ऐसी होती हैं जहां मैं काम की बात नहीं करती बस एक लड़की बनकर रहती हूं। मेरी मां-बाप के लिए तो मैं वही बच्चा हूं।
जया किशोरी ने कहा कि हम घरों में मृत्यु के बारे में बात नहीं करते। यदि हम बात करते रहें तो मृत्यु को लेकर हमारा डर कम होगा। मृत्यु ही एकमात्र सत्य है जिसका घटित होना तय है।
जय किशोरी ने कहा कि जिसने जन्म लिया वह मरेगा। जब आप किसी अपने को खोते है तो दुख तो होगा। भरपूर दुख होगा। मृत्यु तो तय है। जब जो लिखा है वह होगा। श्रीकष्ण कहते हैं कुछ परिस्थितियां सहने के लिए हैं। अपनो के साथ समय बिताइए। क्योंकि जो चला जाएगा वह कभी नहीं आएगा। हर चीज मिल जाएगी, लेकिन समय नहीं मिलेगा।
जया किशोरी ने कहा कि अपने तो अपने ही होते हैं। आज भी मुझे डांट पड़ती है। पैरेंटस कभी नहीं बदलते। आपके अपने भी कभी नहीं बदलते।
इस पर जया किशोरी ने कहा कि मैं भगवान के पास जाती हूं, मुझे भजनों से ज्यादा सुकून कहीं नहींं मिलता। जब भी मुझे लगता ऐसा लगता है, मेरे दिमाग बहुत सी बातें चल रही हैं। तो मैं अपने हैडफोन लगाती हूं, भजन चलाती हूं और आंख बंद करती हूं। मुझे लगता है कि कुछ मिनटों में ही मेरी वो सारी चिंता खत्म हो जाती है। क्योंकि मुझे सिर्फ एक ही जवाब मिलता है, आज तक संभालता आया है, आगे भी संभाल लेगा। उससे ज्यादा सुकून मुझे किसी की बात नहीं दे सकतीं, किसी का साथ नहीं दे सकता। जो मुझे भगवान देते हैं।
जया किशोरी ने कहा कि मैंने अपनी जिंदगी का रिमोट कंट्रोल किसी और को नहीं दे रखा है। मुझे गुस्सा आता है, मैं रोती भी हूं, मैं उदास भी होती हूं। लेकिन सब अपनी मर्जी से करती हूं। दूसरे के अनुसार, मैं अपना मूड नहीं बदलती। वह आदमी रोबोट है जो रोता, हंसता या गुस्सा नहीं करता।
जया किशोरी ने परीक्षा के समय तनाव खत्म करने के टिप्स दिए। उन्होंने कहा कि नंबर ही सबकुछ नहीं होता। लेकिन अध्यात्म हमें सिखाता है कि सब कुछ जैसा कुछ होता ही नहीं है। सच सिर्फ ईश्वर ही है। बाकी सब चीजें बनती-बिगड़ती रहती हैं।
जया किशोरी ने कहा कि हर व्यक्ति जिंदगी में कुछ न कुछ कर लेता है। अपने बच्चे को किसी से कम्पेयर मत करिए। जिसमें वह बेहतर है उसे और तैयार करिए। जिसमें रुचि नहीं है, उससे वह मत कराए। बच्चों की रुचि के अनुसार उनका करियर चुने। बच्चों को गलत काम की सीख मत दीजिए। जया किशोरी ने कहा कि काम वह करना चाहिए जिसे करके नींद अच्छी आए। अपने बच्चों को ऐसी सीख दे दीजिए। कोई भी जीवन में भूखा नहीं मरता है।
जया किशोरी ने कहा कि बच्चों को हम मॉरल एजुकेशन देने के लिए काल्पनिक कहानियां सुनाते हैं। बेहतर यह होता कि हम उन्हें राम और कृष्ण की असली कहानियां सुनाते। उससे उनमें असल मोटिवेशन आएगा।
मोटिवेशनल स्पीकर जया किशोरी ने कहा कि पूजा-पाठ बुढ़ापे के लिए नहीं है। यह जवानी के दिनों के लिए है। अध्यात्म और पूजा युवाओं के लिए है। ताकि वह जीवन का असली मतलब समझ सकें। होता इसका उल्टा है। जब हम बुढ़ापे में होते हैं तब पूजा करना शुरू करते हैं। अपनी अज्ञानताओं के लिए भगवान से माफी मांगते हैं। यदि वही लोग युवा दौर में पूजा-पाठ का सहारा ले लें तो उनसे गलती ही ना हो।
अमर उजाला संवाद में 'सार्थक जीवन की बात' सत्र में मशहूर कथावाचक और मोटिवेशनल स्पीकर जया किशोरी ने कहा कि मैने इस रास्ते को नहीं चुना, इस रास्ते ने मुझे चुना। मुझे भजन गाना अच्छा लगता है। उन्होंने कहा कि मेरे लिए कथा वाचन शुरूआत में एक खेल ही था।
मनु ने कहा कि मुझे लगता है कि यहां मौजूद काफी लोग जानते होंगे कि जसपाल राणा कौन हैं। वह खुद एक बहुत बड़े शूटर रह चुके हैं। वह काफी मेडल जीत चुके हैं, चाहे वह कॉमनवेल्थ गेम्स हो या एशियन गेम्स। मैं बहुत यंग थी जब उन्होंने मुझे सिखाना शुरू किया था। मेरा आत्मविश्वास उनसे आता है। मैं आज भी कहती हूं कि अगर मेरे कोच नहीं होते तो मेरा आत्मविश्वास बहुत कम होता। पिछले साल ही मैंने दोबारा उनके साथ काम करना शुरू किया। कुछ लोग होते हैं जिन्हें देखकर आपका आत्मविश्वास आता है। किसी के लिए वह भाई होते हैं, किसी के लिए उनके माता पिता, मेरे लिए वह मेरे कोच हैं। जब भी उनको देखती हूं तो मुझे लगता है कि चाहे नतीजा कुछ भी हो, अच्छा हो बुरा हो, गोल्ड जीतूं या नहीं जीतूं वो सब संभाल लेंगे। हम दोनों का ऐसा बॉन्ड है। वो मेरे गॉड फादर हैं। मैं उनकी हर बात मानती हूं। वो कहते हैं ये मैच खेलना है तो खेलना है, ये मैच नहीं खेलना तो नहीं खेलती हूं। रोज छह बजे उठना है तो उठना है, रोज योगा करना है तो करना है तो मेरी उनसे इसी तरह की बॉन्डिंग है।
मनु ने इस सवाल पर कहा कि आप किसी भी प्रोफेशन में हो तो अपनी एक डायरी मेंटेन कीजिए। उससे आपको पता चलेगा कि आपने खुद को कितना मेंटेन किया है। जहां आपने अच्छा परफॉर्म किया है वहां आपने क्या क्या चीजें अच्छी की हैं। डायरी जरूर मेंटेन कीजिए। दूसरी चीज आपको फोकस प्रक्रिया पर करो। ये मत सोचो कि नतीजा क्या होगा। योगा करें। योगा में काफी ताकत है।
मनु ने कहा कि शूटिंग को लेकर एक गलतफहमी है कि सिर्फ खड़े होकर गोली चलाना है। आप जितना ज्यादा दिमागी तौर पर मजबूत होंगे उतना अच्छा परफॉर्म कर पाओगे। एकाग्रता बहुत जरूरी है। जब तक आप एकाग्र नहीं हो तब तक आप उस लेवल का प्रदर्शन नहीं कर पाओगे जिस लेवल तक आप ट्रेनिंग कर रहे हो। आप बहुत सारे ओपन कॉम्पिटीशन लो। जैसे स्कूल की तरफ से ही आपके सामने बहुत सारे दर्शक को बैठा दिया जाए और उनके सामने मैच खेलना है तो आप फिर उसको फील कर पाओगे कि आपको कैसे खेलना है और क्या करना है। आप वैसे ट्रेनिंग करो जैसे कि मैच में कैसे करना है। मैंने भी वैसा ही किया है कि उस परिस्थिति के मुताबिक खुद की ट्रेनिंग करती हूं। रूटीन के मुताबिक काम करिए और किसी प्रतियोगिता में उसी रूटीन को फॉलो करें और किसी बाहरी चीज से डिस्ट्रैक्ट मत हो।
मनु ने कहा कि शुरू-शुरू में जब आपके पास लाइसेंस नहीं होता है तो या फिर उतना फाइनेंसली आप स्टेबल नहीं होते हो तो शूटर्स करते हैं कि किराए पर ले लेते हैं। आप मुझे कुछ समय के लिए मैं आपको इस तरीके से रीपे कर दूंगा या दूंगी। वैसे ही मैंने अपना पहला नेशनल खेला था किराए पर पिस्टल लेकर। वह पिस्टल विनीत सर की थी और वह अभी भी शूटिंग करते हैं। तो मैंने उनसे पिस्टल ली थी और नेशनल खेला था। मुझे बकायदा ग्रिप तो बहुत दूर की बात है ये पता भी नहीं था कि ट्रिगर कितना अंदर होता है 10 मीटर और 25 मीटर में कितना फर्क होता है। वैसे ही मैंने वहां से शुरू किया था। धीरे-धीरे जब तक अपनी खुद की पिस्टल नहीं आई तब तक मैं संघर्ष करती रही इसमें ग्रिप नहीं बनी या ये नहीं हुआ। लेकिन मैंने सोचा कि जैसे-तैसे करके मैं चला लूंगी। आपके अदंर एक भूख होनी चाहिए कि कोई भी परिस्थिति आए तो भी मुझे ये करना है। अगर आप उस चीज को जारी रखते हैं तो कुछ भी कर सकते हैं।
मनु ने कहा कि आप बायोग्राफी पढ़िए। मैं अभी उसेन बोल्ट की बुक पढ़ रही हूं। मैंने देखा है कि वो हार कर जितनी प्रेरणी मिलती है वो जीत से नहीं मिलती। हारने की प्रेरणा बहुत मजबूत होती है। बोल्ट कितनी बार हारे लेकिन उन्होंने उससे प्रेरणा ली और आज देखिए कोई ऐसी प्रतियोगिता नहीं जिसने उन्होंने नहीं जीती हो।
मनु ने कहा कि टोक्यो ओलंपिक के बाद मैं दो महीने डिप्रेस थी। हर जगह मैं जानती थी जहां मैं गोल्ड जीतती हूं, सिल्वर-ब्रॉन्ज नहीं गोल्ड जीतती हूं, लेकिन मैं वहां पिस्टल की वजह से चूक गई। लेकिन लाइफ वहां खत्म थोड़ी हो गई। मैंने सोचा कि मैं फिर से वो मोमेंट क्रिएट कर लूंगी। ओलंपिक के बाद एक महीने तक शूटिंग को देखा तक नहीं था। मोरल ये है कि अगर कभी कामयाबी न मिले तो इसको सोचकर हार नहीं मान लेनी चाहिए। आपको ये सोचना चाहिए कि मैं आगे भी कर सकती हूं। आपके लिए लाइफ में सबसे ज्यादा जरूरी होती है आपकी खुशी। अगर आप हार के बाद भी खुश होने की क्षमता रखते हैं तो आप वो मोमेंट आगे चलकर भी दोहरा सकते हैं।
मनु ने कहा कि मैंने बहुत लंबे समय से नहीं खाया था। रबड़ी जलेबी हर किसी के मन में बसती है। पिछली बार मैंने 2021 में खाया था। तो इसलिए बहुत टाइम हो गया था।
मनु ने कहा कि मैं मानती हूं किसी खिलाड़ी का सफर उसके घर उसके मां से शुरू होती है। अगर पेरेंट्स उसके अपॉरचुनिटी नहीं देंगे तो कैसे होगा। अगर कल को मैं अपने घर पर जाऊं और कहूं कि यह स्पोर्ट्स छोड़कर पढ़ाई करना चाहती हूं तो वो सोचेंगे कल ही तो मेडल जीता आज फिर क्यों। लेकिन मेरे पेरेंट्स ने कभी ऐसा नहीं किया। उन्होंने मुझे मेरी मर्जी से चीजें करने दीं। दूसरी चीज है डिसिप्लिन। अगर कुछ हासिल करना है तो जिंदगी में डिसिप्लिन होनी चाहिए। कोई कल नहीं आता। आपको इस चीज को पकड़ कर रखना है कि कोई चीज करनी है तो करनी है। दृढ़ संकल्प लीजिए। आप अपने स्ट्रगल के बारे में निगेटिव मत सोचिए, बस अपने लक्ष्य के पीछे जाइए। ये सोचिए की जो आप सफर कर रहे हैं वो आगे चलकर आपकी कहानी बनने वाली है। तो बस अपने लक्ष्य के पीछे लग जाएं।
निशानेबाज मनु ने कहा कि मेरे लिए सबसे खास 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स का मेडल था। मैं 16 की थी। मैंने गोल्ड जीता था कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड के साथ। सबने मुझे कॉल किया और बधाई दी कि आपने बहुत अच्छा किया। तब मुझे रियालाइज हुआ कि स्पोर्ट्स को कितना रिकॉगनाइज किया जाता है। मैंने जाना कि स्पोर्ट्स सबको एकजुट कर सकता है सब एक साथ इकट्ठा होकर टीम इंडिया को चीयर करते हैं। इसलिए मैं स्पोर्ट्स की तरफ झुकी क्योंकि इसमें थ्रिल है।
मनु ने कहा कि हम सभी की लाइफ में एक चीज होती है डेस्टिनी। हर चीज में होती है। मैं भी इसमें विश्वास करती हूं। हमारे बॉक्सिंग के कोच बहुत सख्त थे। वो रूटीन को लेकर सख्त थे। हम लेट हुए या कुछ मिस किए तो डांट डपट पड़ती थी। तो मैं बोर हो गई थी। यही मेरे साथ भी हुआ कि एक ही चीज बार-बार करते करते बोर हो गई थी। जब मैंने मार्शल आर्ट्स शुरू किया और तीन बार चैंपियन बन चुकी थी, एक बार ओपन और दो बार स्कूल में तो हमारे एकेडमी ने कहा कि हम लड़कियों को नहीं ट्रेन कर सकते तो ये चीज मुझे बहुत बुरी लगी। फिर मैंने कराटे शुरू किया और इसमें ट्रेन किया। फिर शूटिंग में आई तो कराटे पीछे छूट गया।
मनु ने कहा कि बहुत ही फनी स्टोरी है। शूटिंग मुझे ऐसे मिली कि मैं क्लास बंक करती थी। इंग्लिश हिंदी सोशल साइंस बंक करती थी या फिर मुझे क्लास से बाहर कर दिया जाता था। जब मुझे क्लास से बाहर किया जाने वाला था तो मैं खुद ही बाहर चली जाती थी। स्कूल में ही शूटिंग रेंज खुली थी। जब भी मैं किसी को बताती थी कि मैं शूटिंग कर रही हूं तो दादी पूछती थीं कि कौन सी फिल्म की शूटिंग कर रही हो। फिर मैं शूटिंग रेंज जाना शुरू कर दिया। फिर कोच ने ध्यान देना शुरू किया। मैं पेरेंट्स की बहुत आभारी हूं। उन्होंने कभी मुझे किसी चीज के लिए मना नहीं किया। अभी मैं वायलिस सीखना चाहती हूं। परसों ही मेरे लिए टीचर ढूंढा गया है। जब से नीरज जी ने मेडल जीता है तो काफी लोग स्पोर्ट्स के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। शूटिंग एक बहुत ही ट्रांसपेरेंट गेम है। इसमें ऐसा नहीं होता कि ज्यूरी किसी को जिता देंगे। तो इसलिए मैं इस खेल से ज्यादा जुड़ी।
ये जो स्पोर्ट्स हैं जूडो या कराटे वो इसलिए क्योंकि मेरी स्कूल में लड़ाई बहुत होती थी। मेरा भाई था तो मैं ये सबको कहती थी कि इसको किसी ने परेशान किया तो मैं छोड़ूंगी नहीं। तो सब ने कहा इस गुस्से को चैनलाइज किया। फिर वो सही जगह लगी।
निशानेबाज मनु भाकर ने कहा कि अमर उजाला का बहुत बहुत शुक्रिया। ओलंपिक की जब बात आती है तो पूरा देश इकट्ठा हो जाता है। टोक्यो ओलंपिक मेरा पहला था। मैंने उस तरह का प्रेशर कभी नहीं झेला था। मैं बहुत ज्यादा नर्वस थी। मेंटल ट्रेनिंग योगा कर रही हूं। जो पिछली बार परेशानी हुई थी वो परेशानी इस बार न हो। उसकी पूरी तैयारी कर रही हूं। आपकी आशाओं के साथ मैं तिरंगा लहरा सकूं।
ओलंपिक में निशानेबाज मनु भाकर ने कहा कि पिछले ओलंपिक में मैं काफी नर्वस थी। लेकिन इस बार मानसिक मजबूत होने के लिए काफी तैयारी की है। मनु भाकर ने कहा कि मुझे ट्रेनिंग कैंप में लड़की होने की वजह से मना कर दिया गया। सर से काफी रिक्वेस्ट की, लेकिन एकडेमी में एंट्री देने से मना कर दिया।
डॉक्टर संगीता शर्मा ने कहा कि कई बार प्रेगनेंसी के समय तो हम देखभाल करते हैं लेकिन प्रसव के बाद उसका ध्यान देना बंद कर देते हैं। डिलीवरी के बाद भी महिला का उतना ही ध्यान रखा जाना चाहिए। डॉ. संगीता शर्मा ने कहा कि महिलाएं बच्चे और पति के लिए व्रत रखती हैं अब समय आ गया है कि वह अपने लिए भी व्रत रखें। पढ़ाई के दौरान बच्चों के सामने दूसरे के बच्चों को ग्लोरीफाई ना करें। इससे बच्चा डिप्रेशन में जाता है।
डॉक्टर कनिका सूद ने कहा कि गर्भवती महिलाओं को किसी प्रकार के रेडीयेशन से दूर रहना चाहिए। गर्भवती महिलाएं जितना हो सके प्राकृतिक माहौल में रहें।
डॉक्टर जयदीप मल्होत्रा ने कहा कि मोटापा कई बार कैंसर को जन्म देता है। सात प्रकार का कैंसर की वजह मोटापा होता है। बाहर का खाना और प्लास्टिक बोतल में बिकने वाला पानी कई बार कैंसर को दावत देता है।
महिला रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मंदाकिनी प्रधान ने कहा कि कई बार जन्म के पहले भी बच्चा रोगग्रस्त हो जाता है। वह हमारे के लिए बड़ी चुनौती हो जाता है। महिलाओं की दिनचर्या, खानपान और परहेज से इसी ठीक किया जा सकता है। प्रेगनेंसी के दौरान आपकी दिनचर्या बहुत कुछ बच्चे के स्वास्थ्य पर असर डालती है। उन्होंने कहा कि बहुत सारी बीमारियां होती हैं, पेट के अंदर बच्चे की टेस्टिंग संभव है। जानने के बाद कुछ का हम इलाज कर पाते हैं, कुछ को हम ऐसा बच्चा पैदा करने में रोक सकते हैं। यह काम हम तीन महीने में कर सकते हैं। जन्मपत्री पर उन्होंने कहा कि हम कुंडली मिलाते हैंं। अभी जन्मपत्री मिलना पड़ेगा। ऐसा बहुत जल्दी होने वाला है, शादी से पहले या शादी के बाद जो बीमारी हमारे देश में कॉमन है, जैसे थलासीमिया हो गया, सिकल-सेल या कुछ सांस लेने वाली बीमारियां हैं, या कई तरह की बीमारियां हैं, उसके लिए स्क्रीनिंग कर लें, जहां पर पति-पत्नी दोनों कैरियर हैं, उनका जो बच्चा होगा खतरे में हैं, तो वैसे वाले में प्री नोडल डायग्नोसिस, यानि पेट के अंदर तीन महीने का होते हुए उसको जांच करके हम संभाल लेते हैं।दूसरी बात जो मंदबुद्धि वाले बच्चे हैं, उनके भी हम टेस्ट करके पेट के अंदर संभाल लेते हैं। मैं मीटिंग आने से पहले चार मरीजों का करके यहां दौड़ते हुए आई हूं। एक मरीज का यहां से जाकर पेट के अंदर बच्चे को खून चढ़ाने वाली हूं। कुछ बच्चे होते हैं, जिनका इलाज संभव है।
मानव व्यवहार विशेषज्ञ डॉ. संगीता शर्मा ने कहा कि थोड़ी मात्रा में स्ट्रेस अच्छी होती है। जैसे परीक्षा में स्ट्रेस लेना अच्छा होता है। लेकिन जब वह मात्रा बढ़ जाती है तो वह नुकसान दायक होने लगता है। हमें यह देखना है कि स्ट्रेस को कैसे मैनेज करना है। थोड़ी मात्रा में स्ट्रेस अच्छी होती है, लेकिन जब ये दिन पर दिन बढ़ता है तो आपकी परफॉर्मेंस कम कर देती है। आपको परेशानी झेलने की क्षमता कम करता है।
कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कनिका सूद शर्मा ने कहा कि दुनिया के साथ पूरे देश में कैंसर की दर बहुत तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि 2030 तक 40 से 50 वर्ष के आयु के बीच लोग हैं, उसमें लगभग 47 फीसदी लोग ज्यादा जान गंवाएंगे। इसका मुख्य कारण है तंबाकू का इस्तेमाल। जितने कैंसर दुनिया में होते हैं, उनमें से 33 फीसदी कैंसर का कारण तंबाकू का प्रयोग होता है। मैं दिल्ली में बैठी हूं। दिल्ली जैसे सेंटर पर मैं 70 फीसदी यूपी के मरीजों का इलाज करती हूं। क्योंकि यूपी में तंबाकू का सेवन ज्यादा है। तंबाकू के कारण मुख के कैंसर की तादात 115 प्रतिशत बढ़ गई है। तंबाकू किसी भी कारण से आपको कैंसर कर सकता है। तंबाकू कैटेगिरी वन है। महिलाओं में भी कैंसर बढ़ा है। 2020 में महिलाओं को स्तन 2 लाख से अधिक महिलाओं में स्तन कैंसर बढ़ा है। इसकी मुख्य वजह जीवनशैली बदलना है।
डॉ. जयदीप मल्होत्रा ने कहा कि देश की 15 प्रतिशत महिलाएं बांझपन से पीड़ित हैं। इसलिए टेस्ट ट्यूब उनके लिए वरदान हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही इस बीमारी को इससे दूर की जा सकती है। आईवीएफ एक ऐसी तकनीक है जो लोगों को माता-पिता बनने का सुख प्रदान करती है।
अमर उजाला संवाद में 'आपकी सेहत की सुरक्षा की बात' सत्र में डॉ. कनिका सूद शर्मा, कैंसर रोग विशेषज्ञ, डा. संगीता शर्मा मानव व्यवहार विशेषज्ञ, डॉ. जयदीप मल्होत्रा, आईवीएफ विशेषज्ञ शामिल हुईं।
गीतिका ने कहा कि हर किसी से अगर दिल बात करो, सच्चाई से बात करो और बैठ कर बात करो, कोई ऐसी समस्या नहीं है जो दूर नहीं होगी। जब आप दिल से या प्यार से अपने से बड़े से बात करते हैं ना और इस इनटेंशन से बात करते हैं कि आप ही करोगे मेरे साथ काम। आप ही करोगे इस समस्या का समाधान। दिल से बात करोगे तो सामने वाले के दिल में जाकर घर करेगी। समस्या खुद ब खुद दूर हो जाएगी।
दोनों ही वक्ताओं ने इस बात को प्रमुखता से कहा कि जीवन में संतुलन अहम होता है। आप चाहे घर पर हों या काम पर संतुलन ही जीवन में अहम होता है।
ओसीकम बायो सॉल्यूशंस की संस्थापक और सीईओ अनुराधा आचार्य ने कहा कि पैसे का प्रबंधन बड़ी बात होती है। जैसे एक महिला घर में पैसों का प्रबंधन करती है वैसे ही वह बाहर की दुनिया को भी मैनेज कर सकती है। कई सारी महिलाएं सफल बैंकर हैं।
गीतिका ने कहा कि कई बार महिला को करियर और परिवार के बीच में एक हो चुनना होता है। यह हमें देखना होता है कि हमारी प्राथमिकता क्या है। मैंने यह तय किया जब बच्चों को उनकी मां की जरूरत ज्यादा हो तब हमें मां के रोल को तवज्जो देना चाहिए। गीतिका ने कहा कि ऐसा हमेशा नहीं होता कि ताकतवर महिला हमेशा महिला के साथ खड़ी हो। कई बार ऐसा भी होता है कि एक महिला जब ताकवर हो जाती है तो वह मर्द की तरह बिहेव नहीं कर सकतीं।
गीतिका ने कहा कि जब औरतों को ताकत मिल जाती है तो कई बार वह आदमियों की तरह बर्ताव करती हैं। गीतिका ने कहा कि ये गलत धारणा है कि औरतें पैसे मैनेज नहीं कर सकती है। महिलाएं अपने पैसों को मैनेज कर सकती हैं। पैसे की इज्जत करना बहुत जरूरी है।
मिनिस्ट्री ऑफ टॉक की फाउंडर गीतिका गंजू धार ने कहा कि मैंने तय किया है कि मैं शॉर्ट कट नहीं लूंगी, जब तक बच्चे मेच्योर ना हो जाएं मेरी प्राथमिकता बच्चे ही हैं। उन्होंने अपने जीवन के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि कुछ वैल्यूबल बात नहीं निकल रही है।
अमर उजाला संवाद के दूसरे दिन दूसरे सत्र में ओसीकमम बायो सॉल्यूशंस और मैपेमैनेनोम के संस्थापक और सीईओ अनुराधा आचार्य ने कहा कि हमनें जन्मपत्री को ऑनलाइन की शुरुआत की।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि 2014 से पहले अमेठी में भाजपा को 30 हजार वोट मिलते थे। मैंने 22 दिन में प्रचार किया। 1800 में से 1200 बूथ पहुंची। दिन में 35 जगह भाषण दिए। 30 हजार का वोट बढ़कर तीन लाख हो गया था। 60 फीसदी बूथ पर कुर्सी पर बैठने के लिए लोग नहीं थे। 2019 में लोगों का हुजूम ऐसा जुड़ गया कि उन बूथों पर इक्का-दुक्का लोग मिले जो बैठ सकते थे। बूथ पर बैठना यानी गली या मोहल्ले में खुद पर और परिवार के सिर पर जोखिम मोल लेना होता है। 2024 में आप बूथ पर जाएंगे तो 60 हजार लोग मिलेंगे। लोग पैसे से नहीं जुड़ते। मंचों पर नेता के साथ रहना आसान है। गांव-गली में दहशत के सामने कुर्सी लगाकर बैठना मुश्किल है।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि 140 करोड़ के देश में भारत की सेवा करने के लिए संसद में चुना जाना, अपने आप में बहुत बड़ा सौभाग्य है। सांसदों के जमघट में से भी कैबिनेट में मौका मिले, यह भी सौभाग्य से कम नहीं। सेवा और सौभाग्य को ठुकराकर कौन पलटकर जाएगा? सिंहावलोकन करूं तो मैंने सिर्फ अभिनय नहीं किया, मैंने राइटिंग की, प्रोडक्शन किया, जिसके लिए मुझे पुरस्कृत किया गया। एक चैनल में राजनीतिक शो का हिस्सा रही हूं। मैं मीडिया में स्ट्रिंगर हुआ करती थी। एडिटर भगा दिया करते थे। वे कहते थे कि किसी लायक नहीं हो। कुछ साल पहले उन्हीं एडिटर ने मुझे बुलाया और पुरस्कृत किया। कुछ लोगों को मीडिया को लेकर भ्रांतिया हैं। हार्ड न्यूज के मीडिया के बारे में भ्रांति है कि वे पक्ष देखकर लिखते हैं। जो जनरल एंटरटेनमेंट से हैं, उनके बारे में कहा जाता है कि वे शायद गंभीर नहीं हैं कि वे मुद्दों पर चर्चा कर सकें। मैं मीडिया के दोनों पक्षों से थी तो मेरा बोझ बड़ा था। चित भी मेरी नहीं थी, पट भी मेरा नहीं था। यह मेरी जिम्मेदारी थी कि मीडिया कर्मी के नाते मैं राजनीति में गंभीर योगदान दे सकती हूं। मीडिया जगत के लिए यह मेरा योगदान है। मीडियाकर्मी भी राजनीति से आएं तो उन्हें सम्मान से देखा जाए। हर वर्ग से लोग राजनीति से आते हैं। मीडिया वाले चिह्नित इसलिए होते हैं क्योंकि हम खबरों के सरताज होते हैं। फिर कहा जाता है कि आप महिलाओं के लिए क्या करेंगी? भेदभाव के बीज आप ही बोते हैं। महिला राजनेता हैं तो महिलाओं के लिए क्या करेंगी। पुरुषों से कोई नहीं पूछता।
आपको आलोचना कितनी झेलनी पड़ी?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि सबसे सफल वह व्यक्ति है, जिसकी कोई अभिलाषा नहीं है। जनपथ में मनोज प्रभाकर की कंपनी थी, वहां 200 रुपये दिहाड़ी पर सड़क पर क्रीम बचेगी। मुंबई में 1800 रुपये महीने की बर्तन घीसने की नौकरी करती थी। जिसने यह सब देखा हो, उसके लिए आज यहां होना ही बड़ी सफलता है। मुझे अमेठी में कहा गया कि आप तो 'तुलसी' हैं और पहले भी यहां उम्मीदवार पर गोली चल चुकी है। मेरे लिए संघर्ष आसान था क्योंकि मैं सड़क से उठी हूं। गांधी परिवार के यह लिए मुश्किल है क्योंकि उन्होंने सड़क कभी देखी नहीं थी। मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि सब कुछ चला जाए और दोबारा बर्तन मांजने पड़े, तब भी दो वक्त की रोटी तो कमा ही लूंगी। लोग कहते थे कि एक्टर है तो बुद्धिविहीन होगी। जो व्यक्ति अपमान कर रहा है, वो उन लोगों से कैसे बर्ताव करता है जिनके पास न सत्ता है न शोहरत है। लोग कटाक्ष या अपमान करते थे तो सुनती थी कि क्या आलोचना रचनात्मक है या घमंड की वजह से है। अगर उनका विश्लेषण मेरे बारे में सही है तो मुझे बेहतर करना होगा। कोई घमंड से आपकी आलोचना कीजिए तो मुस्कुराकर आगे बढ़ जाइए। मुकद्दर के आप सिकंदर निकले तो आप उनसे ऊंचे पलड़े पर होंगे। तब आप याद रखें कि क्षमा सबसे बड़ा दान है।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि यूपी वालों का अंदाज-ए-बयां ही ऐसा है, क्या कीजिएगा? यह भी सत्य है कि प्रभु की असीम कृपा रही है कि मैं कहीं कोई डेटा या कोई छंद पढ़ लूं तो आजीवन याद रहता है। मैं पिताजी की चलती फिरती टेलीफोन बुक हुआ करती थी। वे कहते थे कि स्मृति को बुलाओ, उसे नंबर याद होगा। नाना ने मेरा नाम सृति रखा था। पिता पंजाबी थे तो बोले कि जिंदगी भर नाम नहीं ले पाएंगे तो वह स्मृति कर दिया गया, लेकिन डेटा याद रहता है मुझे। अनुभव याद रहते हैं। इसलिए स्पीच लिखकर बोलने वालों में से नहीं हूं। यह शौक सिर्फ गांधी खानदान के लोग रहते हैं।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि मुझे नहीं पता था कि संवाद क्या होने वाला है। अब तक जो भी कहा, वो कैल्कुलेटेड नहीं है। मेरे दादा मुरादाबाद के हैं। उन्हें आप श्रेय दे सकते हैं। लोगों को गलतफहमी थी कि ये मुंबई से आई हैं। दादी महाराष्ट्र से हैं। नानी असम, नाना बंगाल से हैं। पति गुजराती पारसी हैं। मेरे साथ भाषा का अभाव नहीं है। हम एक गलतफहमी जरूर पालते हैं कि जो हमें सुन-देख रहा है, वह अपने अनुभव से टटोल नहीं पा रहा कि हम कितना सच या साफ बोल रहे हैं। मैंने जीवन में अपने लिए एक ही नियम रखा कि जिससे आप बतिया रहे हैं, उसके साथ कम से कम गरिमा और सम्मान से पेश आएं। वो जान सकता है कि जो आपके दिल में है, क्या वही आपकी जुबान पर है? मुझे ऐसा भी लगता है कि कोई भी व्यक्ति जीवन में त्रुटि न करे, यह संभव नहीं है। स्वाभाविक रूप से व्यक्ति अक्लमंद तब है, जब वह गलती पर माफी मांगे और विनम्र है। इस देश का दिल बड़ा है, वह अच्छे-अच्छों को माफ कर देता है।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि सुषमा स्वराज जी लीजेंड हैं। उनसे मेरी तुलना होना सही नहीं है। सुषमा जी की पीढ़ी ने तब संघर्ष किया, जब भाजपा में होना अपने आप में दुर्लभ दृश्य होता था। बहुत सारे साथी नहीं मिलते थे। मीडिया से मुखातिब होना आसान नहीं था। उनकी शैली और उनका योगदान भिन्न था। मेरा नाम उनके साथ लिया जाता है तो वह उनकी तौहीन होगी। उनका अपना योगदान है। मेरी अब तक औकात नहीं हुई है कि मेरा नाम सुषमा जी के साथ लिया जाए।
गुड़गांव में न्यू कॉलोनी में आर्य समाज मंदिर के पास यह घर था। ड्राईक्लीनर भागा-भागा आया और उसने कहा कि आप यहां रहती थीं। मुझसे मेरे परिवार ने कहा कि खरीदना है घर? मैंने कहा कि नहीं... कोई अपनी बदकिस्मती को नहीं खरीदता। सात साल की उम्र में आपको जहां से निकाला गया, आप वहां क्षमतावान बनकर लौट पाओ, यही आपका सौभाग्य है। जब पीएम मोदी यह कहते हैं कि हमने 25 करोड़ लोगों को गरीबी से उबारा तो यह आंकड़ा नहीं हकीकत है। मैं खुद को इससे जोड़ना चाहता हूं क्योंकि मैं भी एक वक्त गरीबी का वह आंकड़ा थी। मैंने कभी भी विक्टिम बनना मंजूर नहीं किया। यह बात मैं इसलिए कह रही हूं कि जब हम सफलता की सीढ़ी चढ़ते हैं, जीवन के सामाजिक-आर्थिक पड़ावों से उत्तीर्ण होते हैं, तब लोगों को यह खुशफहमी होती है कि हम सब अच्छा-अच्छा बोलें ताकि हमारा वैभव बना रहे। मैं संभावनाओं का प्रतीक हूं कि महिला ठान ले तो अपने दम पर संस्कारों से समझौता किए बिना, झुके बिना आगे बढ़ सकता है। झुकना सीखो यह बचपन से सिखाया जाता है, मैं सख्त रीढ़ के साथ मर पाऊं, यही अभिलाषा। झुकूं तो बड़ों के सामने विनम्रता से और बच्चों को दुलार करने के लिए। इसलिए नहीं झुकूं कि सामने वाला ताकत और घमंड रखता है।
स्मृति जुबिन ईरानी: मैं सात साल की थी, जब घर छोड़ना पड़ा था। मां के साथ हम तीन बहनें थीं। जब घर से निकाला जा रहा था, उस घर के सामने मैं खड़ी रही। मां ने कहा कि क्या ताक रही हो घर को। मैंने मां से कहा कि एक दिन आएगा, जब मेरी इतनी औकात होगी कि जिस घर से तुम्हें निकाला है, वो घर मैं खरीद सकूं। मुझे याद है कि तब मुझे कसकर चांटा पड़ा था क्योंकि मेरी मां ने मुझसे कहा था कि हम एक ऐसी आर्थिक पृष्ठभूमि से हैं, जहां न कोई ऐसे सपने देखता है, न बयां करता है। शायद उन्हें इस बात की तकलीफ थी कि मैं ऐसा सपना न देखूं, जिससे दिल टूटे। आज मेरे अपने बच्चे हैं तो मुझे यह समझ आता है कि माता-पिता क्यों बच्चों को उनकी महत्वाकांक्षाओं से ही बचाए रखना चाहते हैं। जिंदगी में दूसरा मौका तब आया, जब मैं परिवार के साथ उसी के घर के सामने पहुंची। यह 15 साल पहले की बात है। तब मुझे एहसास हुआ कि जो घर मुझे महल-सा लगता था, वह असल में ड्राईक्लीनर का लॉन्ड्री वॉशरूम था।
उन्होंने कहा कि मैं दो बार भाजपा की राष्ट्रीय सचिव रही। पांच बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य रही। यह सत्य नकारा नहीं जा सकता कि लुटियंस मीडिया हकीकत से कटा हुआ है। उनके बीच चर्चा रही कि यह महिला कहां से आ गई। राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ लीं तो कौन सा तीर मार लिया। अगर यह पूछें कि सबसे मुश्किल पल क्या रहा? मेरे लिए गौरव का विषय था कि मेरे पास मीडिया में प्रतिभा को दर्शान को मौका था। राजनीति में योगदान देने का मौका था। गरीबी का चेहरा मैंने सालों-साल देखा है।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि बहुत लोगों को खुशफहमी है कि मेरी मीडिया और राजनीति की यात्रा भिन्न थी। मेरा यह सौभाग्य रहा कि मैं WHO की USAID की राजदूत रही। तब मेरी उम्र 23 साल थी। तब मैं विश्व स्वास्थ्य संगठन में महिला और स्वास्थ्य से जुड़े विषय पर काम कर रही थी। 25 साल की उम्र में कार्यकाल खत्म कर राजनीति में आई। मैंने 27 वर्ष की उम्र में पहला चुनाव लड़ा। दोनों मुख्तलिफ चीजें रहीं, यह सच नहीं है। कुछ लोगों ने मुझे राजनीतिक रूप से तब खोजा, जब मैं अमेठी में चुनाव लड़ने गई। उन्हें नहीं पता था कि तब तक मैं दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुकी थी। उन्हें नहीं पता था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर देश की संसद की यूनियन होती है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मैं सर्वसम्मति से सीरियाई संकट से जुड़ा प्रस्ताव लिखने के लिए चुनी गई थी।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि पहली बार गांधी परिवार ने स्वीकार किया है कि राजनीति उनके लिए किसी दुकान से कम नहीं है। पहली बार उन्होंने एलान किया है कि राजनीति उनके लिए कारोबार है। मोदी जी के लिए तो यह सेवा का माध्यम है। जो खुद को चिह्नित करके दुकानदार बता दे, जनता उसे भविष्य का सौदा करने के लिए वोट क्यों दे?
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि अगर आप अमेठी का राजनीतिक विश्लेषण करें तो 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक कमान प्रियंका वाड्रा के हाथ में थी। अमेठी की पांच में से चार विधानसभा में प्रियंका और राहुल गांधी दोनों मिलकर चुनाव प्रचार करने आए थे। जिन चार सीटों पर वे प्रचार करने आए, चारों पर कांग्रेस की जमानत जब्त हो गई। 2019 में कांग्रेस का प्रत्याशी अकेले नहीं लड़ा था। हमने 2019 में ही इंडी अलायंस को हरा दिया था। तब चार लाख से ज्यादा वोट मिले थे। शायद ही किसी ने यह विश्लेषण किया हो कि 2019 के चुनाव में भाजपा को जो अमेठी में वोट मिला, तब वह अमेठी के इतिहास में किसी प्रत्याशी को मिले सबसे ज्यादा वोट थे। अगर आप 2022 के विधानसभा चुनाव की समीक्षा करें तो पाएंगे कि पूरे लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस में महज 1.40 लाख वोट ही बचे हैं। अगर वे ये बचे हुए वोट लेने आना चाहते हैं तो उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। मैंने उनकी राजनीति को जितना देखा है, उससे पता चलता है कि जहां संघर्ष है, वहां वे कदम नहीं रखते।
स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा कि जिन्होंने 2019 में अमेठी छोड़ दिया, अब वे वायनाड छोड़ने की तैयारी में हैं। अमर उजाला के मंच पर आई हूं, मुझ तक यह खबर भी न पहुंचती तो लानत है। अमेठी में कौन लड़ेगा, यह भाजपा का संसदीय बोर्ड बताएगा। जब आप ऐतिहासिक जीत दर्ज कर लें तो बहुत मुश्किल होता है। मैंने पांच साल में एक ही जवाब दिया है। अमेठी में कौन लड़ेगा, यह निर्णय भाजपा संसदीय बोर्ड ही करेगा। कार्यकर्ताओं से अपेक्षा है कि मर्यादा का उल्लंघन न करें। जो भी लड़ेगा, 400 पार के आंकड़े में अमेठी से कमल का एक फूल जरूर जाएगा।
उन्होंने कहा कि नौ साल, 11 साल के बच्चों को देखकर यह निर्णय लेना पड़ा था कि परिवार सुरक्षित रहे, इसलिए वह अमेठी न आए। भद्दी बातें कही जाएंगी, सब चुपचाप सहना है। बड़ों-बच्चों को साथ बैठाना और उन्हें समझाना अपने आप में जीवन की अलग किताब है। वहीं से अमेठी का सफर शुरू हुआ। यह चर्चा हमारे घर में मात्र एक घंटे की रही। मां और पूरा मायका संघ की पृष्ठभूमि से है। निर्णय लेने में वैचारिक कठिनाई नहीं थी। बस परिवार की दृष्टि से भावनात्मक चुनौती थी। एक घंटे में पारिवारिक निर्णय हुआ और बाकी सब इतिहास है। रात 11:40 बजे मैंने पार्टी नेतृत्व को बताया कि हां मैं अमेठी से चुनाव लड़ूंगी।
स्मृति जुबिन ईरानी: जब पार्टी नेतृत्व ने बताया कि अमेठी से प्रत्याशी बनना है। 22 मार्च 2014 की शाम थी। बात सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन मैंने कहा कि मुझे घर पर एक बार पूछना है। मुझे इस बात का अहसास था कि अमेठी की लड़ाई साधारण राजनीतिक लड़ाई नहीं होगी। उसका खामियाजा मुझे नहीं, बल्कि पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा। 2014 में तब केंद्र में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सरकार थी। प्रदेश में सपा की सरकार थी। दोनों तरफ दो खीचीं हुई तलवारों के मध्य में मुझे अमेठी में प्रवेश करना था। अमेठी वह क्षेत्र है, जहां चुनावों में उम्मीदवार की हत्या हो जाती है या गोलियां चल जाती हैं। जब परिवार को मैंने फोन पर यह बताया तो मुझसे पूछा गया कि अनहोनी हो जाए तो क्या करोगी? 10 साल पहले एक बच्चा नौ साल और एक 11 साल का था। तब पति-पत्नी ने बैठकर निर्णय किया कि आप कभी मत अमेठी आइएगा क्योंकि दोनों में से एक को बच्चों के लिए जीवित बचना चाहिए। जब आज हम कहते हैं कि हम 400 सीटों के पार जाने वाले हैं, तब यह समझना मुश्किल हो जाता है कि 2014 में क्या मंजर रहा होगा।
कल आपके मंच पर उपमुख्यमंत्री आए थे। 2019 में जब वे प्रचार पर आए तो लोगों से मिलने पर कहा गया कि दीदी किराए के घर में रहती हैं तो वे अपना मकान बनाएंगी। उन्होंने कहा कि मैं वादा करता हूं कि दीदी मकान बनाएंगी। भाई के मुख से यह बात निकल गई तो बात पूरी करनी थी। यह सौभाग्य है कि मेरे लिए यह 10 साल की यात्रा का अहम पड़ाव है।
केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने संवाद में कहा कि अमेठी तो 2014 में ही मेरा घर बन चुका था। फर्क यह था कि कमरा किराए पर था। कुछ लोग कहते थे कि मैं अस्थाई हूं। कुछ लोगों को कमरे का किराया देने में झिझक होती थी कि मैं रहूंगी तो कांग्रेस के किसी कार्यकर्ता के गुस्से की आग में वह झुलस न जाए। तब पूरी जनपद में रहने को जगह नहीं मिली तो गौरीगंज के मध्य में खेत में सीमेंट का गोदाम था। कार्यकर्ता वहां ले गए और कहा कि यहां कमरा मिल सकता है। सीमेंट की बोरियों के बीच से राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई। हम चार-पांच महिला कार्यकर्ता थीं। उनमें से कई ऐसे परिवारों से थीं जिन्होंने फर्श पर सोने की कल्पना नहीं थी। उन्हें पता था कि सफर कठिन है। क्षमताओं के आधार पर इतिहास लिखा जाना था। उन्हें फर्श और टपकती छत मंजूर थी। कीड़े-मकोड़े भी टपकती छत के साथ मौजूद रहते थे।
अमर उजाला संवाद कार्यक्रम शुरू हो गया है। केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने दीप प्रज्वलित किया।
अमर उजाला संवाद कार्यक्रम कुछ देर में शुरू होगा। केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी पहुंच गई हैं।
एलवाइस म्यूचुअल फंड की एमडी व सीईओ राधिका गुप्ता, लुलु ग्रुप के रीजनल डायरेक्टर जयकुमार गंगाधरन, पीडब्ल्यूसी इंडिया के एसोसिएट डायरेक्टर मो. आसिफ इकबाल के विचार लोगों ने बड़े चाव से सुने। कौशल विकास व उद्यमिता मंत्रालय के सचिव अतुल कुमार तिवारी ने युवाओं के विकास पर बात की। ले. जनरल (रि.) राजेंद्र रामराव निम्भोरकर, पद्मश्री पीटी उषा और साइना नेहवाल ने पहले दिन संवाद में हिस्सा लिया। शाम को मेहमानों ने तलत अजीज की गजलों का आनंद लिया।
अभिनेता अक्षय कुमार ने प्रदेश में आए बदलावों के लिए सरकार को सराहा। अयोध्या के संत मिथिलेश नंदिनी शरण और भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने ‘राममंदिर से राष्ट्रमंदिर’ की संकल्पना पर प्रकाश डाला। वहीं, रामलला के मूर्तिकार अरुण योगीराज ने मूर्ति तराशने के अपने अनुभव साझा किए।
सोमवार से शुरू हुए दो दिवसीय आयोजन में राजनीति, अध्यात्म, खेल, उद्योग, सैन्य और फिल्म जगत की नामचीन हस्तियों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के बदलते परिवेश और सरकार की प्राथमिकताओं की जानकारी दी।
अमर उजाला संवाद का दूसरा दिन मंगलवार महिलाओं के उत्थान, स्वास्थ्य और उनके संघर्ष पर केंद्रित होगा, जिसमें केंद्रीय मंत्री स्मृति जूबिन इरानी व प्रदेश सरकार की सभी पांच महिला मंत्री हिस्सा लेंगी। आध्यात्मिक वक्ता जया किशोरी भी मौजूद रहेंगी। कार्यक्रम सुबह 10 बजे से शुरू होगा।