अरशद: लीजेंड वाली फीलिंग तो नहीं आती। हां, ये जरूर लगता है कि मैच्योर हो गया हूं। मैं दुबई में घूम रहा था पिछले दिनों, तो ग्रैंड पेरेंट्स ने कहा, 'सर्किट'। वहीं बच्चों ने कहा, 'गफ्फूर'।
अरशद वारसी ने मजाकिया अंदाज में कहा, मेरे पास अक्सर वही किरदार आते हैं जो सभी रिजेक्ट कर चुके होते हैं। जॉली भी सबने रिजेक्ट की थी तब मेरे पास आई थी।
योग और प्राणायाम पर चर्चा से पहले योगगुरु रामदेव ने अमर उजाला के मंच पर प्राणायाम और योगाभ्यास कर फिटनेस का संदेश भी दिया। उन्होंने बताया कि कपालभाति, अनुलोम-विलोम जैसे विकल्पों को अपनाकर हम वायु प्रदूषण की चुनौती से निपट सकते हैं। उन्होंने भ्रामरी और उद्गीथ प्राणायाम आदि का जिक्र करते हुए कहा कि इससे हमारे कार्यक्रम का मंगलाचरण बेहतरीन तरीके से हुआ है।
जनरल नरवणे: ऐसा नहीं है कि सब कॉर्पोरेट की तरफ भाग रहे हैं। युवाओं में देशभक्ति कायम है। जैसे- हरियाणा के युवक हैं, उन्होंने बहुत देश की सेवा की है। हम यही चाहेंगे कि वे देश की ऐसे ही सेवा करते रहें।
जनरल नरवणे: दो किस्म के खतरे हैं। एक बाहरी और एक अंदरूनी। बाहरी खतरे से निपटना आसान है। उसे टारगेट करना आसान है। अंदरूनी सुरक्षा की जब बात आती है, तब यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन देश के खिलाफ काम कर रहा है। देश के कानूनों का पालन करते हुए कार्रवाई करनी होती है। फौज के पास जो बड़े-बड़े हथियार हैं, वह अंदरूनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकते। अंदरूनी सुरक्षा में फौज का जितना कम से कम इस्तेमाल हो, वही अच्छा है। पहले हम मानते थे कि आतंकवाद से अनपढ़ लोग जुड़ जाते हैं, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि अब डॉक्टर-इंजीनियर ऐसी हरकतें कर रहे हैं। यह सोच का विषय है कि कमी कहां रह गई है, जो लोग बहकावे में आ रहे हैं। आतंकवादी को मारना काफी नहीं है, वह आतंकी क्यों बना, उस पर विमर्श करने की ज्यादा जरूरत है। हम 10 आतंकी को मारेंगे, तो 10 और पैदा होंगे। हमें यह विमर्श करना है कि लोग क्यों बहकावे में आ रहे हैं?
जनरल नरवणे: हमारे दो पड़ोसी हैं, जिनके साथ हमारे सीमा विवाद हैं- पाकिस्तान और चीन। चीन के साथ दिक्कत इसलिए है वहां बाउंड्री है, न कि बॉर्डर। वह अभी वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा में नहीं बदल पाई है। हर साल अरुणाचल या सिक्किम जैसे 10-12 इलाकों में कहीं न कहीं टकराव की स्थिति बनती है। पिछले कुछ वर्षों में एक बात सरल तरीके से सामने आई है कि बाउंड्री के इस मसले को बातचीत के जरिए ही सुलझाया जा सकता है। यह साफ है कि इसका सैन्य समाधान नहीं है। इसे राजनीतिक या कूटनीतिक तरीके से ही सुलझाया जा सकता है। सभी इस बात को समझ चुके हैं।
जनरल नरवणे: लोगों को पहले चार साल के लिए भर्ती किया जाएगा। फिर चार साल कुछ लोगों को रखा जाएगा। वो स्थायी हो जाएंगे। कुछ लोगों को रिलीज कर दिया जाएगा। वे बाद में अपना कुछ व्यवसाय कर सकते हैं। इसका विरोध हुआ, लेकिन लोगों को इतिहास नहीं पता। 1975-76 तक पेंशनेबल सेवा नाम की कोई चीज नहीं थी। सात साल की सेवा के बाद जवान बाहर हो जाते थे। 1971 की लड़ाई के बाद तब की सरकार ने सोचा कि यह नीति ठीक नहीं है। पेंशन सेवा को सात साल में लागू नहीं किया जा सकता था। इसलिए सेवा शर्तों को बदला गया। उसे बढ़ाकर 15 साल किया गया और पेंशन लागू की गई। अग्निवीर योजना बीच का रास्ता है। चार साल में कुछ लोग बाहर होंगे, कुछ बने रहेंगे। जो बने रहेंगे, उन्हें पेंशन भी मिलेगी। कोई भी योजना 100 फीसदी सही नहीं हो सकती। कोई न कोई कमी-पेशी उसमें हो सकती है। सरकार को सेना की तरफ से जमीनी स्तर से जो फीडबैक मिलेगा, उस पर विचार होगा। बुनियादी स्तर पर इस योजना में ऐसा कुछ नहीं है, जो देश या फौज के लिए अच्छा न हो। ऑपरेशन सिंदूर में कौन लड़ा? यही अग्निवीर लड़े हैं। हमें कोई कमी नजर नहीं आई। हम ऐसा क्यों मानते हैं कि चार साल में लोग अच्छा काम नहीं कर सकते। जब 15 साल बात आई थी, तब फौज में इसका विरोध किया था। कहा गया कि हमारी सेना बूढ़ी हो जाएगी। अग्निवीर के जरिए सेना के जवानों की औसत आयु को कम रखने के लिए लाया गया है। बाकी देशों में तो दो साल के लिए ही सेना में रखा जाता है। हमें एक युवा फौज चाहिए, जो हर मैदान में फतह कर सके।
जनरल नरवणे: हमारे कई पास हथियार हैं। हम पहले देखते हैं कि लक्ष्य क्या है, उसे साधने के लिए क्या सही है, वही इस्तेमाल होता है। अगर लगता है कि ब्रह्मोस सही निशाना साधेगी, तो उसका इस्तेमाल होगा। कितनी जल्दी आप रणनीति बदल सकते हैं, वही सही तरीका होता है।
जनरल नरवणे: फरवरी 1994 का संसदीय प्रस्ताव कहता है कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, जिस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है और भारत का यह प्रण है कि वह हरसंभव तरीके से उसे वापस लाने के प्रयास करेगा। ...इसे सुनकर किसी को भी इस बात पर संदेह नहीं होना चाहिए कि पीओके भारत का हिस्सा है। ...पीओके हमारा था, है और रहेगा।
जनरल नरवणे: इसके दो पहलू हैं। युद्ध की प्रक्रिया और युद्ध का स्वरूप। युद्ध की प्रक्रिया सदियों से नहीं बदली। वह एक ही है कि मारो या मरो। प्रक्रिया यही है कि खून बहेगा, जानें जाएंगी। नुकसान होगा। बदलाव सिर्फ स्वरूप में आया है। स्वरूप हमेशा बदलता रहा है। पुराने जमाने में लोग धनुष-बाण से लड़ते थे। अब ड्रोन आ गए हैं। जैसा हमने ऑपरेशन सिंदूर में देखा कि एक नया युग आ चुका है। संपर्क रहित युद्ध प्रणालियों पर जोर है। इसके ये मायने नहीं हैं कि सरहद पर आमने-सामने की लड़ाई या मुठभेड़ नहीं होगी। अगली लड़ाई कैसी होगी, वह हम इस वक्त नहीं कह सकते। हर जंग अलग होती है। हम सिर्फ पिछली जंग से सबक सीख सकते हैं और उस पर अमल कर हम ज्यादा तैयार रहें और सफल बनें।
पूर्व थल सेना अध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त) अमर उजाला संवाद के मंच पर पहुंच गए हैं। उनसे नेतृत्व, सुरक्षा और भावी रणनीति पर चर्चा हो रही है।
आलोक श्रीवास्तव संवाद के मंच पर पहुंच चुके हैं। उन्होंने सबसे पहले कविता के साथ शुरुआत की। उन्होंने कहा, 'जो यह कहते हैं कि धर्म पहले, उनसे मैं कहता हूं कि नहीं, राष्ट्र पहले, देश पहले। इसलिए मैंने कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्र वंदना से की। इसके बाद वे ईश वंदना की तरफ दर्शकों को लेकर गए'। उन्होंने 'राम क्या हैं' कविता की पंक्तियां सुनाईं।
ईशांत ने कहा कि लाइफ सर्किल की तरह चलती है। कभी न कभी उस सर्किल में वापस में तो आना पड़ता है। अच्छी चीज है कि आप अपने धर्म से जुड़ रहे हैं, आप अपने भगवान से जुड़ रहे हैं। ये सब चीजें कॉन्फिडेंस बढ़ाती है, आपको लड़ने की शक्ति देती हैं। जब चीजें आपके हिसाब से नहीं चल रही हैं तो क्या करना चाहिए, उनमें ये सब चीजें जरूरी हो जाती हैं। क्रिकेट आप एक समय तक खेल सकते हो। उसके बाद में क्या है वो ज्यादा जरूरी है। सबसे पहले आती है फैमिली। वो फैमिली आपको परिवार आपके डिस्क्राइब करती है कि एक इंसान के तौर पर कैसे हैं। जो समय आप परिवार के साथ बिताते हैं वो बताती है कि इंसान के तौर पर आप कैसे हैं।
ईशांत ने कहा कि अगर कुछ खास नहीं होता विराट में तो इतने बड़े रिकॉर्ड तो नहीं बनाता। कुछ न कुछ खास तो है विराट में। जो सबसे बड़ी चीज है वो है सेल्फ बिलीव। कोई भी सिचुएशन आ जाए मैं अपनी टीम को मुश्किल से निकालूंगा और मैच जिताऊंगा। खराब से खराब परिस्थिति में भी मैच जिता के लाऊंगा, यही उसकी सोच है और खासियत है।
ईशांत ने कहा कि बेटी के पिता होने में सबसे बड़ी चीज है कि कभी आपको पेशेंट बनना पड़ता है, कभी आपको पार्लर का कस्टमर बनना पड़ता है। आई लैशेश लगती है, नेल पॉलिस लगती है, मैनिक्योर पैडिक्योर करना पड़ता है। मैं अपनी पत्नी को भी मना कर देता हूं कि ये तस्वीरें बाहर नहीं जानी चाहिए।
ईशांत ने कहा कि बेटी के साथ कम टाइम स्पेंड कर पाता हूं, शायद ये लोगों को कम पता है।
ईशांत ने कहा कि बाहर दोष मत निकालो कभी भी। अगर आप गलतियां बाहर ढूंढने लगोगे तो खुद कभी इम्प्रूव नहीं कर पाओगे। मैं हमेशा गलतियां खुद में ढूंढने की कोशिश करता हूं। मैं कोशिश करता हूं कि जब प्रैक्टिस के लिए जाऊं तो उस गलती को न दोहराऊं। जब आप वो गलती नहीं दोहराओगे तो एक अलग आत्मविश्वास जगता है। आप मैच्योरिटी के साथ प्रदर्शन कर पाओगे। बाहर गलतियां मत ढूंढो। खुद में गलती ढूंढोगे तो और बेहतर हो पाओगे।
ईशांत ने कहा कि वो एक प्लान था। अगर हम उस मैच में स्टीव स्मिथ को आउट नहीं करते तो वो टेस्ट मैच हम हार सकते थे। वो सब चीजें हीट ऑफ द मोमेंट में हो गईं। आप बाहर ये सब चीजें नहीं करते। आप जब खेलते हैं और जब आप बाहर होते हैं तो आपकी पर्सनैलिटी अलग अलग होती है। अगर आप अपना काम पूरी शिद्दत से या ईमानदारी से नहीं करोगे तो रिजल्ट नहीं मिलेगा।
ईशांत शर्मा ने कहा कि हां अगर जब बेटी देखने देती है। बेटी को हम नौ स्क्रीन टाइम दें। इसके बाद अगर थोड़ी सी एनर्जी बचती है तो रात में थोड़ा सा।
ईशांत शर्मा ने कहा कि मैं जो 100 टेस्ट खेला, उससे भी ज्यादा। ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में हराना बहुत मुश्किल काम है। आप सिर्फ उनके 15 खिलाड़ियों के खिलाफ नहीं खेलते, उनके पूरे देश के खिलाफ खेलते हो। जब आप खाना खाने जाते हो तो भी स्लेजिंग मिलती है, जब कॉफी पीने जाते हो तो भी आपको स्लेजिंग मिलती। वहां की भीड़ आपको फील कराती है कि आप सिर्फ ऑस्ट्रेलिया टीम के खिलाफ नहीं खेल रहे, बल्कि पूरे ऑस्ट्रेलिया देश के खिलाफ खेल रहे हो।
ईशांत शर्मा ने कहा कि मैं हमेशा यकीन करता हूं कि ग्रजेज या पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। आगे क्या है उसपर ध्यान देना चाहिए। जैसे जैसे आप कोई भी स्पोर्ट हो लाइफ हो, अगर आप गलती करते हैं और तो उससे सीखते हैं। क्रिकेट में एक चीज है कि आप जो एक बार गलती हैं, उसे कितने समय बाद रिपीट करते हैं, वो कंसिस्टेंसी होती है। तो वही मैं कोशिश करता था कि गलती मैं जितने टाइम तक टाल सकूं। जब हम 2018 में ऑस्ट्रेलिया में पहली बार टेस्ट सीरीज जीती वो एक ऐसी याद है कि वो हमेशा मेरे दिल के करीब रहेगी।
इशांत शर्मा ने कहा कि ऐसा कुछ था नहीं, जितना आपने उसको बना दिया। जो हमारा काम था, वो हमने किया। मैं यंग था रॉ था..जब आता था और सिर्फ बॉलिंग करता था। कुछ ज्यादा पता नहीं था। कभी भी ये ध्यान नहीं दिया कि कौन बैटर है। हमने अपना काम शिद्दत से किया। आप एक चीज भूल गए कि मेलबर्न में ड्रेसिंग रूम की वॉक बहुत लंबी होती है।
अगम खरे ने कहा कि प्रोटीन डिफिशिएंशी देश होने के कारण लोगों में प्रोटीन खाने की होड़ है। यह सही नहीं है। ऐसा किसी प्रोफेशनल की परामर्श से ही किया जाना चाहिए। जीवन में जो समय हमें मिला है उसमें ऑथेंटिक होना हमारे लिए जरूरी है। जब तक आप ऐसा करेंगे तो आप पैसे के लिए कॉम्प्रोमाइज नहीं करेंगे।
खरे ने आगे कहा कि हर मनुष्य की अपनी खुद की माइक्रोबायोम यानी सूक्ष्मजीवों होती है। इसमें करीब 40 ट्रिलियन जीवाणु होते हैं। ये स्वस्थ रहे तो इंसान भी स्वस्थ रहता है। जब तक आप नेटिव फूड खाते रहते हैं तो आपका शरीर उसे अच्छे से रेस्पॉन्ड करता है। नई चीज खाने पर उसे एडजस्ट करने पर समय लगता है। आपका शरीर क्या चाहता है उसी अनुसार हमें भोजन का चयन करना चाहिए। जरूरी नहीं है रील्स पर दिख रहा हर चीज सही हो। इसे तौलना जरूरी है। हमें तय करना होगा कि हमारे शरीर के लिए सबसे उचित खाना क्या है। जीवन में सबसे जरूरी चीज है कि धरती से जुड़ी हुई चीजों को असल रूप में इस्तेमाल करें। इसे अधिक बनावटी बनाएंगे तो परेशानी होगी।
बायोसाइंस के क्षेत्र में काम करने वाले अगम खरे जी ने कहा कि तीन समस्याएं हैं। पहला सप्लाई चेन, दूसरी अवेयरनेस और तीसरा क्वालिटी अवेयरनेस। उन्होंने कहा कि पहली समस्या है कि आज विश्व में हम इतना खाना उत्पादन करते हैं कि दुनिया को समय पर भोजन मिल सकता है। पर वह समय पर पहुंच नहीं पाता है। ऐसा शहरों से दूर गांवों में उत्पादन के कारण होता है। कुछ दक्षिण में उगता है तो कुछ उत्तर में। यदि हमारी सप्लाई चेन मजबूत नहीं होगी तो हमें परेशानी होगी। इसे मजबूत करना बड़ी चुनौती है। सरकार ने इस दिशा में अच्छे कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि खान-पान और पोषण के प्रति लोगों में जागरूकता भी जरूरी है।
हेल्थकेयर को डिजिटल बनाने पर नीतिन नाग ने कहा कि इस क्षेत्र में नई तकनीकों से सुविधाओं को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे कन्टीन्यूटी ऑफ केयर को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसे सुधारने के लिए हम प्राइमरी केयर सेंटर खोल रहे हैं।
टैलेंट सप्लाई गैप पर दिया जोर
चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े मानव संसाधन को सही जगह पर बनाए रखना थोड़ा मुश्किल है। हालांकि अब सोच बदल रही है। फिलहाल मेट्रो से लेकर छोटे शहरों तक का सफर तय करना जरूरी है। दिल्ली में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना और गुड़गांव में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना काफी बेहतर है। इस वजह से लोगों की सोच में बदलाव आ रहा है। हमारे हॉस्पिटल नेटवर्क में 5000 लोग काम कर रहे हैं इनमें से 85 प्रतिशत वहीं से हैं। हम लोकल आंत्रप्रन्योरशिप को प्रमोट कर कर रहे हैं। पर टैलेंट सप्लाई गैप अभी भी है। छोटे शहरों में कमी के हिसाब से यह गैप दूर नहीं हुआ है।
पोषण, सेहत और स्वस्थ्य भारत सत्र में बायोसाइंस और कृषि प्रौद्योगिको क्षेत्र से एब्सोल्यूट के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी अगम खरे और उजाला सिग्नस प्रमुख नितिन नाग अमर उजाला संवाद के मच पर अपनी बात रख रहे हैं। नीतिन नाग ने कहा कि अगर हम देखें तो विकास अधिकतर मेट्रो शहरों में हुआ है। विकास मेट्रो फोकस्ड है। ज्यादातर सुविधाएं मेट्रो में स्टेबल है। इस कारण से टीयर 2 और टीयर 3 शहरों में नुकसान हुआ है। हेल्थ इंफ्रा यानी स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा शहरों से गांवों तक नहीं पहुंच पाया है। इंफ्रा का कॉस्ट भी बढ़ता ही जा रहा है। इससे लोगों को दिक्कत होती है। मेट्रो में दिक्कत उतना दिखता नहीं है। यहां लोग अफोर्ड कर सकते हैं। पर मेट्रो से बाहर जाने पर समस्याएं ज्यादा दिखती है।
जैस्मिन ने कहा कि मुझे कभी इंजरी हुई नहीं। हम देखते हैं कि हमारे आसपास के बहुत से खिलाड़ी इंजर्ड हुए। इससे उनके छह सात महीने निकल जाते हैं। हमने तो देखा है। उस टाइम पर निगेटिव विचार भी आते हैं। वो अकेले अकेले सोच के खुद भी परेशान होते हैं। लेकिन वो फिर भी करते रहते हैं। मैं ठीक होऊंगा।
योगेश्वर ने कहा कि खिलाड़ी के लिए सबसे बुरी चीज इंजरी होती है। किसी प्रतियोगिता के समय लग जाए तो प्रतियोगिता से दूर कर देती है। मेरे पांच ऑपरेशन हुए पैरों के। डिश स्लिप भी हुई थी। इंजरी खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी मुसीबत होती है। आपको नहीं पता कि कल आपको ओलंपिक में हिस्सा लेना है और आज इंजरी हो जाए तो आप उससे दूर हो जाते हैं। एक ऑपरेशन ठीक होने में लगभग एक साल लेता है। तो मेरे इतने लंबे करियर में कई ऑपरेशन हुए। चार ओलंपिक मैं खेला। खिलाड़ी का गहना है इंजरी, लेकिन यह गहना सबसे ज्यादा तकलीफ देता है। परेशानी रुकावटें आपको रोक नहीं सकतीं।
योगेश्वर ने कहा कि 2012 मेरा तीसरा ओलंपिक था। 2004 और 2008 में मैं बिना पदक के आया था। एक टीस थी एक आग थी कि मेडल जीतना है। लिएंडर पेस ने जब 1996 में मेडल जीता था तो एक आग थी कि अब तो पदक जीतना है। उसके बाद लंबा सफर तय किया है। दो ओलंपिक में जब नजदीक आकर मेडल नहीं आए तो ज्यादा तकलीफ हुई। 2012 में जब मेडल जीता तो एक ये था कि सपना पूरा हुआ। उससे पहले मेरा ऑपरेशन भी हुआ था। जब सपना पूरा करने में लगते हो तो न नींद सुख चैन सब छिन जाता है। एक सपने के पीछे भागना बड़ा अजीब होता है। रुकावटें भी आईं, लेकिन जिंदगी इसी का नाम है। एक खिलाड़ी कभी हार नहीं मानता। हार न मानने की जिद ने मुझे पदक दिलाया, नहीं तो मुझे काफी चोटों लगी थीं। एक खिलाड़ी जब पदक जीतता है तो उसके पीछे काफी योगदान होता है उन चेहरों का जो दिखाई नहीं पड़ते। मेरे घर वाले, कोच सबका बहुत योगदान था।
जैस्मिन ने कहा कि कुछ भी हम करते हैं, उसमें स्ट्रगल रहता है अपने अपने लेवल का। किसी को फाइनेंसियल रहती हैं, या किसी का स्पोर्ट का रहता है। कभी अच्छे पार्टनर नहीं मिलते हैं। सपने बड़े हों और सपोर्ट मिल रहा हो तो ये सब कवर होता जाता है। स्ट्रगल रहता है तो लेकिन जब बात सपनों की आती है तो ट्रेनिंग सामने आता है कि नहीं बस करते जाओ जाओ।
जैस्मिन ने कहा कि मेरा तो ये था कि मैंने तो अपने घर में ही देखा है। भिवानी बॉक्सिंग का हब बोला जाता है। हमारे आसपास सभी खेलते थे। मैंने खुद अपने दोनों चाचा को खेलते हुए देखा। तो हम उनकी फाइट्स देखते थे, मेडल्स देखते थे। इक्विपमेंट्स देखते थे। तो वो सब हम चीजें देख रहे थे तो हमें प्रेरणा मिली कि हम भी खेलेंगे। तो मुझे तो वहीं से प्रेरणा मिली। हरियाणा के लोगों में अलग तरह का जोश रहता है कि नहीं ये तो करना है। हमें ये चीजें पहले से मिलीं। इसी वजह से हम फाइटिंग गेम्स चुन पा रहे हैं।
योगेश्वर ने कहा कि नहीं नहीं उससे हम आगे निकल चुके हैं। लड़के हो या लड़कियां हों। अब एक सोच तो हट चुकी है कि हमें लड़कों को ही खेल में डालना है, लड़कियों को नहीं डालना है। अब दोनों एक जैसे हैं। माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा कोई न कोई खेले। माइंडसेट अब मजबूत है। माता पिता का माइंडसेट बदला है। वो चाहते हैं कि बच्चा खेल में आगे बढ़े। वो खुद मैदान में ले जाते हैं। हम कुश्ती अकेले करते थे। अब बच्चों के माता पिता अखाड़े भी जाते हैं।
योगेश्वर ने कहा कि सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। मैंने 1988-89 में कुश्ती शुरू किया था। तब मेरी उम्र सात साल थी। उस समय में गर्मियों में या बरसात में दिक्कत का सामना करना पड़ता था। हमारे पास गांव में मैट नहीं होता था, किट नहीं होती थी। पर उस टाइम और अब बहुत सुविधाएं हैं, लेकिन ग्रास रूट पर बहुत काम करने की जरूरत है। हमें हमेशा सुधार करते रहना चाहिए। हम अगर चाहते हैं कि 2036 ओलंपिक भारत में हो तो उसमें हर खेल पर फोकस करना होगा। सभी खिलाड़ियों का इतिहास गांव से और मध्य वर्ग परिवार से हैं। हमें ग्रासरूट पर तैयारी करनी चाहिए। जो बच्चा अभी 10 साल का है वो 2036 में हमें कितने पदक दिला सकता है। वो चीजें हमें सोचनी हैं। और हर खेल की अलग कैटेगरी बनानी होगी। तो हम ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर पाएंगे। हमारे खिलाड़ियों में पूरा जोश है। मेहनत के मामले में हमसे ज्यादा कोई नहीं है पूरी दुनिया में। खेलों में हम तभी आगे बढ़ेंगे जब एक साथ आगे बढ़ेंगे।
जैस्मिन ने कहा कि जो यूथ लड़कियां हैं, वो भी हमसे ही सीख रही हैं। इसलिए हमारा दायित्व है कि हम अच्छा करें। हमारी वजह से अगर 10 लड़कियां और अच्छा करना चाह रही हैं तो हम और अच्छा करें ताकि आने वाला जनरेशन मोटिवेशन ले। काफी अच्छा लगता है जब बच्चे हमसे पूछते हैं और सीखते हैं। आगे भी मेरा यही प्रयास रहेगा कि मैं देश के लिए कुछ कर पाऊं।
जैस्मिन ने कहा कि अभी जो लड़कियां हैं वो बहुत अच्छा कर रही हैं। सिर्फ बॉक्सिंग नहीं, बहुत से खेल है, चाहे वो बैडमिंटन हो रेसलिंग हो। हम जो समर्थन मिल रहा परिवार का, क्योंकि हमारे सीनियर ने एक मंच तैयार किया है। हमें एक पहचान दिखाई है कि हरियाणा खेलों में कितना अच्छा है। मतलब भारत का एक छाप छोड़ा है, वो हमारे लिए लाभदायक हो रहा है। परिवार वाले भी समझ रहे हैं, कि लड़कियां कर रही हैं और उन्हें भी समर्थन देना चाहिए। काफी अच्छा लगता है जब हम बाहर निकलते हैं और हरियाणा को अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं।
अमर उजाला संवाद के मंच पर ओलंपिक पदक विजेता पहलवान योगेश्वर दत्त और विश्व चैंपियन मुक्केबाज महिला जैस्मिन लंबोरिया अपनी बात रख रही हैं। योगेश्वर ने कहा कि सभी को राम राम पहले तो मैं धन्यवाद देता हूं अमर उजाला को, कि आपने खेल सेशन को रखा। जब बात हरियाणा की आती है तो सबसे पहले हमारे ग्रामीण खेल हैं, कुश्ती है, कबड्डी है, बॉक्सिंग है, हॉकी है, इसकी आती है। हरियाणा के लोगों में जुनून है। ये आती है हमारी संस्कृति से। हमें पुरखों से मिली है संस्कृति। वो चाहे खेल में हो, किसानी हो, समाज सेवा में हो, सेना में हो। आगे बढ़ना का जज्बा विरासत में मिला है। बड़ों से सीखा है। हमने ओलंपिक में अगर छह पदक जीते तो तीन हरियाणा से हैं। एशियन गेम्स में भी आधे पदक हरियाणा लाता है। जो खिलाड़ी के कोच का बड़ा योगदान रहता है। सरकार का भी रोल रहता है। हरियाणा की मिट्टी में जो जोश है और संघर्ष है, उससे हमें पदक मिलते हैं।
देवव्रत रेखे: अगला लक्ष्य अभी कुछ सोचा नहीं है। जैसे पिताजी बोलेंगे, हम करते जाएंगे। अभी और अध्ययन करना बाकी है। और भी कई ऐसे ग्रंथ हैं, जिनका पारायण हुआ नहीं है, जिनका कोई अध्ययन नहीं करता। पिताजी ने आज्ञा की है कि उनका भी अध्ययन करना है।
महेश रेखे: हमें पूरा विश्वास था कि वेद हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ हैं तो वेदों का महत्व और प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ेगा। जितने लोग वहां श्रवण के लिए आए थे, उन सभी का कथन था कि इस पारायण से उत्पन्न होने वाली आभा और ऊर्जा बहुत अलग है। वहां आने के बाद जो मन में संतुष्टि और शांति मिली, वो बहुत ही अलग थी। इन वेदों का कोई लेखनकर्ता नहीं है। वेदवाणी वास्तव में भगवान की वाणी है। वेद मंत्रों का साक्षात्कार भगवान के श्वास और उच्छवास से होता है।
देवव्रत रेखे: जब पारायण चल रहा था, तब ऐसा लग नहीं रहा था कि मैं खुद बोल रहा हूं। भगवान ही मुझसे बुलवा रहे थे। भगवान का आशीर्वाद रहा और उन्हीं की कृपा रही, इसलिए पारायण पूरा हो सका।
महेश रेखे: हम सभी को जवाब तो ज्यादा नहीं दे पाए। जैसे ही 30 तारीख को पारायण का समापन हुआ, उसके बाद समय ही नहीं मिल सका। पहली बार ऐसा हुआ कि वैदिक शास्त्र और वैदिक अभ्यास से जुड़ी सनातन की मूल परंपरा के बारे में देश के प्रधानमंत्री जी ने कुछ कहा। जब मूल का सिंचन करते हैं, तभी उस वृक्ष पर पत्र और पुष्प आते हैं। हमारे धर्म का मूल वेद हैं। इसी वजह से आज हमारे सनातन धर्म में उत्साह का वातावरण निर्माण हुआ है। जो युवा पीढ़ी इस परंपरा में है, उनके मन में भी विचार उत्पन्न हुआ है कि हमें भी अपनी संस्कृति से जुड़ना चाहिए।
देवव्रत के पिता महेश रेखे ने कहा कि व्यक्ति ने हर मुकाम, हर स्थान पर अपनी विजय की कामना करनी चाहिए। यह पुरुषार्थ भी है, लेकिन दो जगह पर अपनी पराजय होनी चाहिए। यह दो स्थान हैं- एक शिष्य और दूसरा पुत्र। भगवान की कृपा से मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि यह मेरा पुत्र भी है और शिष्य भी है। कोई भी व्यक्ति किसी को मार्गदर्शन करे तो वह अपने से अच्छा काम करे तो सबसे ज्यादा आनंद उसी को होता है, जो उसे पढ़ाता है। इसका आनंद अवर्णनीय है। अमर उजाला परिवार ने इस प्रकार हमें मंच पर बुलाकर हमारा सम्मान किया है, वह अद्भुत है।
अमर उजाला संवाद हरियाणा के मंच पर 19 वर्षीय देवव्रत महेश रेखे और वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे अपनी बात रख रहे हैं। 19 वर्षीय देवव्रत महेश रेखे ने कहा कि अमर उजाला को धन्यवाद कि आपने मुझे यह आमंत्रण दिया। वास्तव में यह आमंत्रण मुझे नहीं, हमारी गुरु परंपरा को मिला है। इसी परंपरा के कारण मैं यहा हूं। जब आठ साल की आयु में पिताजी ने जनेऊ कराया, तो पिताजी ने ही आज्ञा की कि वेद कार्य में आगे चलते रहो। उन्हीं के पास अध्ययन करके यह सब साध्य हुआ है। दंडक्रम चुनने का सोचा नहीं था। पिताजी ने 2002 में काशी में घनपारण किया था, तब वे ही बोले कि मैंने घनपारण किया है, तुम उससे आगे कुछ किया। उन्हीं की कृपा से यह सब साध्य हुआ।
सुधांशु जी महाराज ने कहा, "जिब्रान ने अपनी कहानी में लिखा था कि मेरे पास सात मुखौटे थे, उन्हें लेकर मैं जी रहा था। जब कोई मेरे सातों मुखौटे चुराकर ले गया, उस दिन मैं जैसा था, वैसा दिखाई दिया। जैसे अंदर हो, वैसे बाहर हो जाओ, इससे बड़ी सुंदरता कोई नहीं हो सकती। हमारी संस्कृति भी कहती है कि असतो मा सद्गमय। जब चारों ओर से अशांति की बौछार हो रही तो, उदासी का वातावरण हो, तब भी इतनी कृपा कर देना कि मुस्कुराहट बरकरार रहे। हम किसी की मुस्कुराहट छीनने की इच्छा न करें। यही हमारा अध्यात्म है।"
सुधांशु जी महाराज ने कहा कि वैदिक ज्ञान के अनुसार मनुष्य को मनुष्य बने रहने के लिए प्रयास करना चाहिए। हम अंदर से जैसे हैं हमें वैसे ही बाहर से हमें आचरण करना चाहिए। इससे बड़ी सुंदरता दुनिया में नहीं हो सकती। वैदिक संदेश में है कि मनुष्य तू है तो मनुष्य बना रहे। सांप नहीं बनना, बिच्छू नहीं बनना। तुम्हारा एनिमल ब्रेन तुम्हारे पास है उसे सुला देना और देवता वाले ज्ञान को जगा देना।
सुधांशु जी महाराज ने कहा कि अमर उजाला हरियाणा के मंच पर सुधांशु जी महाराज ने कहा कि हमारा बोलना, हमारा व्यवहार शांति देने वाला हो, प्रेम करने वाला हो। उद्वेगकारी वाणी न हो। प्रत्येक कर्म में आनंद दिखाई दे, इसलिए कहा गया है कि मन: प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह:। इस बारे में उन्होंने एक किस्सा सुनाते हुए कहा, "35 वर्ष पहले हरियाणा के एक गांव में साधुओं का सम्मेलन था। गांव के अंदर झोपड़ी डालकर रहने वाले बाबा बोलने के लिए आगे आए। उन्होंने कोई मंत्र नहीं बोले। गांव की भाषा बोली, जो अद्भुत थी। उन्होंने कहा कि खाओ पीओ छको मत। देखो भालो, तको मत। चलो फिरो, लेकिन थको मत। बोलो चालो, बको मत। इसी के लिए कहा गया है- ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते। हर दिन इस तरह बिताओ कि रात को चैन की नींद सो सको और जागो तो चेहरे पर प्रसन्नता हो। जवानी को इस तरह बिताओ कि बुढ़ापे में पछताना न पड़े। बुढ़ापे को इस तरह बिताओ कि किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। फूल खिले पर उसके सड़ने की नौबत न आए।"
विश्व जागृति मिशन के संस्थापक सुधांशु जी महाराज ने कहा कि उद्वेवकारी वाणी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। कोई ऐसा प्रयोग नहीं होना चाहिए जिसमें सच बोलने में परेशानी हो। योग काफी महत्वपूर्ण है। कुछ भी करना पड़े कर्म को इतनी कुशलता से करो जो तुम्हारा हर कर्म तुम्हारा हस्ताक्षर बन जाए। मन की प्रसन्नता जरूरी है। अपने ऊपर नियंत्रण जरूरी है। गति के साथ नियंत्रण जरूरी है, नहीं तो एक्सीडेंट का खतरा रहता है। प्रगति के साथ नियंत्रण की शक्ति होनी चाहिए। बोलते समय भी ध्यान रखना जरूरी है कि आपकी वाणी मर्यादित हो।
विश्व जागृति मिशन के संस्थापक सुधांशु जी महाराज ने कहा कि देवलोक से होकर शांति हमारी इस पृथ्वी उतरे, अंतरिक्ष से पृथ्वी पर शांति आए। पृथ्वी पर बसने वाले वाले लोगों को शांति की प्राप्ति हो सके। जलों से शांति मिले, औषधियों से शांति मिले। इतनी बड़ी शांति की कामना हम लोग करते हैं और ये बात जानते हैं कि पूरे संस्कारभर में कोई संदेशवाहक हो सकता है तो वो भारत है भारत की संस्कृति है। भारत की संस्कृति के बारे में हमारे वैदिक संदेशों में कहा जाता है कि सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा। हम हरियाणा में हैं। यहां भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से हमें भगवत गीता मिली। इसमें आदेश, उपदेश, संदेश हैं। आज के युग के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने तप के संबंध में कहा था कि जिसका मन शांत है और जिसके चेहरे पर प्रसन्नता है, जो स्वयं को नियंत्रित करना चाहता है, जिसकी भावनाएं शुद्ध हैं, वो व्यक्ति तपस्वी है।"
अमर उजाला संवाद हरियाणा के मंच पर विश्व जागृति मिशन के संस्थापक सुधांशु जी महाराज अपनी बात रख रहे हैं। महाराज ने कहा कि जिस देश में शांति होती है, वो देश प्रगति की ओर जाता है, यदि किसी की व्यक्ति के मन में शांति है तो उसके चेहरे पर मुस्कुराहट भी होगी। यदि किसी घर में शांति है तो उस घर का विकास, उसकी प्रगति निरंतर आगे बढ़ेगी। यदि किसी समाज में अशांति है तो वो समाज विकासशील नहीं हो पाएगा। किसी भी सुख के लिए आवश्यक है कि सुख टिकने की आधारशिला है शांति। शांति तब स्थापित होती है, जब आशांति उत्पन्न करने वाले कारण दूर किए जाएं। यदि आशांति उत्पन्न करने वाले कारण हैं और हम शांति-शांति बोलते रहें तो कल्याण नहीं होता। हमारे अध्यात्म में शांति पाठ को बहुत महत्व दिया जाता है।
रोजगार और डंकी रूट पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हम यूथ को इस बात को लेकर प्रेरित करते हैं। हम यूथ और उनके परिजन को भी बोलते हैं कि डंकी रूट का इस्तेमाल न कीजिए। क्योंकि आप अपनी जान को जोखिम में डालकर जाते हैं। इतना पैसा भी खर्च करते हैं, जो आप सोच लेकर जाते हैं, वो भी पूरी नहीं होती। बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हमने उसी बात को ध्यान में रखते हुए विदेश सहयोग विभाग बनाया है। विदेश सहयोग विभाग के जरिए हम बाहर से डिमांड मंगवाते हैं। सरकार एक प्रक्रिया से बच्चों को विदेश भेजती है। जिसको भेजा है उसका सिर्फ टिकट का पैसा लगा है। एजेंसी से हमारे संपर्क हैं। विदेश सहयोग विभाग में हमारे अधिकारी लगे हैं। वो एजेंसी से संपर्क करके एक ठीक रास्ते से भेजना का काम हमारी सरकार कर रही है। युवाओं और उनके मां-बाप से कहना चाहूंगा कि डंकी रूट का रास्ता न अपनाएं। जिससे हम भी जोखिम में डलें और परिवार भी जोखिम में डलें। इससे बचना चाहिए।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि दिल्ली का कभी कोई हस्तक्षेप नहीं होता। कांग्रेस के समय तो प्रधानमंत्री भी सोनिया गांधी के इशारे पर काम करते थे, जबकि हमारे यहां दिल्ली में बैठे लोग बोलते हैं कि राज्य तो आपको चलाना है। हम सलाह जरूर लेते हैं। यह हमारे लिए भी अच्छा होता है। सरकार इससे पारदर्शिता के साथ काम कर पाती है।
सीएम सैनी ने कहा कि पंजाब और हरियाणा का दरवाजा आज भी एक ही है। हम एक ही हैं। पंजाब हमारा घर है। पंजाब गुरुओं की धरती है। गुरुओं को सम्मान देना हमारा दायित्व है। जिन गुरुओं ने हमारे राष्ट्र और हमारे धर्म की रक्षा की है, उनके इतिहास को हमें आगे आने वाली पीढ़ियों तक ले जाना चाहिए। यह कोई राजनीतिक विषय नहीं है।
सीएम सैनी ने कहा कि प्रदेश में अपराध और अपराधी का कोई स्थान नहीं है। अपराधी या तो सुधर जाएं, नहीं तो हम सुधार देंगे। हमारी पुलिस मुस्तैदी से लगी है। पुलिस ने अलग-अलग ऑपरेशन चलाए हैं। बहुत सारे अपराधियों को जेल के अंदर पहुंचाया है। विदेश में बैठे गैंगस्टरों को भी यहां लाकर कार्रवाई की जा रही है।
सीएम ने कहा सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी सराकर की है। प्रदेश के लोगों को इस बात से आश्वसत करते हैं कि आपको कोई दिक्कत नहीं आने देंगे। अगर कोई व्यक्ति गलत करेगा तो भुगतेगा भी। बड़ा सुधार इसमें हुआ है।
नशे के सवाल पर मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि हम मैराथन के जरिए युवाओं को एकजुट करते हैं। नशे के खिलाफ उन्हें जागरुक करते हैं। हर महीने मैराथन का कार्यक्रम होता है। मैराथन में 25 से 30 हजार यूथ जमा होता है। मैं हर जिले में मैराथन के कार्यक्रम करता हूं। साइक्लोथॉन में 7.5 लाख से ज्यादा युवाओं ने हिस्सा लिया। संतों, खाप पंचायतों और महिलाओं ने मंच पर आकर युवाओं को नशे से बचाने की बात कही। संतों ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। बच्चा नशे में चला जाता है तो महिलाओं को पीड़ा अधिक होती है। सबसे ज्यादा नशे का दंश महिलाओं को झेलना पड़ता है। नशा हमारे लिए चैलेंजिंग विषय है। हम इसके ऊपर लगे हैं, पुलिस अधिकारियों से कहा है, पूरे प्रदेश की पंचायतों को बुलाया, पांच टास्क दिए हैं। एनवायरमेंट के साथ नशा का चैलेंजिंग विषय है।
मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि हांसी को नया जिला बनाया गया है। हांसी को हिंदुस्तान का दरवाजा कहा जाता था। उसकी ऐतिहासिक पहचान है। इस जमीन से क्रांतिकारी अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करते थे। इसी ऐतिहासिक नगरी को हमने जिला बनाया है। हांसी के लोगों के मांग को स्वीकार किया है उसे मांग को पूरा किया है। कमेटी की रिकमंड को हम पूरा करते हैं।
मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि लाडो लक्ष्मी योजना को लागू करना हमारे लिए बड़ी चुनौती था। पूरे मंत्रिमंडल ने कहा कि इसे लागू करेंगे। हमने योजना बनाकर अधिकारियों को दी। हमने चुनौती को स्वीकार किया। पहले ही वर्ष में हमने इसे लागू कर दिया। हम किसानों को भावांतर भरपाई भी देते हैं। बाजरे की फसल के लिए 380 करोड़ रुपये भावांतर में दिए गए हैं।
सीएम सैनी ने कहा कि मोदी जी काम कर रहे हैं, गरीब के लिए काम कर रहे हैं। उनकी सोच है, वो बोलते भी हैं कि हम किसी विशेष के लिए काम नहीं करते हैं। मेरी सरकार एक लाख 40 करोड़ लोगों के लिए काम करती है। गरीब को अगर उज्ज्वला का सिलिंडर पहुंचाना है तो भेदभाव नहीं है। मोदी सरकार बिना भेदभाव के काम कर रही है।
सीएम सैनी ने कहा कि पीएम मोदी ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत सालभर में छह हजार रुपये किसानों के खाते में पहुंचाया है। मेरे हरियाणा के 20 लाख किसानों के साढ़े सात हजार करोड़ रुपये पहुंचाने का काम नरेंद्र मोदी की सरकार ने किया है। मेरे 12 लाख किसानों को फसल मंडी में पहुंचाने के 48 घंटे के अंदर उसके खाते के अंदर पैसा पहुंचाने का काम हमारी सरकार कर रही है। कांग्रेस दस साल तक हरियाणा के अंदर रही है, किसान की अगर फसल का खराबा हुआ है, कांग्रेस सरकार 269 करोड़ रुपया छोड़कर गई थी। हरियाणा की मनोहर लाल सरकार ने इस पैसे को दिया है।
उन्होंने कहा कि अगर मेरे हरियाणा के किसान का फसल खराबा हुआ है तो हमने इन 11 साल में किसान के खाते में 15,500 करोड़ रुपये किसानों के खाते में पहुंचाने काम किया है। किसान को भी ये लगता है कि ये सरकार मेरी है। महिलाओं को भी लगता है ये सरकार मेरी है। युवाओं को ये लगता है कि ये सरकार मेरी है। गरीब को भी लगता है ये सरकार मेरी है।
मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि विधानसभा चुनाव के दो महीने पहले फिर आचार संहिता लग गई थी। बच्चों के मन में था कि भर्ती का परिणाम तो तैयार है। मुझसे डेढ़ हजार बच्चे मिलने आए थे। मैंने बच्चों से कहा कि हम परिणाम घोषित नहीं कर सकते क्योंकि कांग्रेस की शिकायत पर चुनाव आयोग ने हमें हिदायत दी है। हालांकि, मैं आपको भरोसा दे रहा हूं कि जब नतीजे आएंगे और जब भाजपा की तीसरी बार सरकार बनेगी, तब मैं शपथ तो बाद में लूंगा और आपको नियुक्ति पत्र पहले दूंगा। गरीब परिवार के बच्चों को बिना पर्ची, बिना खर्चे के सरकारी नौकरी मिली।
मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि मेरे कार्यभार संभालने के बाद ही लोकसभा चुनाव के लिए आचार संहिता लागू हो गई। एक ही दिन का समय मिला, उसमें नौकरियों की घोषणा की गई। आचार संहिता के दौरान हमने सौ दिन का एजेंडा तैयार किया था। हर दिन का एजेंडा तैयार किया था। कई दिन दो-दो कार्यक्रम थे। इसी बीच, हर रोज 14-15 हजार बच्चों को नियुक्ति पत्र हमने सौंपे।
सीएम सैनी ने कहा कि कांग्रेस ने 55 साल तक शासन किया है। हर प्रधानमंत्री ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार काम किया है। हर पीएम ने सामर्थ्य के अनुसार देश को आगे बढ़ाने का काम किया है। हम बोलते हैं जो भी प्रधानमंत्री रहा है, उसने अपनी सामर्थ्य के अनुसार काम किया है। वोट चोरी जैसे मुद्दे दुर्भाग्यपूर्ण हैं, कांग्रेस को ऐसे मुद्दे धरातल पर उतारने के मुद्दे हैं।
सीएम सैनी ने कांग्रेस पर हमला बोलेते हुए कहा कि कांग्रेस को कौन व्यक्ति स्क्रिप्ट लिखकर देता है? इस प्रकार की स्क्रिप्ट लिखने वाला कांग्रेस की ही नहीं, राहुल गांधी और गांधी परिवार की भी मिट्टी पलीद कर रहा है। जो देश की सत्ता में 55 साल बैठे रहे, वे अब यह मुद्दा उठाते हैं कि प्रधानमंत्री फिर चुने गए तो संविधान खत्म हो जाएगा? यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
सीएम सैनी ने कहा कि 2024 में कांग्रेस ने दुष्प्रचार किया था, लेकिन 2029 में आप देखेंगे कि हरियाणा के नतीजे किस तरह आते हैं। धीरे-धीरे बादल छंट रहे हैं। लोगों के सामने तस्वीर साफ हो रही है। संविधान खत्म हो जाने और वोट चोरी होने जैसे कांग्रेस के सारे भ्रम 2029 आते-आते खत्म हो जाएंगे।
संवाद में चर्चा के दौरान हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि जब मैं पिछली बार आपके सम्मुख इस मंच पर आया था और आपने सवाल किया था कि क्या आप सत्ता में आ रहे हैं? तब हमने दावे से कहा था कि भाजपा ही बड़े जनादेश के साथ जीतेगी। प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में आजादी के बाद पिछले 11 साल में तेज गति से काम हुआ है। हरियाणा में मनोहर लाल जी ने सुधारों की शुरुआत की। सुधार इस तरह हुए कि दूर-दराज बैठे व्यक्ति तक भी योजनाएं पहुंचीं। लोगों को दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़े। महिला, किसान, युवा, गरीब... सभी को लाभ मिला। पहले हम यह देखते थे कि सरकारें बोलती थीं, लेकिन नीचे कुछ नहीं होता था। पांच साल बाद जनता सोचती थी कि ये सब बोलते हैं, लेकिन काम धरातल पर नहीं उतरते थे। इस शासन तंत्र को बदलने का काम मोदी जी ने किया है। इसका परिणाम है कि गरीब, किसान, महिला, युवा को गर्व से लगने लगा कि ये सरकार हमारी है। पहली बार ऐसा महसूस हुआ है। हमने देखा है कि युवा जब नौकरी पर जाता था तो सबसे ज्यादा संघर्ष युवाओं के माता-पिता को करना पड़ता था।
अमर उजाला के सहायक संपादक विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि अमर उजाला परिवार की ओर से संवाद की ये श्रृंखला लंबे समय से चली आ रही है। हर राज्य में जहां-जहां हमारी उपस्थिति है। वहां अमर उजाला इस तरह के संवाद आयोजित करके उस राज्य के विकास और आर्थिक गतिविधियों पर चर्चा करते हैं।
गुरुग्राम स्थित होटल क्राउन प्लाजा में सुबह नौ बजे हाॅल मंत्रोच्चारण से गूंज उठा। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने दीप प्रज्वलन कर किया तो वहीं 19 वर्षीय देवव्रत महेश रेखे ने अमर उजाला संवाद हरियाणा के मंच से शांति पाठ और मंत्रोच्चारण के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे एक प्रमुख आचार्य और ज्ञानी व्यक्ति हैं, जो अपने आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन के प्रति गहरी समझ के लिए प्रसिद्ध हैं।
हरियाणा की जेस्मिन लंबोरिया ने भारतीय महिला मुक्केबाजी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। महान बॉक्सर हवा सिंह की परंपरा से निकली जेस्मिन ने पेरिस 2024 ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया और इसके बाद 2025 में वर्ल्ड बॉक्सिंग कप और विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और अनुशासन के दम पर उन्होंने खुद को विश्व चैंपियन बनाया। जेस्मिन आज देश की युवा खिलाड़ियों के लिए यह संदेश हैं कि संघर्ष से ही स्वर्णिम सफलता निकलती है।
हरियाणा के भैंसवाल कलां गांव से निकले योगेश्वर दत्त ने भारतीय कुश्ती को नई पहचान दी। 14 साल की उम्र में घर छोड़कर छत्रसाल स्टेडियम पहुंचे योगेश्वर ने संघर्ष, चोट और निजी दुखों के बावजूद हार नहीं मानी। 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने इतिहास रचा और देशभर में प्रेरणा बने। एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों में भी पदक जीतने वाले योगेश्वर के लिए कुश्ती जीवन का आधार रही। संन्यास के बाद भी वे मेंटर के रूप में भारतीय कुश्ती की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
दिल्ली में जन्मे इशांत शर्मा ने महज 18 साल की उम्र में टीम इंडिया के लिए डेब्यू कर क्रिकेट जगत को चौंका दिया था। लंबे कद, तेज रफ्तार और जुझारूपन ने उन्हें भारत के भरोसेमंद तेज गेंदबाजों में शामिल किया। 100 से ज्यादा टेस्ट खेलने वाले इशांत ने टेस्ट क्रिकेट में 300 से अधिक विकेट झटके और विदेशी पिचों पर भारत की जीत में अहम भूमिका निभाई। लंबे बाल और 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार उनकी पहचान बने। करियर में उतार-चढ़ाव के बावजूद इशांत ने खुद को साबित किया और आज भी युवा गेंदबाजों के लिए प्रेरणा हैं।
फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस के सर्किट, गोलमाल के माधव और जॉली एलएलबी के जगदीश त्यागी उर्फ जॉली जैसे यादगार किरदारों से पहचान बनाने वाले अभिनेता अरशद वारसी कॉमेडी, ड्रामा और थ्रिलर तीनों विधाओं की फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में सितंबर में रिलीज हुई जॉली एलएलबी-3 में निभाए गए किरदार के चलते वह चर्चा में हैं। संवाद में वह सिनेमा और अभिनय यात्रा पर अपने विचार साझा करेंगे।
'चूचा' के नाम से मशहूर वरुण शर्मा भी संवाद में पहुंचेंगे। वरुण शर्मा ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 2013 की कॉमेडी 'फुकरे' से की थी। फिल्म 'फुकरे' के लिए वरुण को बेस्ट मेल डेब्यू के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। इसी फिल्म के जरिए दर्शकों के बीच वे 'चूचा' के नाम से पहचाने जाते हैं। वरुण शर्मा को 'फुकरे' के अलावा, 'फुकरे रिटर्न्स' ‘फुकरे 3’, 'डॉली की डोली', 'छिछोरे', 'दिलवाले', 'राबता', ‘रूहि’, 'फ्राइडे', 'फोन भूत', 'तेरा क्या होगा लवली' और 'खानदानी शफाखाना' जैसी फिल्मों में देखा जा चुका है। वरुण की आगामी फिल्म 'राहु केतू' है, जो 16 जनवरी 2026 को रिलीज होगी। संवाद में वरुण फिल्म जगत की बात करेंगे।
वर्ष 2017 में रिलीज ब्लॉकबस्टर फिल्म अर्जुन रेड्डी से शालिनी पांडे रातोंरात स्टार बनीं। इसके बाद उन्होंने तमिल और हिंदी सिनेमा में लगभग 15 फिल्मों और वेब सीरीज में काम किया। इन दिनों वह अपनी आगामी फिल्म राहु-केतु को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में वैनिटी वैन से जुड़ी एक घटना को लेकर भी वह सुर्खियों में रहीं। संवाद में वह फिल्मी दुनिया और उससे जुड़ी चुनौतियों पर अपने अनुभव साझा करेंगी।
‘अमर उजाला संवाद’ इस बार हरियाणा पहुंचा है। आज 17 दिसंबर 2015 को गुरुग्राम में आयोजित इस खास आयोजन में मनोरंजन, खेल और राजनीति सहित अलग-अलग क्षेत्रों की तमाम दिग्गज हस्तियां हिस्सा लेंगी। इस आयोजन में फिल्म जगत की एक या दो नहीं, बल्कि पांच दिग्गज हस्तियां शिरकत करेंगी और सिनेमा एवं फिल्मों पर चर्चा होगी।
पुलकित सम्राट
संवाद में पुलकित सम्राट भी मंच की शोभा बढ़ाने वाले हैं। टेलीविजन से बॉलीवुड तक का सफर तय करने वाले पुलकित सम्राट को फिल्म फुकरे के 'हनी' और सनम रे के आकाश किरदार से खास पहचान मिली। अब तक वह जय हो, ओ तेरी, बैंगिस्तान, पागलपंती और तैश सहित एक दर्जन से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। फिल्मों के अलावा अपने निजी जीवन को लेकर सुर्खियों में रहने वाले पुलकित इन दिनों फिल्म राहु केतु को लेकर चर्चा में हैं। संवाद में वह फिल्म जगत पर अपने विचार साझा करेंगे।
लाइटिंग पार्टनर : ओरिएंट बाई जयंता
नॉलेज पार्टनर : चंडीगढ़ ग्रुप ऑफ कॉलेजेस
ड्रिवन बाय : किआ
एसोसिएट पार्टनर : इलेंटा मार्ट और सोलर स्क्वायर
‘संवाद’ अमर उजाला का राष्ट्रीय विचार मंच है जहां देश की जानी-मानी हस्तियां, नीति-निर्माता, विशेषज्ञ और प्रभावशाली व्यक्तित्व अलग-अलग सत्रों में दर्शकों से सीधे संवाद करते हैं। इस आयोजन में 50 दिनों में दंडक्रम पारायण संपन्न करने वाले वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे, ओलंपिक पदक विजेता पहलवान योगेश्वर दत्त, लोकप्रिय अभिनेता अरशद वारसी, पुलकित सम्राट, वरुण शर्मा, आरजे प्रवीण, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर ईशांत शर्मा, अभिनेत्री शालिनी पांडेय, प्रख्यात कवि एवं गीतकार आलोक श्रीवास्तव, उजाला सिग्नस हॉस्पिटल्स के एमडी नितिन नाग और एब्सोल्यूट के सीईओ व संस्थापक अगम खरे अपने अनुभव और विचार साझा करेंगे।
एक दिन के आयोजन में अलग-अलग पैनल सत्रों के माध्यम से विकसित हरियाणा, सनातन एवं जीवन मूल्य, पोषण और स्वस्थ भारत, राष्ट्रीय सुरक्षा, फिल्मी दुनिया, उद्यमिता तथा आलोकनामा जैसे विषयों पर गहन विमर्श होगा। इसके साथ ही अचीवर्स अवाॅर्ड भी प्रदान किए जाएंगे।