दीपा ने बताया, 'यही त्रासदी है अपंगता की, कि वह होने से ज्यादा लोगों के दिमाग में ज्यादा रहती है। जो माइंडसेट है अपंगता का वो उस इंसान को भी लिमिट कर देता है, जो इंसान अपनी शारीरिक दुविधा से गुजर रहा होता है। बचपन में ट्यूमर आया। पांच साल से नौ साल की उम्र तक अस्पताल के अंदर-बाहर करती रही। बहुत ज्यादा रिहैब हुई। मैंने अपने माता-पिता को स्ट्रगल करते देखा। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि एक नन्हीं बच्ची है, जो पैरों से अपंग है, जिसका मलमूत्र अपने आप निकल जाता है, उस जिंदा लाश को जीवित रखकर क्या करोगे। लेकिन शुक्र है मेरे मां बाप ने मुझ पर हिम्मत नहीं हारी और मेरा इलाज कराया और मैं ठीक हो गई। इतनी ठीक हुई कि राजस्थान से बास्केटबॉल भी खेली और जो पहली महिला क्रिकेट टीम बनी, उसमें भी अपनी भागीदारी दी।'
अगला सत्र जोश जज्बा और जुनून का है। इस सत्र में स्पोर्ट्स में शिखर पर पहुंचने की बात में भारत को पैरलंपिक खेलों में पदक दिलाने वाले देवेंद्र झाझरिया और दीपा मलिक भी शिरकत कर रहे हैं। इसके अलावा मुरलीकांत पेटकर भी पहुंचे हैं। अमर उजाला संवाद के 'जोश, जज्बा और जुनून' सत्र में ये अपने संघर्षों और पैरलंपिक खेलों में भारत को शीर्ष पर पहुंचाने की कहानी के बारे में बता रहे हैं।
ज्वाब - मटन
सवाल - सबसे ज्यादा पसंद क्या है।
जवाब - स्पोटर्स बुक पढ़ना क्योंकि वह प्रोफेशन से जुड़ा रहता है
सवाल - बचपन की कोई शरारत जो अब तक याद है
जवाब -पेड़ से गिरना
सवाल - इच्छा जो पूरी नहीं हो पाई है
जवाब - सब कंप्लीट हो गई है ऊपर वाले ने सब कुछ दे दिया है बस एक ही चीज है मां बाप का आशीर्वाद बना रहे सबके साथ खुशी से पल बीते।
मैं एक ही चीज देना चाहूंगा। हिल स्टेशन पर सारी सुविधा नहीं होती हैं। युवाओं से कहना चाहूंगा कि आप खूब मेहनत करें और लॉयल्टी के साथ मेहनत करें। अगर आप पूरी लगन के साथ मेहनत करते हैं तो इसका सफल नतीजा जरूर मिलेगा।
मुझे प्रैक्टिस के लिए 30 35 किमी दूर जाना पड़ता था। तीन बस बदलना पड़ता था। 2006-07 में इतनी अच्छी ट्रांसपोर्ट फैसिलिटी नहीं थी।
यूट्यूब पर आने की सलाह कुछ साथियों ने दीं। वो बच्चे जो किसी एकेडमी में नहीं जा सकते या उन तक मदद नहीं पहुंच रही तो मैं चाहता हूं कि मैं उन्हें ऑनलाइन माध्यम से कोचिंग दूं। बस इसके पीछे यही मोटिव है।
मैं एक ऐसे परिवार से हूं जहां हमने लोगों की हमेशा से मदद करने की कोशिश की है। राजनीति के सवाल पर यही कहूंगा कि हमेशा क्रिकेट तो खेलना नहीं है, और आगे देखना है कि क्या करना होगा। बस सही समय का इंतजार है। मुझे आप कहीं भी ले जाओ, लेकिन आप में दम होना चाहिए। दो चार लोगों की मदद कर सकें।
कुछ लोगों की ऐसी सोच हो सकती है। ये वो लोग हैं जिनके लिए पैसा अहम है। कुछ लोग होते हैं जिन्हें लीग क्रिकेट पसंद है, लेकिन अगर उसके मन में देश के प्रति सम्मान है तो आप ऐसा नहीं करेंगे। मुझे लगता है कि अपने स्किल पर ध्यान दीजिए और उसके जरिये पैसे कमाइए। ऐसा नहीं है कि पैसा जरूरी नहीं है, लेकिन अपनी स्किल पर ध्यान दीजिए। और पैसा कमाना है तो और अच्छा खेलिए।
फ्यूचर होता नहीं है। उसे बनाया जाता है। इंडियन क्रिकेट टीम की बात करें 90 या 80 के दशक में इतनी जानकारी किसी को नहीं थी। 1983 से 2010 तक भारतीय टीम बल्लेबाजी के लिए जानी जाती थी। हर इंसान बैटिंग को लेकर बात करता था। हर कोई कहता था कि अगर सामने वाली टीम 400 बनाती है तो इंडिया बना लेगी। मतलब ये कि भारत 400 रन देता है। अब ये नहीं सुनते होंगे। अब कहा जाता है कि सामने वाली टीम 200 बनाए तो भी हमारे गेंदबाज रोक देंगे। जो टीम अभी है हमने ये विश्वास कायम किया है। अपने खिलाड़ियों पर भरोसा करना सबसे ज्यादा जरूरी है।
ये पॉलिटिक्स है। ऐसा हो ही नहीं सकता। जब किसी को जलन होती है या दुख होता तो वो पॉइंट आउट करते हैं। जब आप किसी चीज को हासिल करते हैं तो वो स्किल है, लेकिन दूसरा करे तो बेईमानी है। मुझे उधर से कोई जवाब नहीं आया। जवाब आए तो मैं उसके लिए तैयार बैठा हूं। आपको दूसरे की कामयाबी पर खुश होना चाहिए। आप महान तभी बन सकते हैं।
एक स्पोर्ट्समैन की लाइफ में होता है कि वह देश के लिए कब खेलेगा। दूसरा होता है कि आप परिवार के लिए क्या करेंगे और कैसे मैनेज करेंगे। एक होता है रोलमॉडल। मेरे लिए मेरे पिता रोलमॉडल रहे हैं। जब मेरे पिता गुजर गए तो मेरे लिए वह सबसे बड़ा नुकसान था। आजतक मेरे घरवालों ने मुझे किसी चीज के लिए रोका नहीं न टोका। सबने टोका कि सब शमी को बिगाड़ रहे हैं, लेकिन जब मैं टीम इंडिया के लिए खेला तो वो ही सबसे ज्यादा रो रहे थे। बोल्ड मोमेंट वह था जो लोग मुझसे जलते थे और मुझे वापसी करते देखा तो रोने लगे।
वर्ल्डकप हार पर शमी ने जिंदगी में बहुत कम मूवमेंट आता है। जिनती बार ये सवाल पूछा जाता है तो दिल में एक उदासी सी हो जाती है। वो जीत का सिलसिला था, किसी के मुंह से नहीं निकला था कि इस टीम को कोई हरा सकता है। शायद यही तकदीर है। उस दिन अच्छा नहीं खेल सकता। मैं इसके लिए लक को अहम मानता हूं। इसकी टीस हमेशा दिल में रहेगी।
देखिए रिकवरी का ऐसा है कि वह धीरे-धीरे होगी और जहां तक सवाल स्किल का है। कठिन परिश्रम से स्किल पर विश्वास आपको बनाता है। आप अपना स्किल इतना हाई कर लीजिए कोई आप पर सवाल खड़ा न कर सके।
अगला सत्र मैदान से शिखर तक विषय पर चर्चा के दौरान शम्मी ने कहा कि सबसे पहले तो अमर उजाला का धन्यवाद। रिकवरी के सवाल पर उन्होंने कहा कि रिकवरी का सिलसिला हमेशा खिलाड़ी के साथ जुड़ा हुआ रहता है।
पूर्वी सीएम निशंक ने कहा कि जब मैं मुख्यमंत्री था, हरिद्वार में कुंभ था। हरिद्वार का 2010 का कुंभ पूरी दुनिया में विख्यात हुआ है। पूरी दुनिया का रिकॉर्ड तोड़ा है। एक ही दिन में एक ही समय में एक करोड़ 66 लाख लोग थे। इस राज्य की आबादी से भी डेढ़ गुना थी। उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने भी पूरा सहयोग दिया था।
निशंक ने कहा कि किसी भी राज्य के लिए एक रोडमैप होना चाहिए, लेकिन विभिन्न विभागों का जो रास्ता है और टारगेट है उसे निश्चित होना चाहिए। हमारे इस राज्य की संभावना क्या है? हमारा टारगेट क्या है? हमारा उस टारगेट पर पहुंचने का रास्ता क्या है? और उसमें संसाधन क्या है? यह किसी भी राज्य के लिए जरूरी है कि सरकार चाहे किसी की भी आए उसी रास्ते पर सब कुछ चलना है।
निशंक ने कहा कि राज्य को एक मॉडल स्टेट बनाना है और मुझे लगता है कि यह बंद नहीं होना चाहिए। जहां तक गीत संगीत की बात है अभी तो देश में दुनिया में भी मोदी का संगीत चल रहा है। बहुत दूर तक चल रहा है। संगीत में जो झंकार है, भारत की है, विदेश की नहीं है। यह संगीत फिरकनी केवल पैदा नहीं करता यह उसमें जीवन भी देता है। डबल इंजन की सरकार ने काफी विकास किया। लोग कहते हैं पलायन हो गया, यह हो गया वह हो गया, इस राज्य की परिस्थितियां क्या हैं, यह राज्य कैसा है इसका रास्ता क्या है यदि किसी के हाथ में बागडोर हो तो उसका क्या टारगेट है कि क्या करना है सबसे पहले देखना चाहिए।
हम लोगों को इस राज्य की परिस्थितियों क्या है इस राज्य में केवल 30% कृषि भूमि है जिसमें मकान है दुकान है। अभी मुंबई दिल्ली मेरठ और यदि 10 बड़े शहरों में उत्तराखंड के लोग वहां बसे हुए हैं। उनको केवल इतना आह्वान हो जाए कि उत्तराखंड में आ जाएं तो उनका मकान बनाने के लिए जगह तक नहीं मिलेगी। हमारे पास चार धाम, हमारा जो धार्मिक पर्यटन है वह काफी अच्छा है। आर्थिक को धार्मिक पर्यटन को दोनों को जोड़ नहीं सकते, पर्यटक आएं हमारे पास वह सौंदर्यता है कि आज कोई देश इसके मुकाबले नहीं हैं।
रावत ने कहा कि हां, इस बात को मैं मानता हूं कि नारायण दत्त तिवारी जी के समय पर औद्यौगिक विकास का खाका तैयार किया। होना ये चाहिए था कि हम वहां से इस औद्योगिकीकरण को उत्तराखंड के आमजनमानस को जोड़ना चाहिए था। गांवों के साथ जोड़ना चाहिए था। हम वो जुड़ाव पैदा नहीं कर पाए। लेकिन इसे सफलता से आगे नहीं बढ़ाया जा सका है। आज उसी का परिणाम है कि हमारे राज्य के अंदर पलायन सबसे बड़ी चुनौती है। बढ़ता पलायन रोकना सभी के सामने बड़ी चुनौती है। इतने बड़े सिडकुल आने के बाद भी बेरोजगारी कम नहीं हुई। उत्तराखंड के अंदर बेरोजगारी दर साढ़े 9 प्रतिशत से ऊपर है। बेरोजगारी में आप देख लीजिए, इसके साथ ही प्रति व्यक्ति आय इस बात को दर्शाता है। महंगाई जिस तरह से बढ़ रही है उसमें प्रति व्यक्ति आय को भी देखना चाहिए।
निशंक ने कहा कि जो औद्योगिक प्रगति इस राज्य की हुई है उसकी कोई और राज्य तुलना भी नहीं की जा सकती है। इस राज्य को विशेष राज्य का दर्जा लिया। मैं ऐसे में नारायण दत्त तिवारी जी को भी याद करना चाहता हूं। हरिद्वार का औद्यौगिक परिसर इसका उदारहण था। नेपाल के प्रधानमंत्री ने जब हरिद्वार का सिडकुल देखा तो उन्होंने कहा था कि मैं कल्पना नहीं कर सकता कि किसी पहाड़ी राज्य में ऐसा औद्यौगिक परिसर हो सकता है।
पहले तो मैं आपको और अमर उजाला परिवार को बहुत सारी शुभकामनाएं और बधाई देता हूं। मुझे याद है उत्तराखंड के संघर्ष अमर उजाला का एक एक शब्द महत्वपूर्ण रहा है। आज भी संवाद हो रहा है और इसके लिए अमर उजाला बधाई का पात्र है। हमारी पार्टी का लक्ष्य था कि लोगों के विकास के लिए उत्तराखंड का निर्माण किया जाए। इसके लिए मैं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का देना चाहता हूं। पहले तो राज्य बन गया। मैं हरीश जी का बहुत सम्मान करता हूं और मेरे बड़े भाई है। आप 2002 में जिस उत्तराखंड को देखा था और आज उसकी तुलना करना चाहिए। हम लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। विकास एक निरंतर प्रक्रिया है और यह तेज और धीमे हो सकता है। हम अन्य राज्यों की तुलना में काफी तेजी से विकास हो रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि शुरुआत हमने बड़े शानदार तरीके से की। आगाज हमारा बड़ा शानदार था लेकिन हमने कुछ बुनियादी चीजें, जो इस राज्य के निर्माण की कारक थीं, उन कारकों को हमने जल्दी भुला दिया। वो कारक हमारे लिए प्रेरण के श्रोत होने चाहिए थे कि हम राज्य को आगे किस तरीके से लेकर चलें। हम धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश के कॉपी होने लगे। 2014 में हमने प्रयास किया, एक शब्द हमने उसके लिए कॉइनअप किया, उत्तराखंडियत... ताकि उत्तराखंड किस सोच की तरफ बढ़ना चाहिए, उस सोच को हमने एक नाम दिया उत्तराखंडियत का। मुझे अफसोस है कि इस बात कि 2000 सत्र के बाद उत्तराखंडियत की तरफ वो बढ़ते कदम रुक गए, और हम फिर से उसी कॉपी बुक फैशन पर चले गए।
हमारी शान उत्तराखंड सत्र में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक चर्चा कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि मैं आपको और अमर उजाला को इस बात के लिए बधाई देना चाहूंगा कि आप संवाद में नामचीन हस्तियों को बुलाते हैं, उनके विचार, उनकी कार्यगाथा सुनने और जानने का अवसर हमारे लोगों को देते हैं। पिछली बार हमें लगा कि सरकार ही एक पक्ष है, इस बार थोड़ा ऐसा लग रहा है कि विचलन किया है। मुझे बुलाकर एक शुरुआत की है, ताकि विपक्ष को संवाद का हिस्सा बनाया है। मैं उम्मीद करता हूं कि आगे ये चलन कायम रखेंगे। क्योंकि बिना पक्ष और विपक्ष के कोई भी लोकतांत्रिक जीवन पूरा नहीं हो सकता।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस दौरान उत्तराखंड अचीवर्स इश्यू का विमोचन किया। इस दौरान अचीवर्स का सम्मान भी किया गया।
सीएम धामी ने कहा कि जब हम लोग विद्यार्थी थे तो उस समय कभी कविता लिख लेते था। फिल्म देखने की बात करें तो, अब फिल्म नहीं देख पाता। लेकिन अंतिम फिल्म जो देखी थी वो आर्टिकल 370 देखी थी। अभी मैं लक्ष्य सैन का मैच देख रहा था। तो मैं लक्ष्य सैन को बधाई दूंगा।
ये मैंने दो लाइनें विद्यार्थी जीवन में लिखी थीं-
दूर जाना दून जाना ये न पूछे कितनी दूर जाना...
मत रोको मत रोको अपने प्रेम में मत रोको...
ये कहां है मेरा ठिकाना...
दूर जाना दून जाना ये न पूछे कितनी दूर जाना...
सीएम धामी ने कहा कि वाइब्रेट विलेज की योजना का लाभ काफी उत्तराखंड को मिल रहा है। प्रधानमंत्री जी ने ऐसी कई योजनाएं इस संबंध में की हैं। हमारे लिए प्रदेश के जो अंतिम गांव थे अब वो प्रदेश के पहले गांव कहे जाएंगे। लोग अब इन गांवों की ओर जा रहे हैं। मैं खुद भी योग दिवस पर यहां गया था और ये गांव काफी तेजी से आगे बढ़ रही हैं।
सीएम धामी ने कहा कि कारगिल दिवस 26 जुलाई को होता है कारगिल दिवस के दिन कहा था कि हम सभी अग्निवीरों को जो हमारे भारत सरकार की जो हमारी पैरामिलिट्री है उनसे सभी पैरामिलिट्री में भी जो है उनको एक विशेष सुविधा वहां पर मिलने वाली है। उत्तराखंड क्योंकि हमारा सैन्य प्रदेश भी है तो हमने पहले ही यहां पर कह दिया है कि जो भी अग्निवीर आएंगे, हम कोशिश करेंगे कि उनको कोई ना कोई सेवा अवश्य मिले। जहां आरक्षण देने की व्यवस्था है उसे पर काम कर रहे हैं। अग्निवीर जो आएंगे, वो पूरी तरह से अनुशासित होंगे, उनके अंदर कौशल होगा, हर प्रकार से दक्ष दक्ष होंगे। तो राज्य के अंदर बहुत सारे सेक्टरों में हम उनसे काम ले सकते हैं। उनकी सेवाएं आगे जारी हो सकती हैं।
सीएम धामी ने कहा कि हमारे राज्य की भौगोलिक परिस्थितियां काफी अलग है। मानसून में यह परेशानी और बढ़ जाती है। इसको लेकर हम काम कर है और इस संबंध में स्वास्थय विभाग काम कर रहा है। हमने हैली एबूंलेंस सेवा शुरू की है। हम कई योजनाओं को धरातल पर उतार रहे हैं। मेडिकल स्टाफ को लेकर भी हम काम कर रहे हैं।
यूसीसी पर धामी ने कहा कि इस पर काम चल रहा है, राष्ट्रपति से अनुमति ले ली गई है। इस संबंध में एक कमेटी काम कर रही है और स्थापना दिवस के पहले उसे लागू कर देंगे।
आज नकल पर कानून की आवश्कता पूरे देश में हो रही है। हमने यह कानून इसलिए बनाया ताकि छात्रों में एक विश्वास की भावना आए। हमने सौ से अधिक नकल माफियाओं को जेल में भेजा। इसके बाद हमने दस हजार भर्तियां की लेकिन किसी ने एक सवाल नहीं उठाया। हमें कई माता पिता ऐसे मिलते हैं जो कहते हैं कि मेरा बेटा कई बार से परीक्षा दे रहा था लेकिन अब वो सफल हो गया। नकल अध्या देश कानून लाकर मैं आज राज्य में सुचिता लाने का प्रयास कर रहा हूं। आज लोग अविभावक मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं।अतिक्रमण सरकारी जमीन जो भी है उसको जायज नहीं कहा जा सकता है। सरकारी जमीन से अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई जारी रहेगी।
जिस तरह से निवेशकों का हमारे ओर रूझान हुआ है आने वाले समय में हमें उत्पादन को और बढ़ाना है। गंगा नियंत्रण बोर्ड जब बना तो उसकी सहायक नदियों को लेकर रिपोर्ट जल्द आएगी। जल विद्युत को लेकर हमारा काम चल रहा है। सौर ऊर्जा को लेकर भी हम काम कर रहे हैं।
सीएम धामी ने कहा कि हम लोगों ने अभी पिछले दिनों इन्वेस्टर ग्लोबल समिट का आयोजन किया था। इसमें हमको लगभग तीन लाख 54 हजार करोड़ रुपये के एएमयू साइन किए गए हैं। हम इसको लेकर काम कर रहे हैं, 77 हजार करोड़ की ग्राउंडिग शुरू हो गई है। विकास को एक दो दिन में निर्धारित नहीं किया जा सकता। हमने आने वाले 25 साल का रोडमैप बना रखा है। देहरादून में ट्रैफिक समस्या को लेकर नितिन गडकरी जी से बात की है हम उसके लिए काम कर रहे हैं। हम रिंगरोड बनाने पर काम कर रहे हैं ताकि लोग शहर में न आए और बाहर के बाहर ही निकल जाएं।
धामी ने कहा कि 2019 से पहले विकास के पथ पर हमारा स्थान 10वां था, आज हमारा स्थान एक नंबर पर है। हमें जो यह स्थान प्राप्त हुआ है इसको लेकर अधिकारियों से बात की और उनसे कहा कि हमें इसको बनाकर रखना है। जंगल, जमीन, हवा, पानी ये बहुत आवश्यक हैं। अगर हम कोई पेड़ काटते है तो उसकी क्या कीमत हम चुकाएंगे उसका एक आंकलन होना चाहिए।
पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि मेरी यही कोशिश थी कि ज्यादा से ज्यादा पेड़ों का रोपण हो। हरेला हमारा त्यौहार भी है। हमारा प्रकृति संरक्षण का पर्व है और प्रकृति पूजन का पर्व भी है। पूरे राज्य में हरेला पर्व से एक महीने तक लगातार हमारा वृक्षारोपण का अभियान चलता है। सभी लोग इसमें सहभागी होते हैं अपने-अपने स्तर से और इस बार भी हमने लगभग एक करोड़ पेड़ लगाने का लक्ष्य लिया था। उसके अलावा अगर हम इस अभियान में लोग जुड़कर इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से जो उन्होंने विश्व पर्यावरण दिवस पर पूरे देशवासियों के लिए एक संदेश दिया था कि सभी लोग अपनी सहभागिता दर्ज कराएं। प्रदेश के अंदर तेजी से अभियान बढ़ भी रहा है। आज भी मैं आपको बताऊं कि प्रातः काल मैं आज तीन जगह पर मैंने वृक्षारोपण किया है और कल भी कम से कम इतने ही स्थान पर किया था। मैंने तो अपनी मां के नाम वृक्ष लगाया। मेरी मां ने अपनी मां के नाम वृक्ष लगाया।
सीएम धामी ने कहा कि देखिए जिस प्रकार से अभी माननीय प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद रेल, सड़क और परिवहन में काफी तेजी से विकास हुआ है। हमारे पर्यटकों की संख्या में काफी तेजी आई है। हमारे जो शहर है उनकी एक धारण करने की क्षमता है अगर उससे अधिक लोग आएंगे तो इस पर नजर रखनी होगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि हिमालय के राज्यों में ऐसी आपदाएं आम हो रही हैं। इस पर चिंतन किया जा रहा है। विकास हमारे लिए आवश्यक है इसे हम छोड़ नहीं सकते। हमको सब लोग देखते हैं पूरी दुनिया हमारी और हमारी विशेषता के कारण से भी जानती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि सबसे पहले मैं अमर उजाला के संवाद के इस कार्यक्रम में सबका स्वागत करता हूं। आपने अभी आपदा से संबंधित जो सवाल किया है उसको लेकर मैं बताना चाहता हूं कि 17 हजार लोगों को अभी निकाला जा चुका है। 12 स्थान ऐसे है जो भूस्खलन की चपेट में आ गए हैं। पहले दिन से ही प्रयास था कि फंसे लोगों को निकाला जाए। हमारी प्राथमिकता है कि जो लोग फंसे है उनको जल्द निकाल लें। सड़कों जल्द दोबारा तैयार कर लिया जाएगा। भूस्खलन आदि को जल्द दुरस्त करेंगे।अधिकारियों को उन स्थानों पर कैंप करने के लिए कहा गया है। मानसून का समय हमारे लिए चुनौतीपूर्ण होता है। हम इस पर काम कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी संवाद कार्यक्रम में पहुंच गए हैं। अमर उजाला के निदेशक वरुण माहेश्वरी और एमडी तन्मय माहेश्वरी ने सीएम धामी का स्वागत किया। इस दौरान तन्मय माहेश्वरी ने कहा कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विविधता की पावन भूमि पर आज मैं गर्व की अनुभूत कर रहा हूं। उत्तराखंड न केवल भारत बल्कि हरे भरे वन अलग दुनिया में ले जाते हैं। मैंने अपने जीवन के अहम छह साल यहां बताए हैं। पर्यटन हमारे राज्य को संबृद्ध बना रहा है। हमारा राज्य कृषि और बागवानी में भी तरक्की कर रहा है। सेब, संतरा और नाशपाती जैसी चीजे अलग पहचान बना रही है। उत्तराखंड की संस्कृति, लोक गीत और यहां की सुरीली आवाज कोने-कोने में जा रही है। राज्य में बजट का प्रबंध करना पलायन जल का भीषण संकट आर्थिक उन्नति के लिए नए रास्ते बेरोजगारी ऐसी बहुत सारी चीज हमको बेहतर करने के लिए प्रेरित करती हैं। उत्तराखंड तो इस देश के माथे का एक तिलक है यह वह तिलक है जो हमको सत्य और गर्व की अनुभूति कराता है। जैसे एक माथे का तेज इंसान के भीतर के तेज को दिखाता है ऐसे ही हमारे इस प्रदेश का तेज पूरे देश को रोशन करता है। उत्तराखंड और अमर उजाला का रिश्ता तो जग जाहिर इसके बारे में तो कुछ बताना मेरे लिए सही नहीं है, पर मैं आपसे एक चीज जरूर कहूंगा सुख में और दुख में संघर्ष में और खुशहाली में आपदा में और अवसर में हम सब आप सब एक साथ मिलाकर खड़े रहे हैं । हमेशा ऐसे ही खड़े रहेंगे। मुझे यह भी यकीन है कि हम सब मिलकर अपने आने वाले कल को आज से बेहतर बनाएंगे। उत्तराखंड की युवा पीढ़ी उत्तराखंड के संस्कार उत्तराखंड का तेज इस देश को एक माथे का फेस देखा और वह दिन दूर नहीं है जब हमारा प्रदेश और हमारा देश विकसित बनेगा। मेरी यही कामना है मेरी यही उम्मीद है और मेरी आशा है कि हम सभी मिलकर सभी लोगों की मार्गदर्शन में आदरणीय मुख्यमंत्री जी के मार्गदर्शन में और हमारी जितनी भी अलग-अलग फील्ड से खेल, बॉलीवुड, इंडस्ट्री उद्योग जगत से हम सभी के इनपुट के साथ में हमारे प्रदेश को एक नई दिशा मिलेगी। आशा करता हूं कि हमारी उन्नति दिन दुगनी और रात चौगुनी रहे।
आध्यात्मिक गुरु से सवाल जवाब का दौर जारी है। दर्शकों से तमाम तरह के सवाल उठ रहे जिनका वह लॉजिक के साथ समाधान कर रहे हैं। उन्होंने सिक्योरिटी से सफलता का मंत्र बताया।
इमोशन मैनेजमेंट बहुत जरूरी है। जीवन में सफल होना है तो टाइम मैनेजमेंट करना होगा। टाइम निकलता नहीं है निकालना पड़ता है। जो हमारी प्राथमिकता में होती है उसके लिए हम टाइम निकालते है। इसलिए प्राथमिकता में आपके क्या है, इसका निर्धारण करना होगा।
रिश्ते कभी स्वाभाविक मृत्यु नहीं मरते। हर रिश्ते की हत्या की जाती है। अहंकार के द्वारा। चाहे पति-पत्नी का रिश्ता हो, बाप-बेटे का रिश्ता हो। गुरु-शिष्य का रिश्ता हो। भगवान और भक्त का रिश्ता हो, जहां इगो आ गई, वहां दिक्कत आ गई।
अमोघ लीला दास प्रभु ने कहा कि दूध और पानी को अलग करने के लिए नींबू निचोड़ना होता है। आग अलग नहीं कर पाती क्योंकि पानी से दोस्ती को कायम रखने के लिए दूध उबलकर आग को बुझाने का काम करता है।
आध्यात्मिकता गुरु अमोध लीला प्रभु ने कहा कि रिलेशनशिप मैनेजमेंट भी बहुत जरूरी है। हम गुच्छों में अंगूर की तरह हैं तो कीमत है। लेकिन बिखर गए तो कीमत खत्म हो जाती है।
5. भावनाओं का प्रबंधन
पांचवीं बात है- ई यानी इमोशंस। भावुकता का प्रबंधन। भावनाएं होना जरूरी है। अब कॉर्पोरेट में आईक्यू और साइकोमैट्रिक टेस्ट के साथ-साथ एसक्यू यानी स्पिरिच्युअलिटी कोशंट टेस्ट भी आ गया है। अब दुनिया को अपनी भावनाओं की नजर से देखते हैं। भावनाएं होना अच्छी बात है, लेकिन उसका प्रबंध करना ज्यादा जरूरी है।
4. रिश्तों का प्रबंधन
चौथी बात है- आर यानी रिलेशनशिप। कई बार शीर्ष पर पहुंचे लोग बहुत अकेले होते हैं। अमीर लोगों के घर में कमरे ज्यादा होते हैं, लेकिन रहने वाले सिर्फ दो लोग होते हैं। ऐसे लोग रिश्तों को नहीं संभाल पाए। अंगूर गुच्छे में भी मिलते हैं और बिखरे-बिखरे भी मिलते हैं। गुच्छे में मिलने वाले अंगूर की कीमत बिखरे अंगूरों से ज्यादा होती है। चीजें टूट जाएं तो मरम्मत हो सकती है। दिल टूट जाए तो कैसे मरम्मत होगी? हम अक्सर लोगों को माफ नहीं कर पाते। कोई हमें अपशब्द कह दे, हमसे राजनीति करे तो हम उसे माफ नहीं कर पाते। हमारा अहम् हमें ऐसा करने से रोकता है। आपको यह तय करना होगा कि ज्यादा जरूरी क्या है? बहस में जीतना या रिश्तों को संभालना? दूध और पानी के बीच दोस्ती होती है। दूध पानी से कहता है कि तुमने खुद को मुझमें मिला लिया? पानी कहता है कि जब हमें उबाले तो मैं पहले उड़ जाऊंगा। दूध और पानी तभी अलग हो सकते हैं, जब उनमें कोई नींबू निचोड़ देते हैं। कोई भी रिश्ता स्वाभाविक मौत नहीं मरता, अहम् उसकी हत्या कर देता है।
3. संगति का प्रबंधन
तीसरी बात है- सी यानी कंपनी मैनेजमेंट। आप किनके साथ हैं, इससे आपके व्यवहार का पता चलता है। आप जिंदगी में किन शीर्ष पांच लोगों के साथ जुड़े हैं, इससे आपके व्यक्तित्व का पता चलता है। आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दिया था। एक बार उनके ड्राइवर ने उनके जैसा भाषण दे दिया, लेकिन श्रोताओं में से किसी ने ड्राइवर ने सवाल पूछ लिया। उसने कहा कि यह तो आसान है, मेरा ड्राइवर भी जवाब दे देगा। कभी-कभी आपकी जिंदगी में तनाव नहीं रहता, लेकिन फिर तनाव आता कैसा है- संगति से। संगति आपको बना सकती है, बिगाड़ भी सकती है। मौजूदा पीढ़ी में संवेदनशीलता की कमी है। वे गैजेट्स, स्मार्टफोन्स की संगत में रहते हैं, जिनमें संवेदनशीलता ही नहीं रहती। टेक्नोलॉजी खराब नहीं है। वह आपकी मालिक बनेगी तो बिगाड़ेगी, वह आपकी सेवा में रहेगी तो ठीक रहेगी
2. प्रयास प्रबंधन
दूसरी बात है ई यानी एफर्ट्स। प्रयासों का प्रबंधन भी जरूरी है। सोए हुए शेर के मुख में मृग कभी नहीं जाएगा, शेर को प्रयास करने होंगे। आजकल लोग प्रयास नहीं करते।प्रयास के लिए लोगों को कंफर्ट जोन से बाहर आना पड़ता है। पहले हमारे समाज में जाति के आधार पर वर्गीकरण था उसे जातिवाद से जोड़ दिया गया लेकिन वह काम के आधार पर वर्गीकरण किया गया था। अगर बच्चा अपने स्वभाव के मुताबिक पढ़ेगा तो ही उसका मन लगेगा। अक्सर लोग वहां प्रयास करते हैं, जहां उनका स्वभाव नहीं होता है। इसलिए प्रयास प्रबंधन बेहद अहम हैं।
मैंने कम्प्यूटर साइंस सीखा है। पढ़ाई के बाद आपको लैब में जाना होता है, वहां प्रैक्टिस करनी होती है, तब जाकर कोडिंग आती है। सोशल मीडिया की दुनिया ने लोगों से पढ़ना चाहिए। फेसबुक आया तो लोगों के चेहरों के आगे से किताबें हट गईं। लोग फोन में समाधि मुद्रा में होती है। पहले वर्ण व्यवस्था थी, लेकिन वह असल में इसलिए था ताकि आप अपने स्वभाव के अनुसार अपना काम चुनिए। इसमें ऊंच-नीच की बात ही नहीं थी।
हरे कृष्णा। बहुत-बहुत धन्यवाद अमर उजाला का, आपने हमें यहां आमंत्रित किया। अमर उजाला की इस सुंदर संवादशाला में हमको यहां आमंत्रित किया इसके लिए आभार।
दर्शकों से सवाल सफलता क्या है?
1. आत्म प्रबंधन
सफलता के सीक्रेट में कुछ शब्द छुपे हैं। इनमें सबसे पहला है- एस यानी सेल्फ। इसके मायने हैं आत्म प्रबंधन। अब इसमें आत्म क्या है? खुद को जानना जरूरी है। इससे जुड़े कुछ वेग हैं। पहला है- परउत्कर्ष वेग। यानी दूसरों को आगे बढ़ते हुए देखने पर आने वाली प्रतिक्रिया। यही ईर्ष्या और द्वेष को बढ़ाती है। जब दूसरों से हमें कम मिले तो द्वेष होता है और दूसरों को कुछ भी न मिले, यह भावना आ जाए तो वह ईर्ष्या कहलाती है। हमें दूसरो को आगे बढ़ते देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, बल्कि प्रेरणा लेनी चाहिए। दूसरा वेग है- द्वंद्व वेग। खुशी और निंदा, दोनों को संभालना जरूरी है। जब तक आप द्वंद्व में स्थिर रहना नहीं सीखेंगे, तब तक आप कामयाब नहीं हो सकते। बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों से सीखता है। घास के तिनके से हम विनम्रता सीखते हैं। वह तूफान में झुकना जानता है। वृक्ष से हम सहिष्णुता सीखते हैं। परामर्श, द्वंद्व, दूसरों की प्रगति स्वीकार करना जरूरी है। ...यह हुई आत्म प्रबंधन यानी सेल्फ मैनेजमेंट की बात।
जो नई शिक्षा प्रणाली है वो आपको मौका देता है कि पचास प्रतिशत कोर्स स्किल के हो सकते हैं। भारत सरकार ने इसके लिए कई इंडस्ट्री से करार किए हैं। इस दिशा में काफी तेजी से कार्य चल रहा है। यह जरूरी है कि इसकी जानकारी बच्चों तक पहुंचे। टेक्नीलॉजी में बहुत तेजी से बदलाव हो रहा है और इसके कारण भी समस्या आ रही है। इसके लिए हमें डायनमिक होना पड़ेगा।
प्रोफेसर राजीव सदस्य सचिव एआईसीटीई ने कहा कि सबसे पहले अमर उजाला ग्रुप को धन्यवाद। हायर एजुकेशन को लेकर जो शंकाय हैं उनको लेकर बात करते हैं। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जो 100 बच्चों में 28 बच्चे हायर एजुकेशन के लिए जा रहे हैं। सरकार का लक्ष्य है कि इसको 50 प्रतिशत तक पहुंचा दिया जाए। नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क को आपको समझना होगा। इसके कई लेवल होते हैं और उसको देखना होगा। नई एजुकेशन पॉलिसी में एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज कुछ भी नहीं है। आपको इसको समझना होगा।
आईएस शैलेश ने कहा कि हम लोग बात करते हैं तो हमारा एक तो टेक्निकल एजुकेशन सेक्टर है, मेडिकल एजुकेशन सेक्टर है और एक सेक्टर है जहां पर हम ह्यूमैनिटीज कोर्सेज और फाइनेंस की प्रक्रिया को लेकर चलते हैं। यह हमारे रेगुलर कॉलेज हैं जहां पर बीएससी हैं आज के कोर्सेज हैं, उनको हम लोगों को कम करने की बहुत आवश्यकता है। अभी जैसे आपने देखा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई हुई है। उसमें विशेष फोकस यह है कि जो हमारे स्टूडेंट हैं जो इन कॉलेज में पढ़ रहे हैं उनको कैसे ऐसी शिक्षा दी जाए, ताकि जिससे उनको रोजगार मिल सके, हम लोग काफी कुछ इनिशिएटिव हमारे प्रदेश में लिए कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि अगर मैं बात करूं तो सबसे पहले कोविड के समय देखेंगे। पिछले डेढ़ साल में हमने पूरी एक टीआरपी को, पूरे सिस्टम को ऑटोमेटेड करने की, पूरे सिस्टम को डिजिटल करने की कोशिश की है। बच्चों के एडमिशन के समय यह ध्यान रखा जा रहा है कि एग्जाम समय से हो जाएं, रिजल्ट समय जारी हो जाए, ताकि उनको जो एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पढ़ाई करनी चाहिए, वो 180 दिन की पढ़ाई उनकी सुनिश्चित हो सके।
इस दिशा में हम लोगों ने काम किया है। पिछले दो सेशन से हम लोग लगातार उसके माध्यम से एडमिशन भी कर रहे हैं। उसके माध्यम से हमें एजुकेशन पॉलिसी पर फोकस करने की जरूरत है। हम लोगों को रिसर्च में प्रमोट करने की जरूरत है, इसके रिसर्च को और उसके डेवलपमेंट को प्रमोट करने के लिए भी काफी इनीशिएटिव लिए जा रहे हैं। ।
शैलेश बगोली ने कहा कि हमें रिसर्च और स्किल डेवलपमेंट के लिए काम करना होगा। शिक्षा के लिए यह जरूरी है कि साल में कम से कम 180 दिन पढ़ाई हो।
अगला सत्र रोशन राहें की शुरुआत हुई है। इस सत्र में शैलेश बगोली (आईएएस) सचिव उच्च शिक्षा विभाग, प्रोफेसर राजीव सदस्य सचिव एआईसीटीई, वाइस चांसलर राकेश कुमार, ग्राफिक एरा ग्रुप चर्चा कर रहे हैं।
अजय डांग ने कहा कि जब आप धर्म के स्थानों का पर्यटन के रूप में होने की बात करते हैं तो यह दुनिया में सबसे ज्यादा है। लेकिन आपको इसको बहुत ही सावधानी से ऐसा करना चाहिए। हमें अपनी धरोहर सभी के साथ शेयर करना चाहिए। कोई उत्तराखंड आना चाहता है तो उसका स्वागत है।
शुभ्रांशु सिंह ने कहा कि विकास होगा या नहीं, रोजगार बढ़ेगा या नहीं, यह देखना होगा। उत्तराखंड को आप पूरी तरह सील नहीं कर सकते। विकास के लिए जहां से भी पूंजी, तकनीक और लोग चाहिए, आपको उन्हें यहां लाना होगा।
अजय डांग ने कहा कि यह राज्य के लोगों को तय करना है। विकास के लिए जमीनें भी लगेंगी, प्राकृतिक संसाधन भी चाहिए होंगे। लोग मूल निवासी हो सकते हैं, लेकिन पूंजी कहीं की मूल निवासी नहीं होती। पूंजी जहां आए, वहां उसका स्वागत होना चाहिए।
अजय डांग ने कहा कि मिनिएचर उद्योग क्षेत्र होने चाहिए। हर शहर में रोजगार के अवसर बनाने होंगे। ऐसा नहीं होता तो एक शहर से दूसरे शहर और एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन होता रहेगा। अगर प्रतिभावान युवा यहां से जा रहे हैं तो उन्हें यहां रोके रखने के लिए योजनाएं बनानी होंगी।
शुभ्रांशु सिंह ने कहा कि उद्योग आता है तो वह एक व्यक्ति के लिए नहीं होता। पूरा परिवेश मिलना जरूरी है। उद्योग लगाएंगे तो प्रतिभाशाली लोग, कच्चा माल और उनकी आपूर्ति हो सकेगी या नहीं, यह देखना होगा। देश के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि हर जगह परिवेश मिले। इसके लिए बुनियादी ढांचा जरूरी है। सड़कें देखकर हमें लगता है कि इससे तो ट्रैफिक जाम बढ़ेगा, लेकिन इससे रोजगार भी तो आ रहा है।
अजय डांग ने कहा कि सड़कें पहुंचेंगी तो कारोबार पहुंचेगा। पर्यटन और गतिशीलता इससे बढ़ती है। गतिशीलता बढ़ती है तो एक रुपया 10 से 12 हाथों से गुजरता है। स्थानीय उद्यमशीलता इससे बढ़ती है। जब सब्सिडी या प्रत्यक्ष लाभार्थियों का दायरा बढ़ता है तो यह कारगर साबित होता है।
शुभ्रांशु सिंह ने कहा कि विकास और पर्यावरण सिर्फ उत्तराखंड की दिक्कत नहीं है। जहां कहीं प्रकृति है, वहां यह चुनौती है। हम सड़कें इसलिए बनाते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कनेक्टिविटी रहे। खेल का मैदान, स्कूल बनने पर अगर युवाओं का फायदा होता है तो वह क्यों न बने। इसी तरह सड़क बनने से गांवों की तस्वीर बदलती है। इसे मानवीय पहलू से देखना होगा।
अजय डांग ने कहा कि यहां पूंजी निर्माण सबसे महत्वपूर्ण होगा। हमें स्थानीय उत्पाद प्रमोट करने होंगे, लेकिन इसी के साथ बाहरी निवेश आए, यह जरूरी है। यह निवेश भी निजी क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आए तो पहचान तेजी से बढ़ेगी। हथकरघा के मामले में उत्तराखंड की पहचान बन सकती है।
शुभ्रांशु सिंह ने कहा कि 20 साल पहले राज्य की पहचान बनना शुरू हुई। पहचान बनते देर लगती है। सकारात्मक बात यह है कि उत्तराखंड को लेकर नकारात्मक पहलू ज्यादा नहीं हैं। जब लोग यहां आकर नई चीजें देखते हैं, उसका तजुर्बा लेते हैं तो नई धारणा लेकर लौटते हैं। दूसरों से सीखना अच्छी बात है, लेकिन उत्तराखंड का विकास का अपना मॉडल होना चाहिए।
अजय डांग ने कहा कि कॉर्पोरेट और निवेश करने वालों की बात करें तो वे उत्तराखंड के बारे में कम जानते हैं। वे धार्मिक पर्यटन के बारे में ही जानते हैं। हालांकि, उत्तराखंड से लोगों का लगाव जरूर है। वे उत्तराखंड को मेहनती लोगों के राज्य के रूप में देखते हैं। तो एक तरह से निवेश के लिए यह धारणा अनुकूल है। उत्तराखंड देश के इतिहास में प्राचीनतम है, लेकिन यह राज्य नया है। धीरे-धीरे यहां विकास होगा। एक करोड़ की आबादी यहां आबादी। सारे पर्वतीय राज्यों में सबसे अच्छा प्रदर्शन उत्तराखंड का है।
शुभ्रांशु सिंह ने कहा कि उत्तराखंड निवेश के लिए आदर्श है। पहले कहा जाता था कि उद्योग अब चुनिंदा जगहों पर ही लगेंगे। आईटी के आने के बाद और कोरानाकाल के बाद यह मिथक अब टूटता दिख रहा है।
अगला सत्र देश की विकास बात सत्र में अल्ट्राटेक सीमेंट प्रेसिडेंट मार्केटिंग हेड अजय डांग और सीवीबीयू टाटा मोटर्स चीफ मार्केटिंग ऑफिसर शुभ्रांशु सिंह से चर्चा चल रही है।
नितिन गडकरी के बारे में क्या कहेंगे?
अजय टम्टा: जिस तरह प्रधानमंत्री बहुत मेहनत के साथ राष्ट्र निर्माण में लगे हैं, नितिन जी का भी वही योगदान है। 2047 तक भारत की सड़कें और बुनियादी संरचना कैसी हो, हम इस पर काम कर रहे हैं। नितिन जी विजनरी हैं। सड़क मंत्रालय अब रक्षा के बाद सबसे ज्यादा बजट वाला मंत्रालय है। सभी राज्यों को सड़कों का लाभ मिले, हम इस पर काम कर रहे हैं।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के कामकाज को उत्तराखंड से कैसे जोड़ेंगे?
अजय टम्टा: किसी भी क्षेत्र में सड़क पहुंचना बहुत जरूरी है। विकास के लिए कनेक्टिविटी जरूरी है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू हुई थी। जब यहां एक इलाके में सड़क आई तो लोगों ने जश्न मनाया। अब यहां हर ग्राम पंचायत को हमने सड़क से जोड़ा है। 2017 में यहां चारधाम के लिए ऑलवेदर रोड योजना की शुरुआत हुई। तब मैंने कहा कि कैलाश मानसरोवर धाम भी यहां है। अब आदि कैलाश तक भी ऑलवेदर रोड जा रही है। 213 किलोमीटर की रोड दिल्ली-देहरादून की सड़क बन रही है। अब ढाई घंटे में दिल्ली से देहरादून जा सकेंगे। नदी मार्ग पर भी सड़क बन रही है, लेकिन यह तकनीकी तौर पर सर्वे करने के बाद बन रही है। ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर भी एलिवेटेड रोड बन रही है। देहरादून के बाहर 52 किलोमीटर का रिंग रोड बना रहे हैं। ऋषिकेश के जाम में लोग घंटों फंसते हैं। ऋषिकेश से नटराज चौक और ढालवाला पॉइंट तक 18 किलोमीटर का बायपास बना रहे हैं। काठगोदाम से लेकर नैनीताल तक सिंगल लेन है, उसे डबल लेन करने वाले हैं। जब केंद्र में दायित्व मिला, तब मैं लिपुलेख तक सड़क मार्ग से ही गया। बद्रीनाथ और माणा तक गया। अब हमने निर्देश दिया कि बिना विस्फोट के सड़कें बनाएं।
उत्तराखंड में विकास की दिशा क्या होनी चाहिए? ग्लेशियरों के पिघलने और सड़कें बनने में एक विरोधाभास है। इससे कैसे निपटेंगे?
अजय टम्टा: यहां बहुत सी संभावनाएं हैं। यहां की भौगौलिक परिस्थितियां विशेष हैं। हम हॉर्टिकल्चर में बहुत अच्छा काम कर सकते हैं। अभी हम 10-12 फीसदी ही काम कर पा रहे हैं। यहां सब्जियों के उत्पादन, जड़ी-बूटियों के उत्पादन में बहुत संभावनाएं हैं। कोरोनाकाल में देशभर के लोग यहीं उत्तराखंड में रहकर काम कर रहे थे। यहां चारधाम के साथ-साथ पर्यटन के बाकी स्थल भी हैं। अब गर्मी देशभर में पड़ रही है, देहरादून में यातायात की समस्या है। एशिया का सबसे बड़ा ग्लेशियर यहीं है। डेढ़ साल पहले यह ग्लेशियर पीछे चला गया। असल में बर्फ पीछे हो जाती है। अब सड़क वहां तक भी पहुंचेगी। उत्तराखंड में त्रासदियां भी आ रही हैं, लेकिन यह सिर्फ उत्तराखंड की वजह से है या दुनियाभर में यही दिक्कत है, यह देखना होगा।
अजय टम्टा: उत्तराखंड के भूस्वामियों के पास बड़ी जमीनें नहीं हैं। 2007 में उत्तराखंड सरकार की पहली कैबिनेट में इस पर चर्चा की गई थी। तब हमने रोक लगाई थी कि ढाई सौ वर्ग मीटर से ज्यादा भूमि बाहर के लोग नहीं खरीद सकेंगे। भविष्य का समय चुनौतीपूर्ण है। यहां के लोग भूमिविहीन न हों, इसकी चिंता करनी होगी। हिमाचल में यह नियम है कि कृषि की जमीन बाहर का व्यक्ति नहीं खरीद पाता। किन्नौर में अगर किसी बेटी से कोई बाहरी शादी करे, तो भी वह वहां जमीन नहीं खरीद सकता।
बाहर के लोग जमीन खरीद रहे हैं और उसको लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी है उसे कैसे दूर किया जाएगा?
टम्टा: उत्तराखंड के अंदर जो जमीनों के मालिक हैं बहुत बड़ी जमीन के मालिक नहीं है। 2007 में जनरल खंडूरी यहां मुख्यमंत्री थे उन्होंने चिंता भी की। राज्य में उन्होंने कानून बनाया। बहुत सारे लोग जमीन खरीद रहे थे। हमने तब कानून बनाया और बाहर के लोगों के द्वारा खरीदी जा रही जमीन पर रोक लगाने का प्रयास भी किया। यहां के लोगों के लिए अभी भी चिंता करने की जरूरत है। हिमाचल में अगर कोई जमीन खरीद लेता है सरकार की अनुमति के बाद भी उसे मालिकाना हक नहीं मिलता। हिमाचल में अगर कोई वहां की लड़की के साथ शादी करता है तो उसे जमीन खरीदने का अधिकार है, लेकिन उत्तराखंड में ऐसा अधिकार नहीं है। आज बहुत ही आवश्यकता है कि कानून का कड़ाई से पालन किया जाए और यहां की जमीनों को बचाया जाए।
अजय टम्टा: उत्तराखंड में पढ़ने-लिखने पर बहुत जोर है। डॉक्टर यहां काम आते हैं, लेकिन कोई इंजीनियर बन जाता है तो उसके लिए यहां नौकरियों के उतने अवसर नहीं हैं। ऐसे युवाओं के लिए यहां अवसर बनाने होंगे। यहां आईटी हब बनाना होगा। जहां रेल, सड़क और हवाई कनेक्टविटी है, वहां पर ये हब विकसित करने होंगे। हमारी कुछ प्रतिभाएं वापस भी आई हैं। लोगों ने अपनी पढ़ाई-करियर के साथ यहां भी रोजगार के मौके देखे। होम स्टे इसका एक उदाहरण है।
केंद्रीय मंत्री टम्टा ने कहा कि हिमाचल की तर्ज पर हार्टिकल्चर के क्षेत्र में विकास की जरूरत है। संभावना भी बहुत है, जब कोरोना काल आया तो उत्तराखंड में बाहर रहने वाले लोग यहां आकर संभावनाओं की तलाश कर रहे थे।
टम्टा ने कहा कि गांव-गांव की समस्या और पहाड़ का दर्द स्वयं पर आधारित है। परिवार सोचता था कि बच्चा पढ़ ले तो कहीं अच्छी नौकरी मिल जाए। आज, पंचायतों में लगातार अवसर मिला तो इस सफर में हम मुकाम पर पहुंचते दिख रहे हैं। आज पहाड़ों में सड़क और तमाम विकास कार्य हुए हैं। आज जन-जीवन सामान्य हुआ है। केंद्रीय मंत्री टम्टा ने कहा कि 2007 से लेकर 2009 तक मैं मंत्री रहा, लेकिन इस बीच सफलता-विफलता भी मिली। उत्तराखंड राज्य के अंदर इतनी संभावनाएं हैं कि बेहतर किया जा सकता है।
कार्यक्रम का अगला सत्र 'भारत के विकास की बात' में केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा से बातचीत चल रही है।
सवाल-आपकी अब तक की राजनीतिक यात्रा कैसी रही?
अजय टम्टा: सबसे पहले तो अमर उजाला परिवार को बधाई देता हूं कि वह लंबे समय से सूचनाओं का आदान-प्रदान करने का काम कर रहा है। ...मैं राजनीतिक परिवार से नहीं हूं। मेरे पिताजी अफसर रहे। हम उत्तराखंड को लेकर आंदोलित होते थे। तब सोचते थे कि यहां बहुत संभावनाएं हैं, लेकिन यहां सुविधाएं नहीं हैं। विद्यार्थी परिषद में काम करने के बाद सबसे युवा जिला पंचायत अध्यक्ष बना। हमारे घर-गांव की व्यवस्थाएं स्वयं पर आधारित होती थीं। जंगल, पानी, खेत-खलिहान सब यहीं था। माता-पिता चाहते थे कि बच्चा फौज में जाए या डॉक्टर-इंजीनियर बने। 1936 में उत्तराखंड से पहली महिला स्नातक लक्ष्मी टम्टा थीं। मैं उनके परिवार से हूं। वे 'समता' नाम से अखबार भी निकालती थीं। ...मेरा अब तक का सफर सौभाग्यमय रहा है। मुझे मोदी जी ने महत्वपूर्ण कार्य दिया है। नितिन गडकरी जी ने देश में जो राजमार्ग बनवाए हैं, उस प्रयास का मैं भी हिस्सा रहा हूं। एक बार जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और विधायक का चुनाव लड़ा, तब विफलता मिला। फिर 2009 में लोकसभा का चुनाव लड़ा और 6900 वोट से हार गया। राजनीतिक जीवन में सफलता-विफलता मिलती रहती है, लेकिन जनता से जुड़े रहना चाहिए।
स्वामी गोविंद देव गिरी जी ने यहां पक्षपात रहित विकास का दौर चलना चाहिए। यहां के मुख्यमंत्री ने समान नागरिक संहिता लागूकर देश के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। विकास ही पर्याप्त नहीं है। अमर उजाला ने संवाद की यह पहल की है। हमारी संस्कृति में आदित्यवर्णम् तमसः परस्तात् में भी प्रकाश फैलाने का यही नाम छुपा है। उत्तराखंड पूरे देश का श्रद्धा स्थान है। इस उत्तराखंड के लिए पूरा देश भी योगदान देने को तैयार रहेगा। यहां का युवा परिश्रमी है। यहां की जनता अत्यंत प्रामाणिक रही है। यहां का निवासी निष्पाप हृदय का है, लेकिन उसे साधनहीन बना दिया गया। उसमें दोबारा आत्मविश्वास भरने का काम सरकार को करना चाहिए।
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी जी ने कहा कि पानी बचाना जरूरी है। इसके लिए वर्षा से पूर्व ही तालाब खुदवाने होंगे। पहले राजा ऐसा ही करते थे, अगर उत्तराखंड में भी ऐसा हो तो पानी बचेगा और आदर्श प्रदेश बनेगा। उत्तराखंड का विकास यहां की समस्याओं का समाधान मिलकर होगा।
स्वामी गोविंद देव गिरी जी ने कहा कि उत्तराखंड का विकास, विरासत के साथ विकास, समाधान और बाकी बातों पर विमर्श यहां होगा। सारे संसार को जल देने वाली गंगा जहां से निकलती है, वही उत्तराखंड पानी की किल्लत झेल रहा है। नारदजी ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर से सुशासन के बारे में पूछा था। नारदजी ने पूछा कि यह बताओ कि राजन, जल की आपने क्या व्यवस्था की है क्योंकि जल का निर्माण नहीं किया जा सकता। वर्षा संचित जल को ही रखा जा सकता है। पोखर बनाए जाएं और वर्षा जल एकत्र किया जाए। ज्ञान का जो प्रकाश महाभारत में मिलता है, भारतीय संस्कृति के ज्ञान के इस प्रकाश में ही हमें उत्तराखंड की समस्याओं का समाधान करना पड़ेगा। मन व्यथित हो जाता है, जब यहां के युवा पलायन करते हैं। जहां वेदव्यास जी ने सारा लेखन कार्य किया, वहां शिक्षा की कमी क्यों है। हमारे पूर्वजों ने यह नहीं कहा कि हिमालय में तीर्थ है, पूरा हिमालय ही तीर्थ है। यहां का कण-कण तीर्थ है। यहां पानी, शिक्षा, सड़कों की कमी और पलायन है। यहां की संस्कृति का विनाश करने आए घुसपैठियों का बढ़ता दबाव हमारे सामने है। इन सबका उत्तर क्या है? एक ही उत्तर है। उत्तराखंड के युवकों के भीतर भक्ति का जागरण करने की आवश्यकता है कि हम बाहर नहीं जाएंगे। पढ़कर यहां लौटेंगे। निर्माण कर यहां लौटेंगे और देखेंगे कि यहां उद्योग कैसे चलेंगे। संपूर्ण भारत की भक्ति करने वाले वीर सावरकर, शहीद भगत सिंह जैसे व्यक्तित्व हुए। युवाओं को उत्तराखंड के विकास के लिए खुद को अर्पण करना होगा। यह पर्व भक्ति और समर्पण करेगा।
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी जी ने कहा कि 21 दिन की महाभारत कथा में व्यस्त हूं। वैसे ऐसे मौकों पर अपना स्थान छोड़कर कहीं जाते नहीं। यहां पता चला कि संवाद का आयोजन हो रहा है तो मुझे लगा कि महाभारत से ज्यादा यह उपयोगी होगा। पहले मुझसे कहा था जाता कि आप महाभारत के इतने आग्रही क्यों है। संपूर्ण वेदों का सार इसी में आता है। महाभारत के लेखक वेदव्यास जी ने जिस प्रकार यह ग्रंथ लिखा है, मुझे अमर उजाला यह शब्द सुनते ही एक नाम और प्रसंग की याद आती है। महाभारत क्या है? ज्ञानमय प्रदीप है। अमर उजाला का अर्थ होता है- द एटर्नल लाइट। यह कहां से आती है? यह प्रकाश भारत से ही आता है। भारत को यह प्रकाश उत्तराखंड से मिलता है। इसी उत्तराखंड में वेदव्यासजी ने महाभारत लिखा। महाभारत ने हमें यह ज्ञान दिया कि संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जो महाभारत में मिलेगा, वही सब जगह मिलेगा, जो यहां नहीं मिलेगा, वह कहीं नहीं मिलेगा। विदेशों में 30 वर्षों से जाते-जाते मैंने यह अध्ययन किया कि प्रबंधन, स्वयं सहायता, नेतृत्व क्षमता और आपसी संबंध, इस बारे में बहुत कुछ लिखा जाता है। इस परिप्रेक्ष्य में महाभारत जैसा ग्रंथ कोई नहीं है। अमर उजाला ने ऐसे ही एक प्रकाश के जरिए इस देश को प्रभावित किया है।
संवाद कार्यक्रम में अमर उजाला के एमडी तन्मय माहेश्वरी ने स्वामी श्री गोविंद देव गिरी जी महाराज का स्वागत किया। महाराज जी ने कहा कि महाभारत को पढ़ने में बेहतर महान भारत के निर्माण में प्रयास करें। भारत का निर्माण उत्तराखंड से होता है। भारत को प्रकाश मिला है उत्तराखंड से। उत्तराखंड का विकास यहां की समस्याओं का समाधान मिलकर होगा। उत्तराखंड का कण कण तीर्थ है। बाहर के घुसपैठियों का दबाव बढ़ रहा है। उत्तराखंड के युवाओं को जागरूक करना जरूरी है। बाहर से पढ़कर वापस उत्तराखंड लौटें और राज्य का विकास करें।
उत्तराखंड के बहुआयामी विकास का महामंथन अमर उजाला संवाद का कार्यक्रम थोड़ी देर में शुरू होगा। कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा पहुंच चुके हैं।
अमर उजाला संवाद कार्यक्रम के शिक्षा पर आधारित विशेष सत्र में देश के जाने-माने शिक्षाविदों के साथ ही शिक्षा नीतियों को अमलीजामा पहनाने वाले अधिकारी भी शिक्षा के स्वरूप और उसकी गुणवत्ता पर मंथन करेंगे। इसके अलावा वह देश में शिक्षा के भविष्य पर विस्तार से चर्चा करने के साथ उसमें सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी देंगे।
पद्मश्री से सम्मानित मुरलीकांत पेटकर रविवार को देहरादून में होने वाले अमर उजाला कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। मुरली पेटकर का जन्म महाराष्ट्र के सांगली जिले के पेठ इस्लामपुर गांव में एक नवंबर, 1944 को हुआ था। उन्हें बचपन से ही खेल-कूद का शौक था। पढ़ाई के समय वह अक्सर खेलने के लिए मैदान पहुंच जाते थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब मुरलीकांत 12 साल के हुए तब उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव हुआ था। दरअसल, 12 साल की उम्र में मुरलीकांत और गांव के बेटे के बीच कुश्ती का मुकाबला हुआ जिसमें पेटकर को जीत मिली। आमतौर पर मुकाबला जीतने के बाद विजेताओं को बधाई मिलती है लेकिन मुरलीकांत के साथ उल्टा हुआ। उन्हें और उनके परिवार को जान से मारने की धमकी मिली।
पद्मभूषण से सम्मानित जैवलिन थ्रोअर देवेंद्र झाझरिया रविवार को देहरादून में होने वाले अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। वह पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय हैं। झाझरिया फिलहाल पैरालंपिक समिति के अध्यक्ष हैं। खेल के अलावा झाझरिया राजनीति में भी सक्रिय हैं। लोक सभा चुनाव 2024 में उन्हें भाजपा ने चुरू से मैदान में उतारा था। हालांकि, उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
अभिनेता जॉन अब्राहम ने इंडस्ट्री में एक्शन हीरो के रूप में खास पहचान बनाई है। अपने करीब दो दशक के करियर में उन्होंने हर तरह की शैली की फिल्में की हैं, लेकिन एक्शन के मामले में उन्हें दर्शकों से भरपूर प्यार मिला है। इन दिनों जॉन अपनी आगामी फिल्म 'वेदा' को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म इसी महीने आजादी के पर्व पर रिलीज होगी। जॉन अब्राहम रविवार 4 अगस्त यानी आज अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में होने जा रहे इस कार्यक्रम में अभिनेता 'सिनेमा में एक्शन' विषय पर चर्चा करेंगे।
भारतीय टीम के स्टार तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी रविवार को देहरादून में होने वाले अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। उत्तर प्रदेश के अमरोहा में रहने वाले शमी ने पिछले साल वनडे विश्व कप में खूब चमक बिखेरी थी, लेकिन फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मिली हार के बाद वह चोटिल हो गए और फरवरी में उन्हें सर्जरी करानी पड़ी। शमी अब तक इस चोट से पूरी तरह नहीं उबर सके हैं जिस कारण उनकी टीम में वापसी होने में देरी हो रही है।
संवाद कार्यक्रम में होने वाले खेल के विशेष सत्र में भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी, भारतीय पैरालंपिक खिलाड़ी मुरलीकांत पेटकर, भारतीय पैरालंपिक खिलाड़ी देवेंद्र झाझरिया और भारतीय पैरालंपिक खिलाड़ी डॉ. दीपा मलिक अपने अनुभव साझा करने के साथ खेलों की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।