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Yoga Tips: नृत्य और संगीत से कैसे बदल सकती है आपकी सेहत? जानिए इन लोक नृत्यों के फायदे

Thu, 26 Jun 2025 04:15 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

Yoga Tips: योग हो या नृत्य, ये आपके शरीर को लचीला बनाते हैं, जिससे मोटापा घटता है और स्टैमिना बढ़ता है। योग और संगीत आपके फेफड़ों तथा हृदय की सेहत में सुधार करते हैं एवं शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
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नृत्य और संगीत है योग - फोटो : Freepik
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विस्तार
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रघुवीर सिंह
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योग में शास्त्रीय नृत्य की भी बहुत-सी मुद्राएं हैं और भारतीय नृत्य की हर शैली में योग की क्रियाएं। इसीलिए डांस एक्सरसाइज का काम भी करता है और योग आपके मन को सुकून पहुंचाता है। स्वस्थ जीवनशैली के लिए हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि योग और संगीत को हम अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाएं।

 मशहूर शास्त्रीय नृत्यांगना मोलिना सिंह को बचपन से योग के आसन, क्रियाएं और मुद्राएं बहुत पसंद थीं। उन्होंने जब दिल्ली के कथक केंद्र में दाखिला लिया तो वहां पहले उन्हें ‘निष्पंद भाव’ में बैठने को कहा गया। इसमें पैरों को फैलाकर, दीवार का सहारा लेकर, हाथों को जांघों पर रखकर निष्क्रिय रूप से किसी ध्वनि को सुनते हुए बैठना था। इस अवस्था से जब वह बाहर आईं तो पूरी तरह तरोताजा और नृत्य के लिए तैयार थीं।
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प्रसिद्ध योग चिकित्सक और नृत्यांगना गीति शिराजी महाजन ने 15 साल तक भरतनाट्यम सीखने के बाद जब पहली बार अमेरिका में हठ योग की कक्षा में प्रवेश लिया तो उन्हें ऐसा लगा, मानो योग आसनों को तो वह हमेशा से करती रही हैं। वास्तव में, यह भरतनाट्यम की मुद्राओं की वजह से था। तब उनके मन में योग के बारे में अधिक जानने की जिज्ञासा पैदा हुई, जिसने उन्हें योग चिकित्सक बनने के लिए प्रेरित किया।

वास्वत में, योग और नृत्य में गहरा अंतर्संबंध है। दोनों की उत्पत्ति महादेव ने की है। ‘आदियोगी’ भी शिव हैं और नृत्य के राजा नटराज भी। वे लास्य (सृष्टि करने वाला कोमल नृत्य) और तांडव (विनाश करने वाला ऊर्जावान नृत्य) दोनों करते हैं। लास्य और तांडव को स्त्री और पुरुष ऊर्जा के रूप में समझा जाता है, जिसकी तुलना हठ योग में सूर्य (ह) और चंद्रमा (ठ) ऊर्जा से की जा सकती है। इसीलिए दोनों का लक्ष्य शारीरिक उत्थान के माध्यम से सर्वोच्च चेतना के साथ मिलन है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत के शास्त्रीय नृत्यों की जड़ें योग में हैं।

दिमागी कसरत अधिक, शारीरिक श्रम न के बराबर

आज के समय में दिन में आठ-नौ घंटे कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करने से दिमागी कसरत तो होती है, लेकिन शारीरिक श्रम न के बराबर होता है। पहले दफ्तर तक जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल शरीर से कुछ मेहनत करा लिया करता था, लेकिन अब आरामदायक गाड़ियों ने उसे भी छीन लिया है। घरों में भी अब चक्की से गेहूं नहीं पीसा जाता। चटनी पीसनी हो तो मिक्सर, जूस बनाना हो तो जूसर, मसाले कूटने हों तो ग्राइंडर और कपड़े धोने हों तो वॉशिंग मशीन, यानी हर तरह से शारीरिक मेहनत कम से कम होती जा रही है।

ऐसे में कामकाजी महिला-पुरुष हों या गृहिणियां, सभी का वजन बढ़ने लगता है और मोटापा अपने साथ कई बीमारियां लेकर आता है, जैसे कि शुगर, ब्लड प्रेशर आदि। वजन उनका मानसिक तनाव बढ़ा देता है और चिड़चिड़ेपन तथा लड़ने-झगड़ने का असर परिवार एवं बच्चों पर पड़ता है।

ऐसे में वजन कम करने और रोगों से बचने के लिए आप योग की शरण ले सकती हैं या फिर नृत्य-संगीत के जरिये भी मजेदार और रोचक ढंग से अधिक कैलोरी बर्न करके वजन कम कर सकती हैं। योग हो या नृत्य, ये आपके शरीर को लचीला बनाते हैं, जिससे मोटापा घटता है और स्टैमिना बढ़ता है। योग और संगीत आपके फेफड़ों तथा हृदय की सेहत में सुधार करते हैं एवं शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

अष्टांग योग और 108 नृत्य क्रियाएं

पतंजलि के योग में आठ अंग या चरण हैं, जिन्हें अष्टांग योग कहा गया है। भारतीय संगीत की नींव में नियमित अभ्यास या रियाज महत्वपूर्ण है और यह तभी संभव है, जब आप स्वयं नियमों का सख्ती से पालन करें, जैसे कि सेहत और हाइजीन। इसके बाद दूसरों के प्रति आपका व्यवहार, रवैया और फिर स्थान का सम्मान तथा समय का महत्व समझना।

अष्टांग योग के पहले दो चरण भी नैतिक मूल्य और नियम पालन पर जोर देते हैं। भरत मुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में नृत्य की 108 करण या क्रियाओं का उल्लेख है। नृत्य की क्रियाओं को मुद्राओं, हस्तक यानी हाथों की स्थिति और पाद भेद यानी पैरों की चाल के आधार पर परिभाषित किया गया है। यह विन्यास योग के समान है, जिसमें सांस की गति के साथ आसन लगाए जाते हैं। यह अष्टांग योग का तीसरा चरण है।

आम तौर पर एक नृत्य रचना आधा से एक घंटे तक चलती है। मंच पर 30 मिनट तक टिके रहने के लिए नर्तक को कम से कम 2-3 घंटे प्रतिदिन अभ्यास के साथ-साथ सहनशक्ति और ऊर्जा की जरूरत होती है। इसे प्राणायाम या चौथे चरण के अंतर्गत श्वास तकनीकों का अभ्यास करके प्राप्त किया जा सकता है।

पांचवां क्षणिक चरण है यानी प्रत्याहार या अहंकार से अलगाव। प्रत्याहार का अर्थ है- ‘वापस लेना’। इस अवस्था में नर्तक नृत्य में डूब जाता है और उसकी आध्यात्मिक यात्रा का बीजारोपण होता है। नर्तक पूरी तरह एकाग्र हो जाता है, जो अष्टांग योग का छठा चरण है।

फिर वह इस हद तक तल्लीन हो जाता है कि प्रदर्शन उसे ध्यान की तरह लगता है, जो अष्टांग योग का सातवां चरण है। ऐसा कहा जाता है कि मन की ऐसी विरक्त अवस्थाओं का अनुभव करने के उद्देश्य से नृत्य का प्रदर्शन करना आध्यात्मिक रूप से लाभकारी है और यही अष्टांग योग का आठवां चरण है, जहां योग को मन, शरीर और आत्मा का मिलन कहा गया है- ‘युज समाधौ’।
 
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कथक - फोटो : Instagram
साथ-साथ चलते हैं योग और संगीत

योग और संगीत, दोनों में प्रतिबद्धता तथा समर्पण की जरूरत होती है और यही समर्पण आपकी शारीरिक एवं मानसिक सेहत को बनाए रखता है। गाना सिखाने के लिए गुरु सबसे पहले षडज यानी ‘स’ स्वर को साधने का अभ्यास कराते हैं। योग में इसे श्वास क्रिया कहा गया है। गाते या कोई वाद्य यंत्र बजाते समय बैठने का एक खास तरीका होता है, जिसमें शारीरिक पुष्टता बहुत जरूरी है। योग में शरीर के अंगों की यह मजबूती आसनों से आती है। इसी तरह योग और नृत्य, दोनों को करते समय आप अपने सिर, गर्दन और रीढ़ को सीधा तथा संतुलित रखती हैं।

योगाचार्य स्वामी सत्यानंद सरस्वती के अनुसार, हाथ, सिर, आसन, ताला और पेरिनेल मुद्राओं का अभ्यास रोग के उपचार के लिए शरीर में ऊर्जा को उत्पन्न करता है। योग में मुद्राएं निजी यानी ध्यान अभ्यास के रूप में और नृत्य में सार्वजनिक यानी दूसरों के साथ संवाद करने के लिए उपयोग की जाती हैं।

ए योगा ऑफ इंडियन क्लासिकल डांस’ पुस्तक में रॉक्सेन कामायनी गुप्ता लिखती हैं, “नृत्य का प्राथमिक उद्देश्य रस को जगाना है, जिसे नाट्यशास्त्र में ‘स्वाद’, ‘सार’ या ‘उत्कृष्ट और आनंदमय सौंदर्य अनुभव’ के रूप में परिभाषित किया गया है।”

डॉ. गुप्ता योग में रस की तुलना समाधि से करती हैं, जिसे वह ‘पूर्ण तल्लीनता’ की चरम अवस्था के रूप में परिभाषित करती हैं। योग हो या नृत्य, दोनों में ही मुद्राएं आपके शरीर को सुगठित और मजबूत बनाने में मदद करती हैं। भरतनाट्यम नृत्यांगना रुक्मिणी विजयकुमार के अनुसार, योग कक्षा में जाने के बाद मेरा संतुलन अधिक नियंत्रित हो गया। मेरे पैरों को ऐसा लगा, जैसे वे खिंचाव के साथ एक इंच बढ़ गए हैं और मैं खुद को ऐसे आकार में मोड़ सकती थी, जो कुछ महीने पहले तक बहुत दूर की बात लगती थी।

म्यूजिक और डांस थेरेपी

मुंबई के 70 वर्षीय हरि पार्किंसन्स रोग से पीड़ित थे। उन्होंने डांस थेरेपी लेनी शुरू की। तबले की थाप सुनकर उनकी भुजाएं हवा में लहराने लगीं, उंगलियां कोमल मुद्राओं में मुड़ने लगीं और पैर ताल के साथ ताल मिलाने लगे। यह छोटी-सी सफलता उनके लिए बड़ी खुशी थी। दरअसल, पार्किंसन्स में मनोवैज्ञानिक बोझ अधिक भारी होता है। चिकित्सा उपचार में डोपामाइन प्रतिस्थापन दवाएं और डीप ब्रेन स्टिमुलेशन विधियां हैं, जिनमें भावनात्मक पहलुओं पर फोकस नहीं किया जाता।

इंडियन एसोसिएशन ऑफ डांस मूवमेंट थेरेपी की अध्यक्ष और ड्रामा थेरेपी इंडिया की संस्थापक अंशुमा क्षेत्रपाल के अनुसार, जब आप संगीत के साथ चलती हैं तो क्षतिग्रस्त सर्किट को बाइपास करती हैं और नए सर्किट को ट्रिगर करती हैं। डांस थेरेपी में लयबद्ध ताल डोपामाइन, एंडोर्फिन और सेरोटोनिन को बढ़ाती है, जिनकी पार्किंसन्स रोगियों में अक्सर कमी होती है। पार्किंसन्स भले ही पतन की बीमारी हो, लेकिन भारतीय नृत्य में विकास की कहानियां होती हैं। इसीलिए डांस थेरेपी से त्योहारों की खुशियां और बचपन की यादें वापस आती हैं, जो गहरे अर्थों में उपचार बन जाती हैं।

इसी तरह म्यूजिक थेरेपी मेटाबॉलिज्म को तेज करती है और मांसपेशियों की ऊर्जा बढ़ाती है। इटली के शासक बेनितो मुसोलिनी को जब नींद नहीं आई तो विख्यात भारतीय शास्त्रीय गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने एक राग के सुर छेड़ कर उसको अनिद्रा से मुक्ति दिलाई थी। इसलिए शरीर स्वस्थ रखना हो या वजन कम करना हो तो थोड़ा-सा योग कर लें या फिर थिरक लें और दिन भर काम करने के बाद थकान दूर करनी हो तो कुछ गुनगुना लें या मधुर संगीत सुन लें।

आसन, मुद्राएं और मधुर ध्वनि

वरिष्ठ कोरियोग्राफर डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा कहते हैं, मौजूदा जीवन-शैली में दिमागी कसरत तो बढ़ी है, शारीरिक श्रम न के बराबर हो गया है। ऐसे में योग तो सबसे उत्तम साधन है ही, लेकिन नृत्य भी शरीर को स्वस्थ रखने का एक रोचक तरीका हो सकता है और गाना या संगीत सुनना दिमाग को राहत पहुंचा सकता है। योग में मुद्राओं का उपयोग आंतरिक संचार के लिए किया जाता है और नृत्य में बाहरी संचार के लिए।

पंजाब के लोक नृत्य भांगड़ा में पूरे शरीर का व्यायाम होता है तथा गिद्दा में तालियां बजाने से हृदय गति सुचारू चलती है। हरियाणा के धमाल लोक नृत्य में रीढ़ की हड्डी की अच्छी कसरत होती है। महाराष्ट्र के कोली और लावणी लोक नृत्यों को अगर रोजाना एक घंटा किया जाए तो शरीर की हर मांसपेशी खुल जाती है। लावणी नृत्य में तो चेहरे पर भाव लाने के कारण आंखों और होंठों का भी व्यायाम हो जाता है।

असम के बिहू लोक नृत्य में हाथ-पैरों के साथ-साथ शरीर के ऊपरी हिस्से का उपयोग इस प्रकार किया जाता है कि शरीर में अकड़न-जकड़न, सुस्ती, दर्द आदि दूर होने लगते हैं। राजस्थान के लोक नृत्य घूमर और कालबेलिया में अनेक ऐसी शारीरिक भंगिमाएं मौजूद हैं, जो महिलाओं के सौंदर्य को बनाए रखती हैं, जैसे कि घूमना, पैरों को चलाना और कमर को मोड़कर सिर को जमीन पर लगाना आदि। भवई लोक नृत्य में सिर पर जलते दीये या घड़े रखकर नृत्य करने से दिमागी और शारीरिक संतुलन, दोनों का विकास होता है। इसलिए जरूरी है कि आप योग और नृत्य-संगीत को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
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