योग में शास्त्रीय नृत्य की भी बहुत-सी मुद्राएं हैं और भारतीय नृत्य की हर शैली में योग की क्रियाएं। इसीलिए डांस एक्सरसाइज का काम भी करता है और योग आपके मन को सुकून पहुंचाता है। स्वस्थ जीवनशैली के लिए हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि योग और संगीत को हम अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाएं।
मशहूर
शास्त्रीय नृत्यांगना मोलिना सिंह को बचपन से योग के आसन, क्रियाएं और मुद्राएं बहुत पसंद थीं। उन्होंने जब दिल्ली के कथक केंद्र में दाखिला लिया तो वहां पहले उन्हें ‘
निष्पंद भाव’ में बैठने को कहा गया। इसमें पैरों को फैलाकर, दीवार का सहारा लेकर, हाथों को जांघों पर रखकर निष्क्रिय रूप से किसी ध्वनि को सुनते हुए बैठना था। इस अवस्था से जब वह बाहर आईं तो पूरी तरह तरोताजा और नृत्य के लिए तैयार थीं।
प्रसिद्ध
योग चिकित्सक और नृत्यांगना गीति शिराजी महाजन ने 15 साल तक भरतनाट्यम सीखने के बाद जब पहली बार अमेरिका में हठ योग की कक्षा में प्रवेश लिया तो उन्हें ऐसा लगा, मानो योग आसनों को तो वह हमेशा से करती रही हैं। वास्तव में, यह भरतनाट्यम की मुद्राओं की वजह से था। तब उनके मन में योग के बारे में अधिक जानने की जिज्ञासा पैदा हुई, जिसने उन्हें योग चिकित्सक बनने के लिए प्रेरित किया।
वास्वत में, योग और नृत्य में गहरा अंतर्संबंध है। दोनों की उत्पत्ति महादेव ने की है।
‘आदियोगी’ भी शिव हैं और नृत्य के राजा नटराज भी। वे
लास्य (सृष्टि करने वाला कोमल नृत्य) और
तांडव (विनाश करने वाला ऊर्जावान नृत्य) दोनों करते हैं। लास्य और तांडव को स्त्री और पुरुष ऊर्जा के रूप में समझा जाता है, जिसकी तुलना
हठ योग में सूर्य (ह) और चंद्रमा (ठ) ऊर्जा से की जा सकती है। इसीलिए दोनों का लक्ष्य शारीरिक उत्थान के माध्यम से सर्वोच्च चेतना के साथ मिलन है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत के शास्त्रीय नृत्यों की जड़ें योग में हैं।
दिमागी कसरत अधिक, शारीरिक श्रम न के बराबर
आज के समय में दिन में आठ-नौ घंटे कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करने से दिमागी कसरत तो होती है, लेकिन शारीरिक श्रम न के बराबर होता है। पहले दफ्तर तक जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल शरीर से कुछ मेहनत करा लिया करता था, लेकिन अब आरामदायक गाड़ियों ने उसे भी छीन लिया है। घरों में भी अब चक्की से गेहूं नहीं पीसा जाता। चटनी पीसनी हो तो मिक्सर, जूस बनाना हो तो जूसर, मसाले कूटने हों तो ग्राइंडर और कपड़े धोने हों तो वॉशिंग मशीन, यानी हर तरह से शारीरिक मेहनत कम से कम होती जा रही है।
ऐसे में कामकाजी महिला-पुरुष हों या गृहिणियां, सभी का वजन बढ़ने लगता है और मोटापा अपने साथ कई बीमारियां लेकर आता है, जैसे कि शुगर, ब्लड प्रेशर आदि। वजन उनका मानसिक तनाव बढ़ा देता है और चिड़चिड़ेपन तथा लड़ने-झगड़ने का असर परिवार एवं बच्चों पर पड़ता है।
ऐसे में वजन कम करने और रोगों से बचने के लिए आप योग की शरण ले सकती हैं या फिर नृत्य-संगीत के जरिये भी मजेदार और रोचक ढंग से अधिक कैलोरी बर्न करके वजन कम कर सकती हैं। योग हो या नृत्य, ये आपके शरीर को लचीला बनाते हैं, जिससे मोटापा घटता है और स्टैमिना बढ़ता है। योग और संगीत आपके फेफड़ों तथा हृदय की सेहत में सुधार करते हैं एवं शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
अष्टांग योग और 108 नृत्य क्रियाएं
पतंजलि के योग में आठ अंग या चरण हैं, जिन्हें अष्टांग योग कहा गया है। भारतीय संगीत की नींव में नियमित अभ्यास या रियाज महत्वपूर्ण है और यह तभी संभव है, जब आप स्वयं नियमों का सख्ती से पालन करें, जैसे कि सेहत और हाइजीन। इसके बाद दूसरों के प्रति आपका व्यवहार, रवैया और फिर स्थान का सम्मान तथा समय का महत्व समझना।
अष्टांग योग के पहले दो चरण भी नैतिक मूल्य और नियम पालन पर जोर देते हैं। भरत मुनि के ‘
नाट्यशास्त्र’ में नृत्य की 108 करण या क्रियाओं का उल्लेख है। नृत्य की क्रियाओं को मुद्राओं, हस्तक यानी हाथों की स्थिति और पाद भेद यानी पैरों की चाल के आधार पर परिभाषित किया गया है। यह विन्यास योग के समान है, जिसमें सांस की गति के साथ आसन लगाए जाते हैं। यह अष्टांग योग का तीसरा चरण है।
आम तौर पर एक नृत्य रचना आधा से एक घंटे तक चलती है। मंच पर 30 मिनट तक टिके रहने के लिए नर्तक को कम से कम 2-3 घंटे प्रतिदिन अभ्यास के साथ-साथ सहनशक्ति और ऊर्जा की जरूरत होती है। इसे प्राणायाम या चौथे चरण के अंतर्गत श्वास तकनीकों का अभ्यास करके प्राप्त किया जा सकता है।
पांचवां क्षणिक चरण है यानी प्रत्याहार या अहंकार से अलगाव। प्रत्याहार का अर्थ है- ‘
वापस लेना’। इस अवस्था में नर्तक नृत्य में डूब जाता है और उसकी आध्यात्मिक यात्रा का बीजारोपण होता है। नर्तक पूरी तरह एकाग्र हो जाता है, जो अष्टांग योग का छठा चरण है।
फिर वह इस हद तक तल्लीन हो जाता है कि प्रदर्शन उसे ध्यान की तरह लगता है, जो अष्टांग योग का सातवां चरण है। ऐसा कहा जाता है कि मन की ऐसी विरक्त अवस्थाओं का अनुभव करने के उद्देश्य से नृत्य का प्रदर्शन करना आध्यात्मिक रूप से लाभकारी है और यही अष्टांग योग का आठवां चरण है, जहां योग को मन, शरीर और आत्मा का मिलन कहा गया है- ‘
युज समाधौ’।