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रोमांचित करती है रुद्रनाथ की यात्रा, स्वर्ग सा होता है एहसास

Sat, 25 Jul 2020 09:32 AM IST
योगेश जोशी उज्जवल जोशी
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कोरोना काल मे मै और मेरे साथी निकल पड़े बाबा रुद्रनाथ के दरबार को - फोटो : SELF
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कोरोना काल मे मै और मेरे साथी निकल पड़े बाबा रुद्रनाथ के दरबार को। रुद्रनाथ पंच केदार मे से एक है और ये ट्रैक केदार का सबसे कठिन ट्रैक माना जाता है। कई महीनों तक घर में रहने के बाद इस सफर पर जाने का जब प्रोग्राम बनाया तो सफर को लेकर एक अलग ही उत्साह पैदा हुआ। साफ शब्दों में कहूं तो बाबा केदार का बुलावा आया तो मन रोमांचित हो उठा...

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जहांं एक तरफ उत्साह था, वहीं दूसरी तरफ कोरोना संक्रमण का डर भी था। परंतु बाबा केदार का नाम लिया और यात्रा पर जाने का निर्णय कर ही लिया। अपनी पूरी तैयारी और लॉकडाउन के नियमों का पूरा पालन करते हुए हमारा सफर शुरू हुआ। हम सात लोग दिन में करीबन 1 बजे अल्मोड़ा से कार और बुलेट में सवार होकर भोले बाबा का नाम लेकर निकल पड़े बाबा रुद्रनाथ की यात्रा पर।

रात में आराम करने के बाद अगले दिन हम निकल पड़े सगर गांव की तरफ...

ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण से होते हुए हमने गढ़वाल में प्रवेश किया - फोटो : self
मौसम का आनंद लेते हुए ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण से होते हुए हमने गढ़वाल में प्रवेश किया ,जहां बैरियर में सभी के आधार कार्ड की जांच की गई और कुछ पूछताछ भी हुई। उसके बाद हमारा आगे का सफर शुरू होता है। अब हम गढ़वाल में थे, नीचे पिंडर नदी बह रही थी। करीबन 7 बजे हम कर्णप्रयाग पहुंचे जहां पिंडर और अलकनंदा का खूबसूरत संगम देखने को मिलता है।

यहां भोजन करने के बाद हम निकल पड़े गोपेश्वर जहां हमे रात गुजारनी थी। हाईवे का काम प्रगति मे था, जिस कारण हमें कई जगहों पर रुकना भी पड़ा। करीब 9:30 बजे हम गोपेश्वर पहुंचे। वहां पर होटल की बुकिंग हमने पहले ही करवा रखी थी। रात में आराम करने के बाद अगले दिन हम निकल पड़े सगर गांव की तरफ जो गोपेश्वर से करीब 2 किलोमिटर की दूरी में है। सगर में फारेस्ट डिपार्टमेंट द्वारा हमारी एंट्री करवाई गई।

अब हमें 25 किलोमिटर का ट्रैक करना था...

हमारा अगला लक्ष्य था पनार पहुंचना - फोटो : SELF
अब हमें 25 किलोमिटर का ट्रैक करना था। सभी में उत्साह था पर वो उत्साह  तीन किलोमिटर की यात्रा करने पर ही निकल गया था। थोड़ी देर बाद हम पुंग बुगयाल पहुंच चुके थे। अब आगे का सफर घने जंगलों से होकर गुजर रहा था, जिसमें पूरी चढ़ाई थी। अब धीरे-धीरे सभी साथियो की हालत खराब होने लगी थी।

हमारा अगला लक्ष्य था पनार पहुंचना, जहां के खूबसूरत नजारों के लिए हमारी आंखें बेसब्री से इंतजार कर रही थी। पूरी खड़ी चढ़ाई चलते चलते अब शरीर में जान नहीं बची थी।  पनार पहुंचने के बाद मानो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे हम स्वर्ग के द्वार पे पहुच गए हों। क्या खूबसूरत नजारा था। वो नजारा अभी भी मेरी आंखों में है। यहां पर हमारे एंट्री के पर्चों की जाच हुई। यहां स्पीकर व ड्रोन लेजाना बिल्कुल वर्जित था। पनार पर ₹50 के जुर्माने के साथ स्पीकर जमा हो रहे थे, लोग अपने स्पीकर वापसी में यहां से प्राप्त कर सकते थे।

सिर्फ एक दुकान वहां पर थी जहां 20 लोग रह सकते थे...

अगला पड़ाव था पित्रधार जहां से रुद्रनाथ करीब 6 किलोमिटर की दूरी पर है - फोटो : self
हमने सोच था अब पूरा रास्ता सीधा होगा पर हम गलत थे अभी भी चढ़ाई हमारा इंतजार कर रही थी। सप्ताह के आखरी दिन हम ये ट्रैक कर रहे थे। दूसरे शनिवार व रविवार की छुट्टी के चलते करीबन 300 लोग उस दिन रुद्रनाथ ट्रैक कर रहे थे। खूबसूरत बुग्यालों से होते हुए प्रकृति का आनंद लेते हुए हम आगे बड़ रहे थे।  

अगला पड़ाव था पित्रधार जहां से रुद्रनाथ करीब 6 किलोमिटर की दूरी पर है। अब यहां से रास्ता समतल था। चढ़ाई से हमें राहत मिल गयी थी। अब रास्ते में बुगयाल के साथ बुरांस के पेड़ भी थे। पंच गंगा होते हुए हम 7 बजे बाबा के दरबार में थे। वहां पहुंचते ही ऐसा लगा मानो स्वर्ग मे प्रवेश कर लिया हो। पर चिंता इस बात की थी आखिर हम अपनी रात कहा गुजारेंगे। सिर्फ एक दुकान वहां पर थी जहां 20 लोग रह सकते थे पर भीड़ इतनी ज्यादा थी की वो भी हाउसफुल था।
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खूबसूरत नजारों से भरा ये सफर हमेशा याद रहेगा...

सुबह जल्दी उठ कर बाबा के दर्शन करने के बाद हम वापस आ गए - फोटो : self
अब चिंता बढ़ने लगी। गौशाला जैसी कुछ धर्मशाला वहां मौजूद थी। करीब 8×9 की 6,7 धर्मशाला थी जहां सभी लोगो को रुकना था। एक धर्मशाला में 20 लोग रह रहे थे। सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ रही थी। पर मजबूरी थी रात गुजारने के लिए छत तो चाहिए थी।

सुबह जल्दी उठ कर बाबा के दर्शन करने के बाद हम वापस आ गए।

ये सफर काफी रोचक था। खूबसूरत नजारों से भरा ये सफर हमेशा याद रहेगा और जिस प्रकार हमने वहां रात गुजारी वो जिंदगी भर याद रहेगा। रुद्रनाथ पंच केदार मे से एक है। काफी लोग हर साल यहां दर्शन करने के लिए आते हैं। पर सरकार द्वारा कोई भी व्यवस्था वहां नहीं की गई है। जगह की महत्वपूर्णता व लोकप्रियता के चलते वहा सुविधाएं होनी चाहिए। ये देवों की भूमि है यहां जो आए वो बार-बार यहां आने की चाह रखता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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