पूना से कुछ दूरी पर बना है किला शनिवारवाड़ा। इस किले को बाजीराव पेशवा के समय में बनवाया गया था। पर्यटकों के खास आकर्षण का केंद्र यह किला मराठों की शान थी। लेकिन कहते हैं कि पूर्णिमा की रात को इस किले में नहीं आना चाहिए। आइए जानते है वो कौन सी ऐसी बात है जिसकी वजह से लोग ऐसा कहते हैं।
विज्ञापन
2 of 6
तबाह हो गया यह किला
इस प्राचीन किले की खासियत इसकी ईंटों और पत्थरों से बनी शिल्पकारी है। किले को अंग्रेजों ने तोप से उड़ा दिया था। इस हमले के बाद केवल पत्थर वाला हिस्सा ही बचा हुआ है।
विज्ञापन
3 of 6
नारायन राव को विरासत में मिला था ये किला
बाजीराव की मौत के बाद ये किला उनके पुत्र नाना साहब को विरासत में मिल गया। नाना साहब के तीन पुत्र थे- माधव राव, विश्वास राव और नारायन राव। नाना साहब की मौत के बाद उनके बड़े पुत्र माधव राव को गद्दी पर बैठाया गया। माधव राव के अन्य भाइयों की भी युद्ध में मौत हो गई। माधव राव अपने भाइयों की मौत का दुख नहीं सह पाएं और मर गए।
4 of 6
- फोटो : Pixabay.com
नारायन राव को बनाया गया उत्तराधिकारी
नारायन राव को बहुत कम उम्र में पेशवा बना दिया गया। इतनी कम उम्र में पेशवा की जिम्मेदारी को संभालने के बाद उनके चाचा ने साजिश रचकर नारायन राव को मौत के घाट उतार दिया। और उसकी लाश के टूकड़े करके नदी में प्रवाहित कर दिए।
विज्ञापन
5 of 6
- फोटो : pixabay.com
नारायन राव का भूत
स्थानीय लोगों के अनुसार इस किले में आत्माओं के भटकने की बात कही जाती हैं, जिन्होने जान गंवायी हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि शाम के 6:30 बजे के बाद यहां पर आने से नारायन राव की रोने की आवाजें सुनाई देती हैं। ये आवाजें पूर्णिमा की रात में ज्यादा आती है।
सही या गलत
आपको विश्वास हो या नहीं, लेकिन इस किले की दर्दनाक कहानी लोगों के रोंगटे खड़े करने के लिए पर्याप्त है। अगर आपको भी इस कहानी को सुनकर रोमांच का अनुभव हो रहा हो तो एक बार शनिवारवाड़ा किले को घूमने जरूर जाएं।