उत्तराखंड स्थित केदारनाथ में भगवान शिव कण-कण में विराजते हैं। यह पवित्र धार्मिक स्थल है जहां लाखों-करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु भगवान आशुतोष के दर्शन और पूजा-पाठ के लिए पहुंच रहे हैं। केदारनाथ के कपाट इसी महीने खुले हैं और अक्टूबर के बाद बंद हो जाएंगे। दिल्ली से केदारनाथ की दूरी महज 295 किलोमीटर है। अगर आप केदारनाथ की यात्रा पर जा रहे हैं तो हम आपको केदारनाथ से जुड़ी धार्मिक मान्यता, केदारनाथ के साथ ही पंच केदार कौन- से हैं और यहां कैसे पहुंचे इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। ताकि आप यहां पहुंचकर प्रकृति के अनुपम सौंदर्य का लुत्फ उठाने के साथ ही भगवान शिव के विभिन्न विग्रहों की पूजा भी कर सकें।
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केदारनाथ
देश में भगवान शिव के कई मंदिर हैं। लेकिन केदारनाथ का धार्मिक महत्व सर्वोपरी है। धर्मशास्त्रों में केदारनाथ का बेहद ही महात्म्य बताया गया है। केदारनाथ के दर्शन से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। भगवान शिव की इस स्थली का धार्मिक महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। यह धार्मिक स्थल हिमालय की गोद में बसा है। केदारनाथ के अलावा यहां चार और केदार हैं जहां भगवान शिव विभिन्न रूपों में विराजमान हैं। आइए पहले पंच केदार के बारे में विस्तार से जानते हैं...
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केदारनाथ
- फोटो : अमर उजाला
केदारनाथ को बारहवें ज्योर्तिलिंग के रूप में जाना जाता है। पंच केदार में प्रथम भगवान केदारनाथ हैं। द्वितीय केदार मद्महेश्वर हैं। तृतीय केदार तुंगनाथ हैं। चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ और पंचम केदार कल्पेश्वर हैं। कहा जाता है कि महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। वेदव्यास के कहने पर पांडव सगोत्र बंधु-बांधव की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए केदारनाथ तप करने आए। लेकिन भगवान शिव पांडवों से नाराज थे और उन्हें दर्शन देना नहीं चाहते थे।
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केदारनाथ मंदिर
भगवान शिव ने पांडवों से बचने के लिए बैल का रूप धारण कर लिया। भीम ने भगवान शिव को पहचान लिया। शिव अन्य पशुओं के बीच बैल रूप में मौजूद थे। भीम ने भगवान शिव को अन्य पशुओं के बीच उनके वास्तविक स्वरूप में पहचानने के लिए विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों के बीच पैर फैला लिए। बाकी पशु भीम के पैर के नीचे से निकल गए लेकिन बैल के रूप में मौजूद शिव ने ऐसा नहीं किया। यह देख भगवान शिव बैल रूप में ही धरती में अंतरध्यान होने लगे लेकिन भीम ने उनके आधे हिस्से को पकड़ लिया। इस तरह पांडव भगवान शिव के दर्शन पाकर संगोत्र भाईयों और मित्र-बांधवों की हत्या के पाप से मुक्त हुए। तभी से केदारनाथ में भगवान शिव बैल की पीठ की आकृति के शिला स्वरूप में मौजूद हैं और पूजे जाते हैं।
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ऊखीमठ से केदारपुरी जाती डोली (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
मद्महेश्वर मंदिर
यहां भगवान शिव मध्य भाग में विराजमान हैं। समुद्र तल से 12 हजार से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित मद्महेश्वर के कपाल भी शीतकाल के लिए छह महीने तक बंद रहते हैं। यहां की नैसर्गिक सुंदरता आपका मन मोह लेगी। अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं तो द्वितीय केदार मद्महेश्वर भी जरूर जाएं।
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केदारनाथ मंदिर
तुंगनाथ मंदिर
भगवान शिव का यह मंदिर सबसे ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है। तुंगनाथ समुद्र तल से 3680 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां भगवान शिव की भूजा के रूप में पूजा होती है। केदारनाथ जा रहे हैं तो तुंगनाथ भी जरूर जाएं।
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केदारनाथ मंदिर
रुद्रनाथ मंदिर
रूद्रनाथ भगवान शिव का चौथा मंदिर है। यह मंदिर गुफा में स्थित है जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से 2286 मीटर है। यहां भगवान शिव के चेहरे के दर्शन होते हैं। शिव यहां मुखर विंद रूप में विराजमान हैं। अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं तो रूद्रनाथ मंदिर जरूर जाएं।
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kedarnath, snowfall
- फोटो : अमर उजाला
कल्पेश्वर मंदिर
कल्पेश्वर मंदिर पंचम केदार के रूप में प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव जटा रूप में विराजमान हैं। यहां आप बारहों महीने भगवान शिव के दर्शन कर सकते हैं। कल्पेश्वर मंदिर समुद्र तल से 2134 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं तो कल्पेश्वर जाकर भगवान शिव के जटारूप के दर्शन जरूर करें। अगली स्लाइड में पढ़े कैसे पहुंचे केदारनाथ
दिल्ली से केदारनाथ की दूरी- 295 किलोमीटर कब जाएं- मई से अक्टूबर के बीच कैसे पहुंचे- बस, गाड़ी, कार और टैक्सी
आप अगर दिल्ली से केदारनाथ जा रहे हैं और बस से सफर करना चाहते हैं तो आपको आनंद विहार बस अड्डे से सीधे बस मिलेगी। आप हवाई जहाज से केदारनाथ की यात्रा करना चाहते हैं तो नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून है। अगर ट्रेन से यात्रा करना चाहते हैं तो नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार है। हरिद्वार के आगे आपको बस या टैक्सी से जाना होगा।