स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय
कोलकाता में जन्मे नरेंद्र नाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद) ने प्रारंभिक शिक्षा ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन से प्राप्त की। बाद में प्रेसीडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से शिक्षा पूरी की। वे एक अत्यंत मेधावी छात्र थे और पढ़ाई के साथ-साथ संगीत, खेलकूद और अन्य कलाओं में भी रुचि रखते थे।
रामकृष्ण परमहंस से मिलन
नरेन्द्रनाथ की आध्यात्मिक खोज ने उन्हें रामकृष्ण परमहंस के पास लाया। रामकृष्ण परमहंस के साथ उनकी पहली मुलाकात 1881 में हुई। रामकृष्ण परमहंस ने नरेन्द्रनाथ को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया और उन्हें आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया।
संन्यास और नया नाम
1886 में रामकृष्ण परमहंस के निधन के बाद, नरेन्द्रनाथ ने संन्यास ले लिया। संन्यासी नरेंद्रनाथ ने अपना नाम बदलकर स्वामी विवेकानंद रख लिया। इसके बाद उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की और भारतीय समाज की दशा को देखा और समझा।
शिकागो धर्म महासभा (1893)
स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत का प्रतिनिधित्व किया। यहां उनके भाषण ने पश्चिमी देशों में भारतीय संस्कृति और वेदांत दर्शन की महत्ता को उजागर किया। उनके भाषण की शुरुआत "अमेरिका के भाइयों और बहनों" के संबोधन से हुई, जिसने सबका दिल जीत लिया। दो मिनट तक धर्म संसद तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।
रामकृष्ण मिशन की स्थापना
1897 में स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस को समर्पित रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सेवा, शिक्षा और आध्यात्मिकता के माध्यम से समाज की सेवा करना था। इस मिशन ने कई अस्पताल, विद्यालय और सामाजिक सेवा के कार्य शुरू किए। इसके अलावा उन्होंने बारानगोर मठ की स्थापना की थी, जो बाद में रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय बना। इस मठ का उद्देश्य था धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक कार्यों को समर्थन देना।
लेखन और शिक्षाएं
स्वामी विवेकानंद ने कई पुस्तकें और लेख लिखे, जिनमें "राजयोग," "ज्ञानयोग," "कर्मयोग," और "भक्तियोग" प्रमुख हैं। उनकी शिक्षाएं आत्म-ज्ञान, स्वावलंबन, और मानवता की सेवा पर आधारित थीं।
स्वामी विवेकानंद का निधन
स्वामी विवेकानंद का निधन 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में हुआ। वे केवल 39 वर्ष के थे, लेकिन उनके जीवन और कार्यों का प्रभाव आज भी व्यापक रूप से महसूस किया जाता है।