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छोटे बच्चों की रिसर्च में बड़ा खुलासा, बेबी लैब में सिखाए जा रहे हैं वो इशारे जो बहुत कुछ कहते हैं

Fri, 13 Apr 2018 09:08 AM IST
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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छोटे बच्चों की अपनी दुनिया होती है। अपना गुस्सा, खुशी, दुख तकलीफ बताने का उनका अपना तरीका होता है। उनके कुछ इशारे तो हम समझ लेते हैं और उनकी कैफियत का अंदाजा लगा लेते हैं।लेकिन ये अंदाजे हमेशा सटीक नहीं बैठते। नतीजा ये कि बच्चों का रोना और तेज हो जाता है। वो बार-बार गुस्सा करने लगते हैं। अक्सर बच्चों की जिद, फरमाइशें और रोना-धोना सुनकर हम सोचते हैं कि काश हम इन बच्चों की अनकही बातें समझ पाते। अब साइंस आपकी मदद करने की कोशिश कर रही है, ताकि आप अपने बच्चों की बातों और इशारों को अच्छे से समझ सकें। कई देशों में बच्चों का मिजाज समझने के लिए बेबी लैब खुल गई हैं। जहां उन बच्चों पर रिसर्च की जा रही है, जिन्होंने बोलना नहीं सीखा है। जो सिर्फ़ रोना, हंसना या इशारे करना जानते हैं।

ब्रिटेन के ब्रिकबेक कॉलेज में भी ऐसी ही एक बेबी लैब चल रही है। जहां पर बच्चों का मिजाज समझने के लिए एक खास किस्म की तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। 'फंक्शनल नियर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी'। इसे एफ.एन.आर.एस के नाम से भी जाना जाता है। इस तकनीक के जरिए ये पता लगाने की कोशिश हो रही है कि जब बच्चा किसी चीज को देखता है, तो उसका दिमाग कैसे काम करता है। इस तकनीक की मदद से बच्चों के लिए एक कैप तैयार की गयी है, जिसमें कई तरह के उपकरण और लाइट्स लगी हैं। देखने में ये कैप स्विमिंग कैप की तरह लगती है।

तजुर्बे के दौरान ये कैप बच्चे को पहना दी जाती है। इसमें लगी लाइट्स की तरंगें हड्डियों के जरिए से बच्चे के दिमाग में जाती हैं और बच्चे के खून में घुल जाती हैं। कैप का डिजाइन बच्चे के आराम को जहन में रखकर तैयार किया गया है। इसे पहनने से बच्चे को तकलीफ नहीं होती।

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बच्चों के सोचने का न्यूरल कनेक्शन

बच्चों की अनजानी दुनिया के रहस्य जानने के लिए लंबे समय से कई तरह की रिसर्च की जा रही हैं। यहां तक की चार्ल्स डार्विन भी इंसानी विकास की थ्योरी पर काम करने की प्रेरणा का स्रोत वो अपने बेटे को मानते थे, जो उस वक़्त महज महज 66 दिन का था। डार्विन ने अपने बच्चे की हर हरकत को नोट करना शुरू कर दिया। बाद में डार्विन ने इसे 'डायरी ऑफ ऑब्जर्वेशन' नाम की किताब की शक्ल में छपवाया भी।

हालांकि ये किताब बच्चों के जहन को समझने के लिए बहुत मददगार नहीं है, क्योंकि इसमें कई ऐसी बातें हैं, जो बहुत से बच्चों के बर्ताव पर सही नहीं बैठतीं। लेकिन इस किताब ने बच्चों के जहन के काम करने के तरीके पर रिसर्च का रास्ता हमवार किया। हरेक रिसर्च एक कदम आगे बेहतरी की ओर बढ़ी। हालांकि अभी तक कोई भी रिसर्च आखिरी पड़ाव पर पहुंचने का दावा करने वाली साबित नहीं हुई है।

मिसाल के लिए उन्नीसवीं और बीसवीं सदी तक वैज्ञानिक यही मानते थे कि बच्चों को जज़्बाती तकलीफ नहीं होती। क्योंकि उनका जहन इतना विकसित नहीं होता कि वो इसे महसूस कर सकें।जबकि मॉडर्न रिसर्च बताती हैं कि बच्चे बहुत समझदार, संवेदनशील और भावुक होते हैं।

रिसर्च से मां-बाप का रोल कम हो जाएगा?

रिसर्च के अनुसार बच्चे के दिमाग में हर सेकेंड में दस लाख से भी ज़्यादा नए न्यूरल कनेक्शन बनते रहते हैं। यानी बच्चे का दिमाग हर समय व्यस्त रहता है। लेकिन व्यस्त दिमाग का ये हिस्सा छिपा रहता है। बच्चे के दिमाग के काम का तरीका फ़िलॉसफ़ी और साइंस का मिक्सचर है। साल 2000 की शुरुआत में बच्चों की आंख की पुतली घूमने पर रिसर्च की गई। इस रिसर्च से पता चला कि बच्चों का दिमाग समझने के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। उनकी सोच आसनी से नहीं समझी जा सकती।

बच्चे जिस वक्त खामोशी से कोई बात सुन रहे होते हैं, उस वक़्त भी उनका दिमाग लगातार काम करता रहता है। खास तौर से कान के पीछे वाला हिस्सा उस समय सबसे ज़्यादा सक्रिय हो जाता है। दिमाग के इस हिस्से को 'सोशल ब्रेन' कहते हैं। वयस्कों में दिमाग के इस हिस्से पर सबसे ज़्यादा रिसर्च की गई है लेकिन बच्चों को लेकर वैज्ञानिकों को अभी कामयाबी नहीं मिली है। 

रिसर्चर ये जानने का भी प्रयास कर रहे हैं कि हर बच्चे में दिमाग का विकास एक जैसा क्यों नहीं होता। अपने माहौल से वो कौन सी चीजें सबसे पहले सीखते हैं। वो ये कैसे तय करते हैं कि कौन सी चीज उन्हें कब और क्यों जाहिर करनी है। जानकार कहते हैं कि बच्चे अपने आस-पास के माहौल से सबसे ज़्यादा सीखते हैं। लेकिन उनके आसपास के लोग कब कैसा व्यवहार करेंगे कहना मुश्किल है। इससे बच्चों के सीखने के अमल पर भी बुरा असर पड़ता है।

रिसर्चर अपनी रिसर्च के दौरान बच्चों के मां-बाप को बहुत सी हिदायतें देते हैं पर, उससे भी बहुत मदद नहीं मिल पाती। इसीलिए ऐसी तकनीक और उपकरण बनाने पर काम चल रहा है जिसकी मदद से रिसर्च में आसानी हो और बच्चे पर की जा रही रिसर्च में मां-बाप का रोल कमतर हो जाए।

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चार से छह महीने तक ऑटिज़्म का डर

रिसर्च बताती हैं कि पैदा होने के एक दिन बाद ही बच्चे का सोशल दिमाग काम करना शुरू कर देता है और चार से छह महीने के बच्चे में ऑटिज़्म की बीमारी होने डर ज़्यादा होता है। हालांकि जब तक बच्चे दो या तीन साल के नहीं हो जाते, कह पाना मुश्किल होता है कि वो ऑटिज़्म का शिकार हैं या नहीं। क्योंकि इस उम्र के बाद ही उनके बर्ताव से इशारे मिलने शुरू होते हैं कि वो दूसरे बच्चों से अलग क्यों हैं। बच्चों का दिमाग समझने के लिए एमआरआई स्कैनर का भी सहारा लिया जाता है। लेकिन एनआईआरएस ज़्यादा बेहतर और सस्ती तकनीक है। सस्ती होने की वजह से गरीब देशों में भी रिसर्च के लिए इस तकनीक का सहारा लिया जा सकता है।

नआईआरएस उपकरण के जरिए अफ्रीका के गैम्बिया जैसे देशों ने भी इस क्षेत्र में रिसर्च शुरू कर दी है। ज़्यादा देशों में रिसर्च होने की वजह से नतीजे भी बेहतर हो सकते हैं और बड़े पैमाने पर रिसर्च की जा सकती है। एनआईआरएस उपकरण बनने से पहले रिसर्च का दायरा बहुत सीमित था क्योंकि हरेक देश रिसर्च का खर्च नहीं उठा सकता।

बच्चों में होने वाला कुपोषण भी अब रिसर्च का हिस्सा बन चुका है। एनआईआरएस से होने वाली रिसर्च से ही पता चला है कि गैम्बिया के बच्चों के दिमाग का विकास कम और धीमी गति से हो रहा है क्योंकि, इस देश में बच्चे बहुत बुरी तरह कुपोषण का शिकार हैं।तसल्लीबख़्श नतीजे हासिल करने के लिए अब रिसर्चर टॉडलर लैब बनाने की बात कर रहे हैं। इसमें वर्चुअल रियलिटी केव होंगी। उम्मीद की जा रही है इस वर्चुअल लैब से बेहतर नतीजे सामने आएंगे और हम बच्चों के बारे में अपनी समझ बेहतर कर सकेंगे।

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