प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : pxhere
मैं भी उन लड़कों की नजर में 'खूबसूरत' बनना चाहती थी। उसके लिए हर महीने 'वैक्सिंग' का दर्द, पॉकेट मनी में से उसके लिए निकलता खर्च, और अपने बदन की नुमाइश सब मंजूर थी। क्लास के लड़कों की आंखों के अलावा और भी बहुत सारी नजरों में मैं 'खूबसूरत' बन रही थी। टीवी, फिल्मों और मैगजीनों में को देखते हुए मैं खुद को उन 'खूबसूरत' औरतों के नजदीक पा रही थी जो मर्दों की पसंद थीं। बाजार की नजर इतनी अहम कैसे होती चली जाती है? जो कुदरती है उसे बदलने की ऐसी जिद क्यों? बगलों में बाल तो मर्दों के भी होते हैं, टांगों पर भी होते हैं, पर उन्हें बदसूरत क्यों नहीं मानते हम?