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मर्दों की आंखों से ही क्यों तय होती है औरतों की खूबसूरती?

Tue, 10 Dec 2019 05:48 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मैं ग्यारहवीं क्लास में थी। ये वो वक्त था जब मां से बहुत झगड़ा करने के बाद मुझे 'वैक्सिंग' करवाने की इजाजत मिली थी। यूनीफॉर्म में स्कर्ट की तुरपाई कर उसे छोटा किया था और बस स्टॉप पर पहुंचते ही जुराबों को मोड़ कर एड़ी के पास उसका गुच्छा बनाने लगी थी। मां ने बहुत समझाया था कि चिकनी देह ही सुंदर हो ये जरूरी नहीं। ये भी कहा था कि लड़के मेरे मन की सुंदरता को जानकर दोस्ती करें तभी उसे निभाएंगे। पर मां की आवाज से ऊंची और साफ उन लड़कों की नजरों में छिपी तारीफ थी जो मैं रोज स्कूल में देखती थी। ये तारीफ उन्हीं लड़कियों के लिए थी जो मां से लड़कर जीत चुकी थीं। चिकने बदन और छोटी स्कर्ट वाली 'खूबसूरत' लड़कियां'। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pxhere
मैं भी उन लड़कों की नजर में 'खूबसूरत' बनना चाहती थी। उसके लिए हर महीने 'वैक्सिंग' का दर्द, पॉकेट मनी में से उसके लिए निकलता खर्च, और अपने बदन की नुमाइश सब मंजूर थी। क्लास के लड़कों की आंखों के अलावा और भी बहुत सारी नजरों में मैं 'खूबसूरत' बन रही थी। टीवी, फिल्मों और मैगजीनों में को देखते हुए मैं खुद को उन 'खूबसूरत' औरतों के नजदीक पा रही थी जो मर्दों की पसंद थीं। बाजार की नजर इतनी अहम कैसे होती चली जाती है? जो कुदरती है उसे बदलने की ऐसी जिद क्यों? बगलों में बाल तो मर्दों के भी होते हैं, टांगों पर भी होते हैं, पर उन्हें बदसूरत क्यों नहीं मानते हम?
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
'द ऐटलांटिक' पत्रिका में छपे एक लेख में बताया गया है कि अमेरिका की 99 फीसदी औरतें अपनी देह से बाल उतरवाती हैं। 'वैक्सिंग' के अलावा रेजर का इस्तेमाल भी आम हो चला है। सोचिए अगर रेजर बनाने वाली कंपनियां औरतों के लिए खास रेजर ना बनातीं तो ये कैसे होता?

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
अब तो पार्लर जाऊं तो पूछते हैं, 'आपकी शादी हो गई है तो 'बिकिनी वैक्स' नहीं करवाएंगी क्या'? दर्द की कोई सीमा होनी चाहिए ना। और ये सारा दर्द हमारे हिस्से क्यों? क्यों मर्दों को छोटी बांह के कपड़े या कम लंबाई के शॉर्ट्स पहनने से पहले सोचना नहीं पड़ता? वो तो किसी की नजर में बदसूरत नहीं हो जाते। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
'एजंट्स ऑफ इश्क' नाम की एक वेबसाइट पर एक और लेख पढ़ा जिसमें 'देखे जाने और जज किए जाने के डर और उससे खिलाफ विद्रोह करने की मुश्किल' के बारे में लिखा है। ऐसा बहुत पढ़ लिया अब। मंटो की कहानी 'बू' पढ़े भी बहुत वक्त हो गया। देह की बदबू और खुशबू के बारीक फर्क की समझ बन गई है। पर अब भी बाजार और नजरों के खेल से हार ही रही हूं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
मेरी जिंदगी में मेरे मन की सुंदरता समझने वाले मर्द ही मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं पर अब भी बाकि गैर-जरूरी आंखों में अपनी 'खूबसूरती' की तारीफ को कुछ अहमियत तो देती हूं। चिकनी देह की खूबसूरती का जाल मैंने बुना तो नहीं पर हर कुछ हफ्तों में उसमें फंसकर पार्लर चली ही जाती हूं। सोचती रहती हूं कि कैसे टूटेगा ये चक्रव्यूह?
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