महिलाओं की सच्ची कहानियां
वीरासनी लिखती हैं कि "यह साबित होता है कि कमी हमेशा महिलाओं में नहीं होती, कमी पुरुषों में भी होती है और समाज को अपने गलत नजरिए का चश्मा उतारने की जरूरत है।" हमारी कहानियां सच्ची हैं पर औरतों की पहचान गुप्त रखी गई है क्योंकि डर है कि समाज और जानने वालों की तरफ से न जाने कैसी प्रतिक्रिया आए पर इन गुमनाम कहानियों को पढ़नेवाली औरतें बेबाकी से लिख रही हैं।
पूनम कुमारी गुप्ता बड़ी साफगोई से अपनी बात कहती हैं। उनका कहना है कि "लोग कितना बदलेंगे ये तो पता नहीं, पर शायद औरतों की खुद की कुढ़न ही कम हो जाए।"ये कहानियां दुख और शिकायत की नहीं हैं।सामाजिक दबाव, पारिवारिक दायरों और औरत होने के नाते तय भूमिकाओं को तोड़कर अपने मन को सुनने की हैं इसीलिए इन्हें पढ़कर किसी की कुढ़न कम हो रही है तो किसी को जिंदगी अलग तरीके से जीने का हौसला मिल रहा है।