रक्षाबंधन के बारे में आपने अभी तक अपने बच्चों को यही बताया-समझाया होगा कि इस दिन बहन राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन हमारे समाज में ऐसी बहनों की भी कमी नहीं है, जो रक्षासूत्र तो बांधती हैं, लेकिन भाई से रक्षा का वचन नहीं लेतीं, बल्कि उसकी संरक्षक बन जाती हैं। वे न केवल अपने भाइयों के लिए प्रेरणा हैं, बल्कि समाज और दुनिया में बदलाव ला रही हैं। उन्होंने अपनी उपलब्धियों और नेतृत्व क्षमता के माध्यम से रक्षाबंधन के पर्व को नए अर्थ दिए हैं। यह विचार पारंपरिक राखी के वादे (भाई द्वारा रक्षा) को उलटकर बहनों की शक्ति और आत्मनिर्भरता को सामने लाता है। आज समाज में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जहां बहन ने भाई की पूरी परवरिश तक की है। ऐसी ही कुछ बहनों की कहानियां उन्हीं की जुबानी-
रिश्तों की गहराई, शब्दों से परे है - मुक्ति और नृदोस कीरो
मैं ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले की रहने वाली हूं। मेरे माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और मां अक्सर बीमार रहती हैं। हम पांच भाई-बहन थे, जिनमें मैं सबसे बड़ी हूं। साल 2010 में आर्थिक स्थिति कमजोर होने और सही इलाज न मिल पाने की वजह से मैंने अपने छोटे भाई पवन को खो दिया। हमारी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि मेरे माता-पिता हम बच्चों की पढ़ाई का खर्च तक नहीं उठा सकते थे, जिस कारण मैं अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी। मगर उसी दिन मैंने सोच लिया कि मैं बेशक पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी, लेकिन अपने बहन-भाइयों की पढ़ाई जरूर पूरी करवाऊंगी। इसलिए मैंने सपनों को त्याग कर अपने परिवार का सहारा बनने का फैसला किया।
2008 में मैं सेंट एंटनी स्कूल में खाना बनाने का काम करने लगी। वहां से जो भी कमाई होती, उसी से अपने माता-पिता और भाई-बहनों का खर्च उठाती। इस बीच नाते-रिश्तेदारों और समाज के लोगों ने मेरे ऊपर शादी करने का दबाव भी बनाया, लेकिन मेरे लिए भाई-बहन की पढ़ाई सबसे जरूरी थी, इसलिए मैंने शादी नहीं की। मेरी सोच यह थी कि जब भाई-बहनों का भविष्य किसी बहन का सपना बन जाए तो रिश्तों की गहराई शब्दों से परे हो जाती है। आज छोटी बहन मगन स्नातक कर रही है और छोटा भाई नृदोस कीरो हाई स्कूल में पढ़ रहा है। वह भविष्य में भारतीय हॉकी टीम के लिए खेलना चाहता है। हाल ही में मैंने भी अपनी अधूरी पढ़ाई फिर से शुरू की है और कक्षा 10 की परीक्षा पास कर ली है।
खुश हूं, भाई मेरे साथ है - अंशिका और शैलेन्द्र कैथवास
मैं प्रयागराज की रहने वाली हूं और एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार से संबंध रखती हूं। मेरे पिता एक छोटी-सी दुकान चलाते हैं और मां गृहिणी हैं। बचपन से ही मुझे खेलों में दिलचस्पी थी, खासकर फुटबॉल में। स्कूली दिनों में फुटबॉल खेलना शुरू किया और कड़ी मेहनत से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची। मैंने पटियाला विश्वविद्यालय से बीएड किया और संतोष ट्रॉफी जैसे बड़े टूर्नामेंटों में भी हिस्सा लिया। हालांकि मेरी जिंदगी में सबसे बड़ा मुकाबला मैदान पर नहीं, बल्कि अपने परिवार में आया। मेरे बड़े भाई शैलेन्द्र को लिवर सिरोसिस नामक गंभीर बीमारी हो गई। जब तक बीमारी का पता चला, तब तक हालत बहुत बिगड़ चुकी थी। डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपाय है। हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि आसानी से इलाज करवा पाते, लेकिन परिवार ने हिम्मत नहीं हारी।
प्रधानमंत्री राहत कोष से सहायता मिली और कुछ लोन भी लिया गया, जिससे इलाज की राशि किसी तरह जुटाई गई। लेकिन असली चुनौती थी, लिवर डोनर मिलना। जब परिवार में किसी का ब्लड ग्रुप मैच नहीं हुआ तो मैंने अपना लिवर देने का फैसला किया। जून 2023 में लखनऊ के अस्पताल में भाई का सफल ट्रांसप्लांट हुआ। सर्जरी के बाद मैंने कुछ महीनों तक खुद को रिकवर किया। आज मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं और दोबारा फुटबॉल में वापसी की तैयारी कर रही हूं। मेरे लिए भाई की जान सबसे जरूरी थी। खेल में ब्रेक लिया जा सकता है, लेकिन अगर अपनों की जिंदगी दांव पर हो तो कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। आज भी जब मैं मैदान में उतरती हूं तो मुझे सुकून मिलता है कि मेरा भाई मेरे साथ है।
लोगों ने भाई के लिए मेरा दर्द समझा- अनुष्का और सौरभ पेंडुरकर
मैं मुंबई की रहने वाली हूं और मैंने पब्लिक रिलेशन्स में अपना करियर बनाया। मेरे परिवार में पापा की एक छोटी-सी किराने की दुकान है, मां एक अंशकालिक शिक्षिका हैं और मेरा बड़ा भाई सौरभ पेंडुरकर एक कॉल सेंटर में नौकरी करता है। हमारा एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार है, सपनों से भरे, लेकिन सीमित संसाधनों वाले। 23 फरवरी, 2018 की सुबह भी हर दिन की तरह थी। भाई रोज की तरह लोकल ट्रेन से ऑफिस के लिए निकला, लेकिन उस दिन किस्मत ने करवट ले ली। भीड़-भाड़ से भरी ट्रेन में एक सहयात्री के अचानक धक्के से सौरभ बांद्रा स्टेशन के पास चलती ट्रेन से नीचे गिर गया और रेल पटरी पर बेहोश पड़ा रहा। कुछ यात्रियों ने इन्सानियत दिखाई और उसे पास के अस्पताल पहुंचाया। वहां डॉक्टरों ने बताया कि उसकी हालत बेहद गंभीर है। उसे तुरंत न्यूरोसर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी और कई बड़े इलाज की जरूरत थी। कुल अनुमानित खर्च 25 लाख रुपये था। हमारे लिए यह आंकड़ा पहाड़ जैसा था। मां-पापा टूट चुके थे, मैं भी गहरी निराशा में थी। लेकिन तभी उम्मीद की एक किरण दिखाई दी।
मैंने क्राउडफंडिंग का सहारा लेने का फैसला किया। फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मैंने मदद की अपील की। भाई की कहानी को जितने लोगों तक पहुंचा सकती थी, मैंने पहुंचाया। धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। कई अनजान लोगों ने भी दिल खोलकर मदद की। 407 दानदाताओं की मदद से मैं 11 लाख रुपये जुटाने में कामयाब रही। वह पल मेरे लिए भावनात्मक रूप से बेहद खास था, जब अजनबियों ने भी हमारा दर्द समझा और हमारी मदद की। आज सौरभ चल-फिर सकता है, बोल सकता है और ठीक हो रहा है। ये सब उन दयालु लोगों की वजह से संभव हुआ, जिन्होंने हमें टूटने नहीं दिया। मुझे इस सफर ने सिखाया कि जब आप हार मानने ही वाले हों, तभी कोई न कोई हाथ थामने के लिए आगे आता है और यही इन्सानियत की सबसे सुंदर तस्वीर है।
अपनों के सपने साझा होते हैं - डिंपल और दर्शन दवे
मैं मुंबई में रहती हूं। वैसे हम गुजरात के राजकोट के रहने वाले हैं। हम पांच भाई-बहन हैं और एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। मेरे दादा जी एक शिक्षक थे, इसलिए उन्होंने हमेशा लड़का-लड़की को समान माना। जितने ऊंचे सपने भाइयों को देखने का हक था, उतना ही हमें भी मिला। मैंने विदेश में पढ़ाई करने का फैसला किया। जब मैं पढ़ाई के लिए विदेश गई थी, मेरे भाई ने मेरी पढ़ाई का खर्च उठाया और मुझे लोन दिलाने में मदद की। उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया और मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर सकी। पढ़ाई के बाद मैं ऑस्ट्रेलिया में ही नेशनल ऑस्ट्रेलिया बैंक में अच्छे सैलरी पैकेज पर काम करने लगी। उसी दौरान भाई दर्शन ने अपना एक स्टार्टअप शुरू किया, जिसके लिए उन्हें पैसों की जरूरत थी और वह काफी परेशान थे। मुझे लगा कि अब मेरी बारी है उन्हें सपोर्ट करने की।
कहते हैं न, ‘जब भाई का सपना बहन का मिशन बन जाए, तब कामयाबी सिर्फ मंजिल नहीं, एक रिश्ते की जीत बन जाती है।’ मुझे अपने भाई का साथ देना स्वाभाविक लगा। मैंने सोचा कि जब भाई ने मेरे लिए सब कुछ किया तो उनका सपना भी मेरा सपना होना चाहिए। मैंने बिना झिझक अपनी नौकरी छोड़ दी और भाई के स्टार्टअप में निवेश करने का फैसला किया। मैंने भाई के कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और उनके हर फैसले में साथ खड़ी रही। आज वह एक सफल उद्यमी हैं और अपना व्यवसाय चला रहे हैं। भाई के साथ से मैं भी आज खुद एक उद्यमी हूं और अब मैं एक वेतनभोगी कर्मचारी होने के बजाय अपनी खुद की बॉस हूं।
जिसका कोई नहीं, उसकी बहन हैं पूजा शर्मा
दिल्ली की रहने वाली पूजा शर्मा अपने घर की सबसे छोटी बेटी हैं। पिता बेहद लाड़ करते, मां हर जरूरत पूरी करतीं और बड़ा भाई, वह तो जैसे एक छाया था, हर मुश्किल से बचाने के लिए। लेकिन एक दिन सब कुछ बदल गया। मोहल्ले में भाई रामेश्वर की कुछ लोगों के साथ बहस हो गई और उन्होंने पूजा की आंखों के सामने रामेश्वर को गोली मार दी। पूजा सड़क पर गाड़ियों के आगे गिड़गिड़ा रही थीं कि कोई उनके भाई को अस्पताल पहुंचा दे, लेकिन डर की वजह से कोई मदद के लिए आगे नहीं आया और रामेश्वर की मौत हो गई। मां पहले ही गुजर चुकी थीं और भाई की मौत के सदमे में पूजा के पिता कोमा में चले गए। अब पूजा के पास सिर्फ बूढ़ी दादी थीं। पूजा ने ही भाई का अंतिम संस्कार किया। वहां उन्हें एक शिव मंदिर दिखा। वह मंदिर गईं और शिवलिंग को गले लगाकर रोते हुए संकल्प लिया कि अब किसी लावारिस शव को अनाथ नहीं मानने देंगी। 2022 में लिए इस संकल्प को पूजा आज भी निभा रही हैं और अभी तक पांच हजार से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं।
पूजा कहती हैं, “भाई के होते हुए मैं कॉकरोच और छोटे-बड़े कीड़े-मकोड़ों से डरती थी, लेकिन अब किसी से नहीं डरती।” पूजा की सगाई अपनी पसंद के लड़के से हो गई थी, लेकिन लड़के के घर वालों को पूजा का यह सेवा-कार्य पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने इस काम या शादी में से एक का चुनाव करने को कहा और पूजा ने सब छोड़ इस सेवा-कार्य को चुना। पूजा ने अब एक छोटा वृद्धाश्रम भी शुरू किया है, जहां वह बेसहारा लोगों को सहारा देती हैं। पूजा बताती हैं कि शिव ने उन्हें मार्ग दिखाया, जैसे उनका भाई दिखाता था, इसलिए भाई के जाने के बाद से वह शिव जी को ही राखी बांधती हैं। वह कहती हैं, “मेरे भाई अब भोलेनाथ हैं।”