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बेटे की बात भी सुनती हैं आप?

Thu, 07 Dec 2023 05:31 PM IST
प्रकाश चंद जोशी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

“मम्मा, स्कूल में लड़कियां मुझे चिढ़ाती हैं। मुझे स्कूल नहीं जाना।” श्रेया इसे बच्चों के बीच की छोटी-मोटी बात मानकर अनदेखा करती है। कभी-कभी वह झल्ला कर कहती है, “तुम लड़के हो, लड़कियों से डरते क्यों हो?”
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माता-पिता को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? - फोटो : istock
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सरस्वती रमेश,

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आप अपनी बेटी से प्यार करती हैं, उसकी बात सुनती हैं और गलती पर एक्शन भी लेती हैं, लेकिन इस सबके बीच कहीं बेटे की बातों को नजरअंदाज तो नहीं करतीं? आयुष आठवीं क्लास में पढ़ता है। वह अपनी मम्मी से अक्सर शिकायत करता है, “मम्मा, स्कूल में लड़कियां मुझे चिढ़ाती हैं। मुझे स्कूल नहीं जाना।” श्रेया इसे बच्चों के बीच की छोटी-मोटी बात मानकर अनदेखा करती है। कभी-कभी वह झल्ला कर कहती है, “तुम लड़के हो, लड़कियों से डरते क्यों हो?”

एक दिन श्रेया ने अखबार में एक लड़के के स्कूल की लड़कियों द्वारा चिढ़ाए जाने से तंग आकर आत्महत्या करने की खबर पढ़ी। उसने तुरंत स्कूल जाकर टीचर्स से इस मामले को गंभीरता लेने की बात की। हालांकि श्रेया अपनी बेटी पहल के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं करती। जब उसकी बेटी किसी बात की शिकायत करती है तो वह ध्यान से सुनती है। स्कूल में जाकर टीचर से शिकायत करती है। वह बेटी को गलत व्यवहार के प्रति जागरूक भी करती है, लेकिन आयुष की बुलिंग पर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इस तरह अनजाने में ही आयुष माता-पिता के भेदभाव का शिकार हुआ।
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लड़कों की भी सुनें

हालांकि, बेटे को दुलार और बेटी को दुत्कार वाला समय अभी बहुत पीछे नहीं छूटा है, लेकिन यह भी सच है कि आजकल लड़कियों की हर बात को जितनी तवज्जो दी जाती है, उतनी लड़कों की बात को नहीं दी जाती। नतीजतन, किशोर खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं, जिससे उनमें हीनभावना पनपने लगती है।

गलत धारणा

समाज में यह धारणा बनी हुई है कि अगर कुछ गलत हुआ तो उसके लिए लड़के ही जिम्मेदार हैं और लड़कियों की कोई गलती नहीं है, खासकर स्कूलों में। लड़कों के प्रति माता-पिता, शिक्षक और स्कूल भी पूर्वाग्रह से ग्रसित रहता है, चाहे लड़का कितना ही सीधा क्यों न हो।

लड़कियां भी करती हैं बुलिंग

सच तो यह है कि आज लड़कों और लड़कियों की परवरिश में कोई फर्क नहीं किया जा रहा है। उन्हें टीवी, मोबाइल और इंटरनेट समान रूप से उपलब्ध हैं, जिनकी नकारात्मकता भी उन पर गलत प्रभाव डाल रही है। नतीजा यह कि लड़कों को टीज करने, उनकी कमी पर कमेंट करने, पहनावे और उनकी चाल तक का मजाक उड़ाने में लड़कियों को मजा आता है। मगर उनका यह मजाक कई बार किसी की जान पर भारी पड़ जाता है।

नासमझी की उम्र

यह उम्र नासमझी वाली होती है। वे एक-दूसरे का मजाक बनाने को सामान्य समझते हैं। मजाक की सीमा का अंदाजा उन्हें नहीं होता। इसी तरह मजाक को कितनी गंभीरता से लिया जाए, यह मजाक बनाया गया बच्चा नहीं समझ पाता और रोज-रोज के इरिटेशन से परेशान होकर गलत कदम उठा लेता है।

उम्र को ध्यान में रखकर

बच्चा केवल बच्चा होता है, लिंग बेशक कुछ भी हो। वह समान व्यवहार, समान प्यार-दुलार और देखभाल का अधिकारी है। समाज में अब तक लड़कियों के साथ भेदभाव हुआ तो इसका मतलब यह नहीं कि अब हम लड़कों के साथ भेदभाव शुरू कर दें।

लड़कियों को भी समझाएं

जिस तरह हम लड़कों को लड़कियों से बात करने का सलीका सिखाते हैं, ठीक उसी तरह हमें अपनी बेटियों को भी लड़कों से वार्तालाप करने का सलीका सिखाना चाहिए। हमारे समाज को अच्छे आचरण वाले लड़के और लड़कियों, दोनों की जरूरत है। किसी एक के बिना हम अच्छा समाज नहीं बना सकते।

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