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किराए के कमरे और मैंः आधी रात को तेज बारिश में मैं सड़क पर थी और रोए जा रही थी

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आधी रात का वक्त था। तेज बारिश हो रही थी। - फोटो : pixabay
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आधी रात का वक्त था। तेज बारिश हो रही थी। मैं सड़क पर जोर-जोर से रोए जा रही थी। कुछ देर पहले ही फोन बजा था। हैलो कहते ही मेरी चीख निकल पड़ी। बारिश के साथ ही धूल भरी तेज हवा भी चल रही थी। जुलाई का महीना था और दिल्ली में इस बार भी मानसून देर से आया था।

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कुछ ही सेकेंड बाद मेरा फोन स्विच ऑफ हो गया। दूर-दूर तक कोई ऑटो नहीं! सड़क पर चलता कोई व्यक्ति भी नहीं दिख रहा था। दस मिनट पहले जब मैं यहां उतरी थी तो न ही बारिश की आशंका थी और न ही धूल भरी आंधी आने के संकेत। यह साउथ एक्स का बस स्टैंड था और मुझे बंगाली स्वीट से चंद कदम दूर अपने पीजी के लिए चलकर जाना था। 

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यहां रोज हलचल रहती थी लेकिन अचानक ही सारी हलचल न जाने कहां गायब हो गई थी। बारिश की बूंदों के तेज होने के साथ ही मैंने अपने कदम आगे बढ़ने से रोक लिए और पांच मिनट के लिए स्टैंड पर खड़ी हो गई । तभी अचानक फोन बजा। हैलो बोलते ही दूसरी तरफ से आवाज आई- 'डैड हेड ए हार्ट अटैक।'  यह सुनते ही मेरा शरीर ठंडा पड़ गया और कदम स्टैंड से बीच सड़क पर जा पहुंचे। मेरी आवाज बंद-सी हो गई।

भीतर से जोर लगाकर बस इतना ही कह पाई- 'क्या?'
फोन हाथ से छूट गया और एकदम से बंद हो गया।
बैटरी खत्म हो चुकी थी।

दिल जोरों से धड़क रहा था। - फोटो : pixabay
मैं अपने पीजी की तरफ भागी। जल्द से जल्द रूम में पहुंच जाना चाहती थी। दिल जोरों से धड़क रहा था। बारिश की ठंडी बूंदें न जाने क्यों मेरे माथे पर गर्माहट दे रही थीं? फोन बंद था। पीजी का गेट भीतर से बंद। मैं जोरों से चिल्लाई किरन गेट खोलो। मेरी आवाज बारिश के शोर में दब गई। रात के सन्नाटे में बूंदों की तड़तड़ाहट के सिवा कोई नहीं था। स्ट्रीट लाइट को देखकर पहली बार मुझे अहसास हुआ, घर से दूर अकेले किसी शहर में होना क्या होता है? लाइट जल-बुझ रही थी और मैं पूरे जोर से दोनों हाथों से गेट को पीटे जा रही थी।

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दस मिनट हो गए पर गेट नहीं खुला। भीतर से डरी मैं, जोर-जोर से सांस लेने लगी, शायद थक चुकी थी। बालकनी पर ऊपरी मंजिल पर मेरे कपड़े टंगे थे। कमरे की लाइट जल रही थी। एक पर्दे से शीशा ढका हुआ और दूसरे से आधा खुला हुआ था। किरन भीतर गहरी नींद में थी। रात को दूसरा पहर था। और मैं चिल्लाने के साथ ही गेट पीट रही थी। किरन,
आंटी...
किरन...आंटी..
गेट खोलो।

मैं वहीं नीचे बैठ गई और जोर से रोने लगी। - फोटो : pixabay
मैं वहीं नीचे बैठ गई और जोर से रोने लगी।
पा.., पा.....
ओह गॉड..मैं क्यों गई फिल्म देखने?
सामने ही मंदिर था। और मैं उसके बाहर बैठे रहने वाले भिखारियों को देख रही थी। जिन्हें मैं हर बार हिकारत की नजर से देखती थी लेकिन वो भी गायब थे। मैं जब भी गुस्से में होती तो गालियां बकती पर पहली बार मेरे मुंह से कोई गाली नहीं निकली। मैं अब चुपचाप बैठी थी और रोना भी नहीं आ रहा था। पापा की चिंता सता रही थी कि क्या हुआ होगा? दोनों हाथ मेरे माथे पर थे और आंखे बंद थी। मैं जैसे ही फिर खड़ी हुई...

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मेरे सामने ही स्वीटी थी।
उसे देखते ही मेरे भीतर न जाने कहां से इतनी ताकत आ गई और मैंने फिर जोर से गेट पर दनादन हाथ मारे। फिर चिल्लाई प्लीज गेट खोलो आंटी, किरन...किरन...! मित्तल आंटी। मुझे असहाय देख स्वीटी भी भौंकने लगी। अब हम दोनों थे। मैं चिल्ला रही थी और स्वीटी भौंक।

 

आधे घंटे की मशक्कत के बाद मित्तल आंटी आई। - फोटो : pixabay
आधे घंटे की मशक्कत के बाद मित्तल आंटी आई।
जोर से बुदबुदाई कौन है इतनी आधी रात को जो गेट पीट रहा है?
उन्होंने बाहर झांका तो... अरे भावना...उनके मुंह से इतना ही निकला और फटाफट गेट खुल गया।
वह इससे ज्यादा कुछ पूछती.. मैं उनके सीने से लिपट गई।
जोर-जोर से रोने लगी।

अब हम कमरे के भीतर थे। किरन के हाथ में पानी का गिलास था। मित्तल आंटी बेड पर बैठी थी और उनका चेहरा गुस्से से लाल था। वह किरन को घूरे जा रही थी। किरन सिर नीचे कर बाई आंख से मुझे तांक रही थी। फोन सामने चार्ज पर था और ऑन होते ही उसमें 25 मिसकॉल थे। किरन के फोन में बीस मिसकॉल और कई-कई मैसेज.....।

 
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सॉरी कहते हुए मेरे आंसू निकल आए। - फोटो : pixabay
मैंने फौरन बैक कॉल किया और दूसरी तरफ से आवाज आई-
'कहां हो तुम? एक घंटे से यहां सब परेशान हो उठे हैं। कितनी बार कहा है?
रात में फिल्म देखने में मत जाया करो।
तुम्हारी समझ में ही नहीं आता कुछ।
पापा यहां अस्पताल में भर्ती हैं और मम्मी तुम्हारे लिए रो रही है।'

सॉरी कहते हुए मेरे आंसू निकल आए।
अंकित से मैंने बस इतना ही पूछा, 'पापा कैसे हैं?' 
ठीक हैं
कुछ बॉलकेज हैं। हम अभी हॉस्पिटल में ही हैं।

 
(यह कहानी दिल्ली की एक कंपनी में काम करने वाली भावना (बदला हुआ नाम) के जीवन पर आधारित है। इसे फीचर डेस्क के लेखक ललित फुलारा ने लिखा है। आप पर अगर 'किराए के कमरे और उसमें की लाइफ' को लेकर किस्से कहानियां हों तो आप हमारे साथ साझा कर सकते हैं। blog@auw.co.in ) 
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