दिल जोरों से धड़क रहा था।
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मैं अपने पीजी की तरफ भागी। जल्द से जल्द रूम में पहुंच जाना चाहती थी। दिल जोरों से धड़क रहा था। बारिश की ठंडी बूंदें न जाने क्यों मेरे माथे पर गर्माहट दे रही थीं? फोन बंद था। पीजी का गेट भीतर से बंद। मैं जोरों से चिल्लाई किरन गेट खोलो। मेरी आवाज बारिश के शोर में दब गई। रात के सन्नाटे में बूंदों की तड़तड़ाहट के सिवा कोई नहीं था। स्ट्रीट लाइट को देखकर पहली बार मुझे अहसास हुआ, घर से दूर अकेले किसी शहर में होना क्या होता है? लाइट जल-बुझ रही थी और मैं पूरे जोर से दोनों हाथों से गेट को पीटे जा रही थी।
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दस मिनट हो गए पर गेट नहीं खुला। भीतर से डरी मैं, जोर-जोर से सांस लेने लगी, शायद थक चुकी थी। बालकनी पर ऊपरी मंजिल पर मेरे कपड़े टंगे थे। कमरे की लाइट जल रही थी। एक पर्दे से शीशा ढका हुआ और दूसरे से आधा खुला हुआ था। किरन भीतर गहरी नींद में थी। रात को दूसरा पहर था। और मैं चिल्लाने के साथ ही गेट पीट रही थी। किरन,
आंटी...
किरन...आंटी..
गेट खोलो।
मैं वहीं नीचे बैठ गई और जोर से रोने लगी।
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मैं वहीं नीचे बैठ गई और जोर से रोने लगी।
पा.., पा.....
ओह गॉड..मैं क्यों गई फिल्म देखने?
सामने ही मंदिर था। और मैं उसके बाहर बैठे रहने वाले भिखारियों को देख रही थी। जिन्हें मैं हर बार हिकारत की नजर से देखती थी लेकिन वो भी गायब थे। मैं जब भी गुस्से में होती तो गालियां बकती पर पहली बार मेरे मुंह से कोई गाली नहीं निकली। मैं अब चुपचाप बैठी थी और रोना भी नहीं आ रहा था। पापा की चिंता सता रही थी कि क्या हुआ होगा? दोनों हाथ मेरे माथे पर थे और आंखे बंद थी। मैं जैसे ही फिर खड़ी हुई...
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मेरे सामने ही स्वीटी थी।
उसे देखते ही मेरे भीतर न जाने कहां से इतनी ताकत आ गई और मैंने फिर जोर से गेट पर दनादन हाथ मारे। फिर चिल्लाई प्लीज गेट खोलो आंटी, किरन...किरन...! मित्तल आंटी। मुझे असहाय देख स्वीटी भी भौंकने लगी। अब हम दोनों थे। मैं चिल्ला रही थी और स्वीटी भौंक।
आधे घंटे की मशक्कत के बाद मित्तल आंटी आई।
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सॉरी कहते हुए मेरे आंसू निकल आए।
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