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महाराजाओं का मजा, बना रानियों की सजा

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ये अंश दीवान जरमनी द्वारा रचित उपन्यास 'महाराजा' से लिया गया है। 'महाराजा' उपन्यास हिंदुस्तान के राजा-महाराजाओं की निजी जीवनचर्या, प्रेम-प्रसंग और षड्यंत्र पर आधारित है।
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महल में पहुंच कर वरयाम सिंह अपनी रात राजकुमारी के शयनागार में ही गुजारता। राजकुमारी कीमती पोशाक पहने उसका स्वागत करती। सुनहले पलंग पर बनारसी जरी की रेशमी चादर और कामदार तकिए रहते। चमेली और गुलाब के फूल पलंग पर बिछाये जाते जिस पर वरयाम सिंह और गोविन्द कौर एक-दूसरे को सीने से चिपटाये, दृढ़ आलिंगन में बंधे रति-क्रीड़ा का आनंद लिया करते। सारी रात कामुक चेष्टाओं और संभोग में बीत जाती। सवेरा होने से पहले वरयाम सिंह महल से बाहर उसी रास्ते से निकल जाता, जिधर से आता था। बाहर निकल कर वह सावधानी से, दीवार में बनाई हुई सेंध की ईटों से बंद कर देता था, जिससे किसी को शक न हो। इसके बाद वह अपने घर चला जाता था। इन रूमानी मुलाकातों का सिलसिला दो साल तक जारी रहा।

रामप्यारी का दुखद अंत

आमतौर पर ऐसी पार्टियों में मेहमान लोग अपनी महिला-मित्रों और चहेतियों को साथ लाते थे। अंग्रेज रेजीडेन्ट भी, जो अपने प्रेम-प्रसंगों में हिन्दुस्तानियों से अलग रहा करते थे, ऐसी पार्टियों में मौज में आ जाते और अपने दोस्‍तों की बीवियों व लड़कियों को, जिनस उनका प्रेम-संबंध होता, जरूर अपने साथ लाते। ये पार्टियां एक हफ्ते से ज्यादा समय तक चला करतीं और उनकी समाप्ति पर सभी मर्द-औरतें तन-बदन से और कामुकता की दृष्टि से थके-मांदे जान पड़ते।

महाराजा कभी शराब नहीं पीते थे। वे केवल कुछ दवाईयां सूंघा करते थे, जो एक प्राइवेट कमरे में छिपा कर रखी रहती थीं। इस बात को सिर्फ उनका प्रिय ए.डी.सी. तिरनार सिंह ही जानता था। बातों-बातों में अक्सर महाराजा कहदेते थे कि उनको औरतों से नफरत हैं और उन्हें अपनी पत्नी की भी परवाह नहीं।

मगर जब वे ताल-शाही की पार्टियां होतीं, तब महाराजा अपनी एक बांदी रामप्यारी को आगरे से चुपचाप बुलवा लेते। बहुत फासले पर महाराजा का एक बंगला था जहां शिकार के बाद महाराजा चले जाते थे, यह जाहिर करने के लिए कि तालशाही के शानदार महल में रहने की बनिस्बत उनको सादा सजावट के एक बंगले की शांत और एकान्त जिंदगी पसंद है। उसी बंगले में रामप्यारी से उनकी मुलाकातें हुआ करती थीं।

असलियत यह थी कि रामप्यारी की खातिर ही महाराजा उस सुनसान बंगले में जा कर रहते थे। वह सारे दिन उसी बंगले के कमरों में छिपी रहती थी। उसे न किसी से मिलने की इजाजत थी और न बंगले से बाहर जाने की।
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तालाब में शमा-नाच

महाराजा पधारते, हर एक से नजरें मिलाते, किसी को धक्का देते, किसी को बदन से लिपटाते और इसी तरह आगे बढ़ते हुए जब आखिरी जीने तक पहुंचते, तब चालीसों औरतों से मुलाकात पूरी हो जाती। हर औरत के पास खास तरह की बनी हुई एक शमा यानी मोमबती रहती थी। जब वे कुण्ड में उतरती, जो सिर्फ दो फीट गहरा था, तब बिजली की रोशनी बुझा दी जाती। तब हर औरत अपनी शमा बदने के बीच के हिस्से में नाभि के नीचे आसानी से लगाकर उसे जला देती।

शमा की रोशनी में कमर की सिलवटें, बदन का उभार और गुप्त अंग साफ-साफ नजर आते। इसके बाद बड़े कायदे का नाच शुरू होता, जिसमें हर औरत सावधान रहती कि उसकी शमा बुझने न पाए। महाराजा को बीच में करके वे औरतें खूब उछल-कूद मचाती और पानी के छीटें मारती। पानी के छीटों से एक-एक करके शमायें बुझती जाती। यह खेल तब तक चलता, जब तक सब शमायें न बुझ जाती। जो औरत आखिर तक अपनी शमा जलाए रखती, वह उस रात ‌की हीरोइन मानी जाती। उसे कीमती भेंट-इनाम मिलते और उसे महाराजा की सेज पर रात बिताने का सौभाग्य प्राप्त होता था।
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