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टेलीविजन पर हम क्या देखें और क्यों?

Thu, 28 Feb 2019 03:12 PM IST
मोना नारंग रूपायन डेस्क
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हम क्या देखें?
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टेलीविजन पर महिलाओं के लिए ढेर सारे धारावाहिक और मनोरंजक प्रोग्राम चलते रहते हैं। ऐसे में हमें यह जरूर सोचना चाहिए कि हम क्या देखें और क्यों? टेलीविजन को समाज का दर्पण माना जाता है। टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक समाज की दिशा और दशा को तय करने का काम करते हैं। धारावाहिक देखने वाले दर्शक अधिकतर महिलाएं होती हैं। 
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आज जो धारावाहिक प्रसारित हो रहे हैं, उनकी पटकथा के नायक और नायिका पर अधारित होती है, यह एक आम बात है। लेकिन, वर्तमान के धारावाहिक परिवार की चौखट के अंदर ही अभिनय करते दिखाई देते हैं। इस तरह के धारावाहिकों से आम महिलाएं रचनात्मक और सामाजिक शिक्षा ले रही हैं। बहुत सारे धारावाहिक रीति-रिवाज के मकड़जाल में फंसे हुए दिखाई पड़ रहे हैं। धारावाहिक में अभिनय करने वाले पात्र घर के लड़ाई-झगड़े के बीच सिमटकर खत्म हो जाते हैं। धारावाहिकों की अपनी भाषा होती है और फिर धारावाहिक समाज के लिए सृजनात्मक बन जाते हैं। कहने का आशय यह है कि पूर्व में धारावाहिकों में प्ररेणात्मक चित्रण किया जाता था, जिसे देखकर दर्शक खुद को खोजने में जुट जाता था। उसके अंदर भावनात्मक संवेदनाएं क्रंदन करने लगती थीं।

वर्तमान के धारावाहिक मात्र मनोरंजन का साधन बनकर रह गए हैं। धारावाहिकों के दर्शक घर में रहने वाली महिलाएं होती हैं, जो धारावाहिक की रेटिंग बढ़ाने का काम करती हैं। साक्षर महिलाएं धारावाहिक से शिक्षा लेती हैं, जो परिवार में धुरी का काम करती है। बहुत-सी महिलाएं धारावाहिक की कहानी से मनोरंजन करती हैं। प्राचीन काल में परिवार एक मुठ्ठी की तरह बंद हुआ करते थे। अब संयुक्त परिवार की अवधारणा खत्म होती जा रही है। परिवार अब पति, पत्नी और बच्चों तक सिमटकर रह गया है। बहुत सारे सीरियल काफी लंबे होते जा रहे हैं। उनमें संदेश की थीम बिखरी हुई दिखाई पड़ती है।

सीरियल आज प्रेम कथाओं से बनाएं जा रहे हैं और निर्देशक अपने अनुसार अपनी सोच थोपते जाते हैं, जिससे कहानी की आत्मा मर जाती है। पुरानी पीढ़ी के कलाकार और अदाकार साहित्य को बहुत प्राथमिकता देते थे। साहित्य उनकी जिंदगी में रचा-बसा होता था। किताबों के अध्ययन में उनकी गहरी आस्था होती थी। बहुत सारे सीरियल हैं, जिनमें महिलाओं को कोई न कोई संदेश मिलता था। पहले सीरियल प्रसारित होने से पूर्व उसकी पटकथा पर खूब वाद-विवाद होता था। धारावाहिक का सार साहित्य से ओत-प्रोत रहता था।

टेलीविजन समाज के उत्थान में विशेष भूमिका निभाता है। वर्तमान युग में पुरुष और महिला को समान दृष्टि से देखा जाता है। इसी परिप्रेक्ष्य में टेलीविजन पर प्रसारित धारावाहिकों में स्वदेशी नारी को परिपूर्ण नारी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी धारावाहिक में नारी को किसी न किसी रूप में सशक्त प्रदर्शित किया जा रहा है। समाज में महिलाओं की छवि को सुधारने के लिए टेलीविजन पर रचनात्मक दृश्यों को प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे महिलाओं के अंदर सृजनात्मक शक्ति का प्रादुर्भाव होगा। सीरियल के निर्माता इस दिशा में यह सावधानी बरतें और परिवार को अश्लीलता और भौड़ेपन का शिकार होने से बचाएं।
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भारतीय मूल्यों से समझौता करके सीरियलों के द्वारा समाज में अश्लीलता परोसने के कार्य में लगे रहेंगे, तब समाज व देश को हानि होगी। इससे बचने के लिए महिलाओं को दृढ़ता दिखाने की आवश्यकता है। वे अश्लीलता के प्रदर्शन से इंकार करें और अपनी अस्मिता के साथ समझौता कदाचित न करें। निश्चित ही महिला का सशक्तिकरण ही उनका आभूषण माना गया है। जिस समाज में महिलाओं के सम्मान की रक्षा होती है, उस समाज का उत्थान होता है। धारावाहिक की समय सीमा निश्चित होनी चाहिए। लंबे धारावाहिक में चरित्रों को घसीटने की कोशिश की जाती है, जिससे धारावाहिक की कहानी बोझिल होने लगती है। धारावाहिक में नारी के अभिनय को एक समरसता के साथ दिखाना चाहिए। जब तक धारावाहिक में सामाजिकता और नैतिकता का संदेश नहीं होगा, तब तक धारावाहिक में नीरसता के भाव प्रदर्शित होंगे।

(दिप्ति नवल की पंकज कौशिक से बातचीत पर आधारित)
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