सुरक्षा आज भी है चुनौती
आज गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से निकलने वाली लड़कियां बड़े महानगरों की भीड़ में अपनी पहचान बना रही हैं। हां चुनौतियां ज्यादा है, क्योंकि वह महानगरों में उसी पितृ सत्तात्मक समाज में अकेली है। उसके सामने उसे गर्भ से में ही मार देने वाली क्रूर दुनिया है, ऐसे डर हैं जो उसे वस्तु की तरह समझकर उसका सौदा करने के लिए बैठे हैं, लेकिन बावजूद उसके उसने अपनी राह नहीं छोड़ी है।
मप्र में बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी भोपाल से संबंद्ध हिंदी की प्रोफेसर, कथाकार समीक्षक और महिलाओं के मुद्दों को लगातार उठाने वाली प्रोफेसर विनीता रघुवंशी कहती हैं कि- यकीनन भारत बदला है और समाज पहले की तुलना में प्रगतिशील हुआ है उसकी सोच बदली है और बेटियां घर से बाहर निकली हैं, लेकिन उसके मन में अब भी निर्भया वाला डर है। उसकी अस्मिता को लूटे जाने का डर है और यही वह सबसे बड़ा संकट है जो सभ्य समाज में है।
वे कहती हैं सबसे बड़ा मसला है सुरक्षा का। यदि बेटियां सुरक्षित हैं तो उनकी संभावनाओं को कोई भी समाप्त नहीं कर सकता। लेकिन वे सुरक्षित हैं इसकी कोई गारंटी नहीं है?
एक तरह से देखा जाए तो प्रोफेसर विनीता रघुवंशी ही नहीं देश का प्रबुद्ध वर्ग और स्वयं महिलाओं के लिए सबसे अहम प्राथमिकता सुरक्षा की रही है। जो समाज अपनी स्त्रियों को सुरक्षा नहीं दे सकता उसकी प्रगति स्वाभाविक तौर पर रुक जाती है और वह पिछड़ जाता है। हालांकि यह समय निराशा का नहीं है क्योंकि नौकरी करने घर से निकली महिला उन तमाम चुनौतियों से दो-दो हाथ करना सीख रही है जो उसके अस्तित्व को मिटाने के लिए सामने है। सकारात्मक तरीके से देखें बेटियों और महिलाओं को अब आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।