'हमें, समाज को पिता के महत्व को भी समझना पड़ेगा। उसका त्याग कई मायनों में महत्वपूर्ण है। एक पिता का कंधा कितने लोगों की जिम्मेदारियों को संभालता है। हालांकि समय-समय पर पिता के साथ संतान का रिश्ता बदलता रहा है, कहीं नकरात्मक भी है और कहीं बड़ा ही सकरात्मक भी देखने को मिला है।' ये कहना है भाजपा सांसद मनोज तिवारी का, जो आज 'फादर्स डे' के खास मौके पर अमर उजाला की एक विशेष चर्चा में शामिल हुए थे। इस चर्चा का विषय था- बीते दशकों में कितना बदला पिता और संतान का रिश्ता?
मनोज तिवारी ने कहा, 'मेरा मानना है पिता को अपनी संतान को समझना चाहिए और ये कोशिश करनी चाहिए कि संतान को समझते हुए डील करें। पिता को तानाशाह नहीं बनना चाहिए। अगर पिता अपने बच्चों को कोई चीज जबरदस्ती थोपता है, तो मेरा मानना है कि वो पिता की चूक है। विवेक एक पिता को बहुत अच्छा बना सकता है।' साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पिता के दुख-दर्द को भी समझने की जरूरत है।
चर्चा के दौरान मनोज तिवारी ने अपने पिता के साथ अपने रिश्तों और अपने बच्चों के साथ अपने रिश्तों के बारे में भी बताया। उन्होंने अपने पिता को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने पिता को 12 साल की उम्र में ही खो दिया था, लेकिन आज वह जो कुछ भी हैं, अपने पिता की वजह से ही हैं, क्योंकि उनके पिता भी संगीत के जानकार थे, उनकी प्रेरणा थे।
मनोरोग विशेषज्ञ अमन किशोर ने क्या कहा?
अमर उजाला की विशेष चर्चा में मनोरोग विशेषज्ञ अमन किशोर भी शामिल थे। उन्होंने 'फादर्स डे' के इतिहास के बारे में चर्चा की और बताया कि अमेरिका में सोनारा स्मार्ट डोड नाम की एक महिला थीं, जिन्हें इस दिवस को मनाने की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने बताया कि स्मार्ट डोड ने बहुत कम उम्र में ही अपनी मां को खो दिया था, जिसके बाद उनके पिता ने ही उनकी और अन्य बच्चों की परवरिश की। जब वह बड़ी हुईं और एक चर्च में गईं तो वहां देखा कि 'मदर्स डे' मनाया जा रहा है। इसके बाद ही उनके दिमाग में आया कि क्यों न 'फादर्स डे' भी मनाया जाए, क्योंकि पिता की भूमिका भी माता से बिल्कुल भी कम नहीं है।
दरअसल, स्मार्ट डोड ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर फादर्स डे को बढ़ावा देना शुरू किया। फादर्स डे ने अमेरिका में लोकप्रियता हासिल करना तब शुरू कर दिया, जब राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने वर्ष 1972 में एक घोषणा पर हस्ताक्षर किए और तभी से हर साल जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाया जाता है।
अमन किशोर ने बताया कि जब जेनरेशन गैप आ जाता है, तब थोड़ी परेशानियां होने लगती हैं, क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि बच्चे स्वतंत्र होना चाहते हैं, खुद से डिसीजन लेना चाहते हैं, जबकि पिता उन्हें अपने अनुभव के आधार पर गाइड करना चाहते हैं, ताकि भविष्य में उन्हें कोई दिक्कत न हो। यहां रिश्ते में बाधाएं आने लगती हैं। पिता और संतान के बीच का रिश्ता खराब होने का ये एक प्रमुख कारण होता है।
सामाजिक कार्यकर्ता बरखा त्रेहन ने क्या कहा?
अमर उजाला की विशेष चर्चा में सामाजिक कार्यकर्ता बरखा त्रेहन भी शामिल थीं। उन्होंने अपने पिता को याद करते हुए बताया कि अपने मेरे पिता मेरे लिए भगवान से भी बढ़कर थे, मेरे गुरु थे। आज मैं जिस भी मुकाम पर हूं, उन्हीं की वजह से हूं। वह समाज में बदलाव लाना चाहते थे, कुछ अच्छा करना चाहते थे और वही गुण मुझमें भी हैं।