पोंगल चार दिनों तक चलने वाला पर्व है, जिसे बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इसकी शुरुआत हर साल 14 या 15 जनवरी को होती है। इस बार 14 जनवरी को पोंगल के चार दिवसीय पर्व का पहला दिन है। वहीं 17 को पोंगल पर्व की समाप्ति होती है। पोंगल तमिल संस्कृति और कृषि परंपराओं का प्रतीक है और इसे बड़ी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
पोंगल के चार दिन और परंपराएं
भोगी पोंगल
14 जनवरी को भोगी पोंगल है। इस दिन लोग पुराने सामान और बेकार चीजों को जलाकर घर की सफाई करते हैं। यह दिन जीवन में नकारात्मकता को दूर कर नई शुरुआत का प्रतीक है।
सूर्य पोंगल
दूसरे दिन यानी 15 जनवरी को सूर्य पोंगल मनाया जाएगा। इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है और खेतों में नई फसल पकाने के लिए खीर जैसी मिठाई (पोंगल) बनाई जाती है। यह चार दिनों में सबसे मुख्य दिन होता है और इसे धूमधाम से मनाया जाता है।
मट्टू पोंगल
16 जनवरी को पोंगल पर्व का तीसरा दिन है। यह दिन मवेशियों को समर्पित होता है। इस दिन गायों और बैलों को सजाया जाता है, उनकी पूजा की जाती है और उन्हें विशेष भोजन खिलाया जाता है। यह किसानों के जीवन में पशुओं के महत्व को दर्शाता है।
कानूम पोंगल
पोंगल पर्व का आखिरी दिवस कानूम पोंगल के रूप में मनाया जाता है। 17 जनवरी को कानूम पोंगल मनाया जाएगा। इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों से मिलते हैं और पिकनिक या सामाजिक समारोहों का आयोजन करते हैं। इसे परिवार और समुदाय के साथ समय बिताने का दिन माना जाता है।
कैसे मनाया जाता है पोंगल पर्व
पोंगल के मौके पर घर को रंगोली से सजाया जाता है। नए चावल से बनी पोंगल डिश सूर्य देव को अर्पित की जाती है। इसके अलावा खेतों में नई फसल काटकर उसका आभार प्रकट किया जाता है।
क्यों मनाया जाता है पोंगल
पोंगल नई फसल के आगमन और कृषि समृद्धि का प्रतीक है। यह किसानों के लिए महत्वपूर्ण त्योहार है क्योंकि वे अपनी मेहनत का फल प्राप्त करते हैं। इस पर्व पर सूर्य देव, वर्षा और भूमि के प्रति आभार प्रकट करने का अवसर मिलता है क्योंकि इन सभी के बिना फसल संभव नहीं है। पोंगल के मौके पर परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर त्योहार मनाते हैं जो आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ाने का अवसर देता है। मवेशियों को किसान का साथी माना जाता है, इसलिए मट्टू पोंगल के दिन उनकी पूजा की जाती है।