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रिसर्च: जानें साधु या शैतान हम तजुर्बे से बनते हैं या फिर जन्म से?

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हम इंसानों को अक्सर अच्छे या बुरे के खांचे में बांटते हैं।फलां शख़्स बहुत ही प्यारा है, तो, उसकी तुलना में कोई दूसरा शैतानी मिजाज वाला है।सवाल ये है कि क्या हम पैदाइशी रूप से अच्छे या बुरे होते हैं? साधु या शैतान हम समाज में रहने के तजुर्बे से बनते हैं या फिर जन्मजात रूप से? सदियों से मनोवैज्ञानिक इस विषय पर सोच-विचार करते आए हैं।यूनानी दार्शनिक अरस्तू का मानना था कि नैतिकता का सबक इंसान जीवन के तजुर्बे से हासिल करता है।

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वहीं, मशहूर मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड का कहना था कि नवजात बच्चों के जहन में नैतिकता की स्लेट कोरी होती है। वहीं, बहुत से उपन्यासों में इंसान के जहरीले मिजाज की कल्पना की गई है।ब्रितानी राजनीतिशास्त्री थॉमस हॉब्स का कहना था कि इंसान बेहद दुष्ट और जानवर सरीखा होता है।उसे काबू में करने के लिए समाज की, नियम-कायदों की जरूरत होती है तभी हमारी सभ्यता तरक्की कर सकती है।

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समाज में गैरबराबरी
हॉब्स के मुकाबले, फ्रेंच दार्शनिक और विचारक ज्यां याक रूसो का कहना था कि इंसान अगर समाज और नियम-कानून के दायरे में न बांधा जाए, तो, वो बहुत विनम्र और नरमदिल होता है।समाज के नियमों की बेड़ियां ही इंसान को निर्दयी और जहरीला बना देती हैं। लालच और समाज में गैरबराबरी की वजह से ही इंसान जानवरों सरीखा बर्ताव करता है।अब ये दो बिल्कुल ही विरोधाभासी बातें, कहां तक सही हैं, इसका पता लगाने की कोशिश हो रही है।हाल ही में मनोवैज्ञानिकों ने कई रिसर्च की हैं। इन के आधार पर ये कहा जा सकता है कि इंसान बुनियादी तौर पर अच्छी सोच वाला ही होता है और, बारीकी से कहें, तो बचपन में हम सब का झुकाव अच्छाई की तरफ होता है।

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'बेबीज: देयर वंडरफुल वर्ल्ड'
बीबीसी के शो 'बेबीज: देयर वंडरफुल वर्ल्ड' में बच्चों में नैतिकता को लेकर एक रिसर्च की गई।इसमें देखा गया कि आम तौर पर बच्चों का झुकाव अच्छे बर्ताव की तरफ होता है। इसके लिए बच्चों को एक कठपुतली का शो दिखाया गया। इसमें तीन तरह के किरदार थे।लाल रंग का एक गोला एक पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। वहीं, नीले रंग का चौकोर किरदार उसे रोक रहा था।पीले रंग का तिकोना किरदार, लाल गोले को चढ़ने में मदद कर रहा था।ये शो देखने के बाद एक साल की औसत उम्र वाले बच्चों से पूछा गया कि वो किस किरदार के साथ खेलना चाहेंगे।

बच्चों का चुनाव

ज़्यादातर बच्चों ने तिकोने आकार वाले किरदार को पसंद किया। उससे चुनने वालों में सात महीने की बेहद कम उम्र तक के बच्चे भी शामिल थे।'बेबीज: देयर वंडरफुल वर्ल्ड' के ये नतीजे 2010 में हुए एक और तजुर्बे से मेल खाते हैं। इसे अमरीका की येल यूनिवर्सिटी के कॉग्निशन सेंटर ने किया था।जिसमें बच्चे अच्छे बर्ताव वाली कठपुतलियों को इसलिए चुनते हैं, क्योंकि वो उनके अच्छे बर्ताव को पसंद करते हैं।यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का मानना था कि बच्चों का ये चुनाव ये साबित करता है कि बचपन से ही हमारा झुकाव नैतिक रूप से सही माने जाने वाले व्यवहार की तरफ होता है।2017 में जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी ने भी ऐसा ही एक रिसर्च किया था। इसमें भी कठपुतली की मदद से बच्चों का मिजाज समझने की कोशिश की गई थी।

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पीड़ित को बचाने की मदद

छह महीने तक की उम्र के बच्चों को तीन तरह के किरदारों वाले एनिमेशन और वीडियो दिखाए गए थे।इनमें एक पीड़ित था, तो दूसरा धमकाने वाला और तीसरा किरदार ऐसा था, जो कभी-कभार पीड़ित की मदद करने की कोशिश करता था।ये तीसरा कैरेक्टर अपने आप को पीड़ित और धमकाने वाले के बीच में लाकर पीड़ित को बचाने की मदद करता था।ये वीडियो देखने के बाद बच्चों को अपनी पसंद का किरदार चुनना था। ज़्यादातर ने वो कठपुतली चुनी, जो पीड़ित की मदद करने की कोशिश करती थी।दूसरे रिसर्च से भी ये बात ही सामने आई है कि चुनाव की सूरत में बच्चे परोपकार को ही चुनते हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की 'बिग मदर स्टडी' से भी यही बात साबित हुई।

परोपकार की तरफ झुकाव

इस तजुर्बे में बच्चों को पता नहीं था कि उन पर नजर रखी जा रही है फिर भी वो नरमदिली से पेश आ रहे थे और दूसरों की मदद करते दिखे।यानी, ये साफ था कि सजा का डर नहीं होने पर भी उनका बर्ताव नैतिकता वाला था,अब, इन तजुर्बों के बावजूद भी पक्के तौर पर तो ये नहीं कहा जा सकता कि थॉमस हॉब्स और सिग्मंड फ्रायड गलत थे।मगर, ये रिसर्च हमें बताते हैं कि जन्म से लोग परोपकार की तरफ झुकाव रखते हैं।बच्चों के मां-बाप को निश्चिंत होना चाहिए कि अगर वो नजर नहीं रखेंगे, तो उनका बच्चा बिगड़ जाएगा।

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