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डिनर टेबल के राज को समझें, बड़े-बड़े समझौते और रिश्ते बनते हैं यहां...

Mon, 27 Nov 2017 10:10 AM IST
दीप्ति अंगरीश / गोविंद कुमार
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अगर समय को बदल दिया जाए, तो आप डिनर पर किसे बुलाना चाहेंगे? कुछ दिन पहले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में ढेर सारे लोगों से सवाल किए थे। ज्यादतर लोगों के जवाब थे- “जीनियस वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन।” कुछ लोगों की पसंद चार्ली चैपलिन भी थे।
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थोड़ा आश्चर्य यह भी होता है कि कम लोगों की चाहत थी कि वह अपने समय की मशहूर अदाकारा मर्लिन मुनरो के साथ डिनर करें। आज की बात करें, तो दक्षिण एशियाई देशों के ज्यादातर लोगों ने सदी के शहंशाह अमिताभ बच्चन के साथ डिनर करने के मौके को अपना सौभाग्य कहा। आखिर क्या है डिनर का मनोविज्ञान?

कैसी हो अपनी डिनर पार्टी? दुनिया के बड़े-बड़े फैसले अगर डिनर पार्टियों में ही लिए गए हैं, तो इसकी वजह तो होगी। वजह तक जाने के लिए डिनर संस्कृति को समझने की जरूरत है, क्योंकि आप भी तो किसी-न-किसी को डिनर पार्टी पर बुलाते हैं।
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इस सदी में स्वाद ने अपना संस्कार बदल लिया है। देश के किसी कोने की किसी अनजान-सी गली में जो पकता था, वह आपके यहां उबल रहा है। लेकिन खाना बनाने के कुछ  सूत्र हैं, तो खाना परोसने के भी सलीके हैं।  डिनर दिल में बसता है। रिश्ता पेट से होकर गुजरता है। लोगों से मेल-मुलाकात बढ़ाना हो, संबंधों में मजबूती लानी हो, तो एक पार्टी जरूरी है। कट-कट कर जिए, तो क्या जिए? ‘जरनल ऑफ मैरेज एंड फैमिली वेलफेयर’ में छपे एक शोध की मानें, तो जिन परिवारों में मेहमानों के साथ बैठकर खाने (डिनर) की परंपरा होती है, उस परिवार के सदस्यों के बीच अधिक सौहार्द्रपूर्ण वातावरण पाया जाता है।

वैसे अपने देश में डिनर पार्टियों का चलन कांग्रेस की प्रधानमंत्री के समय में तेजी से उभरा था। लेकिन इससे पहले आजादी की लड़ाई के दौरान माउंटबेटन ने गांधी और नेहरूजी को एक डिनर पार्टी में बुलाया था। नेहरूजी तो पाश्चात्य माहौल को पसंद करते थे, लेकिन उस डिनर पार्टी में गांधीजी ने अपने स्वदेशी स्टाइल में खाना खाया था, जिसकी बड़ी चर्चा हुई थी। राजनीति से अलग अगर हम सब अपनी-अपनी दुनिया को देखें, तो अपनी जिंदगी में भी ऐसी पार्टियों की जरूरत बनी हुई है। जरूरत इस बात की भी है कि सोशल लाइफ को हम अपने लाइफस्टाइल का हिस्सा बनाएं, क्योंकि रोटी, कपड़ा, मकान जैसी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के बीच छोटी-बड़ी डिनर पार्टियां हमें आगे कुछ अच्छा करने का रास्ता भी बताती हैं।

आपने जब बुलाए मेहमान

एक अजीब-सी दुनिया होती जा रही है अपनी। भागती हुई दुनिया। कभी गौर किया है कि हमारे अपने हम से दूर होते जा रहे हैं। भले ही उन्हें हम व्हाट्स-ऐप से रोजाना गुड माॅर्निंग या गुड नाइट का मैसेज दें, इससे हम उनके जेहन में तो रहते हैं, लेकिन भावनाएं आैर संवेदनाओं का क्या? यही नहीं, कई बार हम रिश्तों से अलग लोगों को पसंद करते हैं, लेकिन बहुत कुछ उन्हें हाल-ए-दिल बयां नहीं कर पाते। या यूं कहें कि ऐसा मौका ही नहीं मिलता। 

कई दफा प्रोफेशनल लाइफ के लोगों को हम पर्सनल लाइफ में शेयर करना चाहते हैं, पुराने यार-दोस्तों से मिलना चाहते हैं, रूठे को मनाना चाहते हैं, मैच मेकिंग की देख-दिखाई की गुप्त बातें करनी होती हैं, बिजनेस की लेन-देन की मीटिंग करनी होती है, दूर-दराज के नाते-रिश्तेदारों से मिलना होता है, आस-पड़ोस के लोगों से संपर्क बढ़ाने होते हैं, लोगों में अपनी गुडी-गुडी इमेज देनी होती है, एनिवर्सरी से लेकर फेस्टिवल सेलिब्रेट करने होते हैं।

ऐसे में डिनर पार्टी से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। एक बात और, यदि आपकी जेब इजाजत दे, तो डिनर पार्टी में कामवाली या कुक की मदद ले सकते हैं। घर में आयोजित पार्टी को थीम भी दे सकते हैं, जिसमें ड्रेस कोड हो, मौज मस्ती के लिए गेम्स की व्यवस्था हो। 
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दिल से बुलाएं

ऐसा नहीं है कि जिंदगी के सारे कष्टों का रामबाण है डिनर पार्टी। वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक भावना बर्मी कहती हैं कि इससे आपकी जिंदगी की बोरियत दूर होगी और आप कुछ नया सोच पाएंगे। नए की बात पर यहां महान अभिनेता चार्ली चैपलिन याद आते हैं। अपनी आत्मकथा में वह ‘डिनर’ को कुछ इस ढंग से याद करते हैं-“मुझे अपनी गरीबी के सामाजिक कलंक का अच्छी तरह से भान था। गरीब से गरीब बच्चे भी रविवार की शाम को घर के बने डिनर का लुत्फ ले लिया करते थे। सिर्फ मैं नहीं। लेकिन एक शुक्रवार घुड़दौड़ में पांच शिलिंग जीतने के बाद मां ने सबके लिए डिनर का प्रबंध किया था और मैं खुश हो गया था।”

वह अपनी आत्मकथा में यह भी लिखते हैं कि कई फिल्मों के विचार उनके पास किसी-न-किसी डिनर में आए थे। जरूरी नहीं कि हर डिनर पार्टी में कोई बड़ा आदमी ही शरीक हो। आपको दोस्तों को बुलाना हो, रिश्तेदारों से मिलना हो, डिनर पार्टी पर बुला लें। डिनर पर लोग फुर्सत में आते हैं। यदि यह वीकेंड में हो, तो पार्टी में मौशिकी और भी बढ़ जाती है। आम लोगों के साथ ही अब पाॅलिटिकल एरिना में भी डिनर डिप्लोमेसी का प्रचलन बढ़ता जा रहा है।

जब भी हमारे देश में दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष आते हैं, हमारे प्रधानमंत्री हैदराबाद हाउस में या राष्ट्रपति अपने प्रेसिडेंट हाउस में डिनर पार्टी करवाते हैं। जहां बडे़ लोगों का मिलना-जुलना होता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संबंधों में मजबूती आती है। याद कीजिए, हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पहली बार अमेरिका गए, तो वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डिनर पार्टी दी और रेड कारपेट पर मोदी जी का स्वागत किया था। पूरे विश्व की मीडिया में वह डिनर पार्टी कौतूहल का विषय रही थी, लेकिन निजी जिंदगी में भी इसकी अहमियत बची हुई है।

अपने सीमित संसाधनों के अनुसार घर पर डिनर पार्टी देने के फैसले के बाद हमें सबसे पहले गेस्ट लिस्ट तैयार करनी चाहिए और उसी के अनुसार पार्टी की तैयारी करनी चाहिए। साथ ही मेहमानों की पसंद को भी जान लें। अगर डिनर पार्टी पूरी तरह से पर्सनल है, तो गेस्ट अपने कम्फर्ट के अनुरूप बुलाएं। या यूं कहें कि जिनके साथ आप खुलकर घुल-मिल पाएं। बेझिझक दोनों ओर से बोल पाएं। कुछ पल के लिए ही सही, जीवन को जी पाएं। होस्ट और गेस्ट के कुछ कॉमन इंटरेस्ट हों।

डिनर पार्टी में खाने के साथ एम्बियंस का अहम रोल होता है। और यह सब रोशनी पर निर्भर करता है। वास्तु विशेषज्ञ मनोज जैन कहते हैं, “डिनर पार्टी वास्तु अनुकूल होना चाहिए। मसलन हाॅल में खाने की व्यवस्था पूर्व या उत्तर दिशा में हो। ”
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