अगर समय को बदल दिया जाए, तो आप डिनर पर किसे बुलाना चाहेंगे? कुछ दिन पहले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में ढेर सारे लोगों से सवाल किए थे। ज्यादतर लोगों के जवाब थे- “जीनियस वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन।” कुछ लोगों की पसंद चार्ली चैपलिन भी थे।
थोड़ा आश्चर्य यह भी होता है कि कम लोगों की चाहत थी कि वह अपने समय की मशहूर अदाकारा मर्लिन मुनरो के साथ डिनर करें। आज की बात करें, तो दक्षिण एशियाई देशों के ज्यादातर लोगों ने सदी के शहंशाह अमिताभ बच्चन के साथ डिनर करने के मौके को अपना सौभाग्य कहा। आखिर क्या है डिनर का मनोविज्ञान?
कैसी हो अपनी डिनर पार्टी? दुनिया के बड़े-बड़े फैसले अगर डिनर पार्टियों में ही लिए गए हैं, तो इसकी वजह तो होगी। वजह तक जाने के लिए डिनर संस्कृति को समझने की जरूरत है, क्योंकि आप भी तो किसी-न-किसी को डिनर पार्टी पर बुलाते हैं।
इस सदी में स्वाद ने अपना संस्कार बदल लिया है। देश के किसी कोने की किसी अनजान-सी गली में जो पकता था, वह आपके यहां उबल रहा है। लेकिन खाना बनाने के कुछ सूत्र हैं, तो खाना परोसने के भी सलीके हैं। डिनर दिल में बसता है। रिश्ता पेट से होकर गुजरता है। लोगों से मेल-मुलाकात बढ़ाना हो, संबंधों में मजबूती लानी हो, तो एक पार्टी जरूरी है। कट-कट कर जिए, तो क्या जिए? ‘जरनल ऑफ मैरेज एंड फैमिली वेलफेयर’ में छपे एक शोध की मानें, तो जिन परिवारों में मेहमानों के साथ बैठकर खाने (डिनर) की परंपरा होती है, उस परिवार के सदस्यों के बीच अधिक सौहार्द्रपूर्ण वातावरण पाया जाता है।
वैसे अपने देश में डिनर पार्टियों का चलन कांग्रेस की प्रधानमंत्री के समय में तेजी से उभरा था। लेकिन इससे पहले आजादी की लड़ाई के दौरान माउंटबेटन ने गांधी और नेहरूजी को एक डिनर पार्टी में बुलाया था। नेहरूजी तो पाश्चात्य माहौल को पसंद करते थे, लेकिन उस डिनर पार्टी में गांधीजी ने अपने स्वदेशी स्टाइल में खाना खाया था, जिसकी बड़ी चर्चा हुई थी। राजनीति से अलग अगर हम सब अपनी-अपनी दुनिया को देखें, तो अपनी जिंदगी में भी ऐसी पार्टियों की जरूरत बनी हुई है। जरूरत इस बात की भी है कि सोशल लाइफ को हम अपने लाइफस्टाइल का हिस्सा बनाएं, क्योंकि रोटी, कपड़ा, मकान जैसी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के बीच छोटी-बड़ी डिनर पार्टियां हमें आगे कुछ अच्छा करने का रास्ता भी बताती हैं।