मासिक धर्म या माहवारी एक ऐसा विषय है जिस पर न लड़कियां खुलकर बात कर पाती हैं और न ही परंपरागत भारतीय समाज में आमतौर पर ऐसे विषयों पर बात करने की इजाज़त है।
इसी वजह से महिला स्वास्थ्य से जुड़े ऐसे अहम मुद्दों पर भी कई तरह की भ्रांतियां जन्म लेती हैं।
कुछ युवाओं ने इस विषय पर फ़िल्म और डॉक्यूमेंट्री के ज़रिए लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने का बीड़ा उठाया है।
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दिल्ली के अनीश बांगिया और श्रेय छाबड़ा के इसी विषय पर बनाए गए एक वीडियो ने यूट्यूब पर लोगों का ध्यान खींचा।
इसके अलग प्रस्तुतिकरण ने वीडियो को वायरल होने में मदद दी।
इसका विषय था, 'वॉट इफ़ बॉयज़ हेड पीरियड्स' (क्या होता अगर लड़कों को मासिक धर्म होता)।
वीडियो में कुछ युवकों से यही सवाल पूछा गया। कुछ जवाब मज़ाकिया किस्म के थे तो कुछ बेहद गंभीर।
बात तो करें
अनीश कहते हैं, ''इस बारे में बात करने का वीडियो भी एक तरीका है। हमारी कोशिश थी कि लोगों का ध्यान इस ओर कैसे खींचा जाए? इसके लिए ह्यूमर बहुत काम आता है।"
वो कहते हैं, "क्योंकि आजकल लोगों को जल्दी है तो वीडियो छोटा होना चाहिए। कम से कम मज़ाक में ही सही, पर लोग अब इसके बारे में बात तो करने लगे हैं।"
वहीं श्रेय छाबड़ा का कहना है, ''जब तक किसी मुद्दे पर बात नहीं करेंगे, आने वाली पीढ़ियों को वो बात कैसे समझ में आएगी। हमारे देश में मासिक धर्म के बारे में बात ही नहीं होती, इसलिए कई सामाजिक रूढ़ियां, पूर्वाग्रह और धारणाएं मासिक धर्म से जुड़ी हुई हैं।''
श्रेय बताते हैं, ''मैं तो कहूंगा कि अगर मर्दों को मासिक धर्म होता तो वो भी बच्चे पैदा कर सकते।''
'मुझे शर्म आती है'
देहरादून में रहने वाली स्वतंत्र फ़िल्म निर्माता-निर्देशक खुशबू दुआ इस विषय पर डॉक्यूमेंट्री बना रही हैं।
फ़िल्म बनाने की प्रक्रिया में उन्होंने रंगीला कुमारी नाम की एक किशोरी से सबसे पहले बात की।
रंगीला की मां घर-घर जाकर काम करती हैं और उनके पिता एक मज़दूर हैं।
रंगीला बताती है, "मेरे यहां मासिक धर्म के दौरान बार-बार नहाने का रिवाज़ है।"
उन्होंने बताया, ''हम उन दिनों मंदिर नहीं जाते, पूजा नहीं करते क्योंकि हमें अछूत माना जाता है।''
सौम्या शर्मा देहरादून के एक कॉलेज में पढ़ती हैं। सौम्या के लिए सैनिट्री पैड्स ख़रीदना आसान काम नहीं है।
वह कहती हैं, "मैं अपने लिए पैड्स नहीं लेती। मुझे शर्मिंदगी महसूस होती है। मैं मंदिर नहीं जाती। आचार नहीं छूती।"
मनाना पड़ा
खुशबू दुआ ने इस बारे में कई लड़कियों से बात की। लेकिन उनमें से अधिकतर को बात करने के लिए मनाना पड़ा और ये काम आसान नहीं था।
खुशबू बताती हैं, "लोग बात करने को तैयार नहीं थे। अगर लड़कियां तैयार हो भी जाती हैं तो उनके परिवार वाले नहीं मानते। वो कहते हैं कि जैसा चल रहा है उसे बदलने की क्या ज़रूरत है? मेरा ये कहना है कि जब कोई चीज़ प्रकृति ने खुद बनाई है तो शर्म कैसी?।"
इन युवाओं ने मासिक धर्म पर लोगों की झिझक दूर करने की कोशिश शुरू की है और उन्हें यक़ीन है कि इससे शायद एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है।