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विदेशी स्कूलों के किचन में भी हिट है पालक पनीर, स्वाद के दीवाने हुए बच्चे

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पालक पनीर की सब्जी के मुरीद अब विदेशी भी हो रहे हैं। - फोटो : अमर उजाला
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पालक पनीर की सब्जी के मुरीद केवल हम और आप नहीं है, बल्कि यह विदेशी किचन की भी पसंदीदा रेसीपी में से एक है। अबतक भारतीय रेस्तरांओं में पालक पनीर कीलोकप्रियता बढ़ी थी। लेकिन यूरोपीय देश स्वीडन के स्कूलों के मेन्यू में भी इसने जगह बना ली है। यहां के प्रीस्कूल यानी 1-6 वर्ष तक के बच्चों के डेकेयर में एशियाई व्यंजन के तौर पर इसे परोसा जाता है।

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दरअसल, इन स्कूलों में अलग-अलग देशों के लजीज व्यंजन बच्चों को खाने में दिए जाते हैं, ताकि रोजाना के भोजन में उन्हें दूसरे देशों का स्वाद भी मिल सके और बात जब स्वाद की हो तो भारतीय व्यंजनों को कैसे अनदेखा किया जा सकता है। 


 

पालक पनीर और चावल को मिड डे मील मेन्यू में शामिल किया गया है। - फोटो : फाइल फोटो
ऐसे ही एक स्कूल में जब मैंने पूछा की पालक पनीर और चावल को उन्होंने अपने मिड डे मील मेन्यू में क्यों शामिल किया है तो जवाब था कि यह स्वादिष्ट होने के साथ स्वास्थ्यकर भी है। यह शाकाहारी मेन्यू में अच्छा विकल्प है। यही नहीं पालक पनीर केवल भारतीय व्यंजन के रूप में नहीं पहचाना जाता, बल्कि लोकप्रिय एशियन फ़ूड में भी शुमार है।

विदेशी बच्चों के टेस्ट में आसानी से चढ़ने वाला एशियन मेन्यू है। इसी वजह से स्कूलों में इसे तरजीह मिल रही है। आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां के निजी और सरकारी दोनों तरह के प्री स्कूलों में अनिवार्य मिड डे मिल का प्रावधान है। 

यहां बच्चे और शिक्षक एक ही रसोई का भोजन करते हैं। - फोटो : फाइल फोटो
यहां के स्कूलों में बच्चे घर क़ा बना भोजन नहीं लाते, बल्कि बच्चे और शिक्षक दोनों स्कूल की रसोई में तैयार एक जैसा भोजन साथ-साथ करते हैं। रोजाना नौ से साढे़ नौ घंटे तक चलने वाले इन प्रीस्कूलों में भोजन वनाश्ते के साथ रोज़ सलाद , फल, जूस, दूध, दही, चीज, मक्खन, ब्रेड, जैसी चीज़ों की भी पर्याप्त व्यवस्था होती हैं।

दरअसल कामकाजी अभिभावक अपनी सुविधा केमुताबिक़ बच्चों को इन प्री स्कूलों में रखते हैं। वे अपने दफ्तर और कामकाज को देखते हुए अधिकतम नौ-साढ़े नौ घंटे तक बच्चों को यहां छोड़ सकते हैं। इस दौरान वे इस बात से निश्चिंत होते हैं कि यहां बच्चों को मिलने वाला भोजन  स्वास्थ्यवर्धक, स्वच्छ और स्वादिष्ट होगा।

प्राइवेट हो या सरकारी सभी प्रीस्कूलों में बच्चों के लिए रोज़ानानिःशुल्क भोजन के साथ साथ मनोरंजन, खेल, विश्राम करने और मुफ़्त डायपर (हाईजीन) की व्यवस्था है, इसलिए यहां डेकेयर को छोटे बच्चों का सेकेंड होम भी माना जाता है। बच्चों पर पढ़ाई का दबाव नहीं होता, उन्हें खेलने-खाने के साथ  शिष्टाचार,आचरण और रुचिकर चीज़ों की जानकारी लेने के लिए प्रेणित किया जाता है। 

 
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यहां फूड क्वालिटी चेक होने के बाद खाने-पीने का कोई सामान अंदर आता है। - फोटो : फाइल फोटो
यहां एक अद्भुत नजारा यह भी आपको देखने को मिलेगा कि ग़रीब और अमीर के बच्चे बिना किसी भेदभाव के एक साथ पढ़ते और भोजन करते हैं।

दरअसल हर इलाके के स्कूलों में एक जैसे प्रावधान हैं। इलाके के नजदीकी स्कूलों में आसपास के छोटे बच्चों के दाखिले में प्राथमिकता मिलती है। इसके कारण उस इलाक़े के धनाढ़्य वर्ग के बच्चे और सामान्य व निम्न आयवर्ग वाले परिवार के बच्चे एक साथ एक ही स्कूल में पढ़ते -खेलते नजर आते हैं। इन स्कूलों की रसोई भी कोई आम रसोई नहीं होती बल्कि वहां फूड क्वालिटी चेक होने के बाद खाने-पीने का कोई सामान अंदर आता है।

यही नहीं खाना पकाने वाले रसोइए भी पेशेवर होते हैं। ये बच्चों के लिए पौष्टिक, उर्जा से भरपूर और स्वादिष्ट भोजन बनाने में दक्ष होते हैं। स्वीडन के स्कूलों में बच्चों के लिए मुफ़्त भोजन की व्यवस्था दशकों पुरानी है। यहां अनुमानित तौर पर सलाना 260 मिलियन मीलस्कूलों में परोसा जाता है।

म्युनिसिपल्टी की यह ज़िम्मेदारी होती है कि वह सभी स्कूलों में भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित करे। ज़्यादातर स्कूलों में ख़ुद के किचन हैं, जहां किचन नहीं हैं वहां के लिए म्यूनिसिपलटी की ओर से सेंट्रलाइज्ड किचन की व्यवस्था की जाती है। जहां से सभी स्कूलों में नाश्ते व खाने की व्यवस्था हो सके। 
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