एक समय था, जब घरों में ही तैयार ताजे फलों और फूलों का शरबत झुलसाने वाली गर्मी में तन और मन को राहत देता था। उन शरबतों को बनाना एक परंपरा थी और जानकार लोगों की पूछ आज के ‘विशेषज्ञों’ की तरह ही होती थी।
ठंडा मतलब बोतलबंद ‘कोला’ वाला नारा बुलंद करने वालों को उन स्वदेशी पेयों की याद कहां? और कैसे आ सकती है भला? जो कुछ ही बरस पहले तक घर पर ही बनाए-पिलाए जाते थे, तन-मन को शीतल करने के लिए। आज तो आम का पन्ना भी बाजार में उपलब्ध है। आम का पन्ना हो या नींबू पानी आजकल बाजार से खरीद कर लाया जाने लगा है- ‘टेट्रापैक’ की ईंट में बिकने वाले ‘ताजा’ फलों के रस की तरह। दो पीढ़ी पहले तक झुलसाने वाली गर्मी के प्रकोप से बचने के लिए मौसमी फलों से बनने वाले शरबतों का चलन था।
जिनमें हरेक का रंग, स्वाद तथा गंध भिन्न ही नहीं होते थे, इनकी तासीर में भी अंतर होता था। अपनी रुचि और जरूरत के मुताबिक, इनका इस्तेमाल होता था। संतरे का नारंगी, फालसे का हल्का गुलाबी, जामुन का कुछ बैंगनी, बेल का पीला, तो आम या आमला का हरा शरबत ललचाते थे। लीची का शरबत सादी सफेदी के बावजूद ठंडक पहुंचाने में अपने रंगीन बिरादरों से पीछे नहीं रहता था। तांबे या किसी और धातु के प्याले में पेश किया जाने वाला शरबत हाथ में पहुंचते ही मन को प्रफुल्लित करता था।
फूलों से बनाए जाने वाले शरबतों में गुलाब, गुड़हल आम थे, तो कुछ पारंपरिक नुस्खों का अनुसरण करने वाले रूहअफजा जैसे शरबत फलों तथा सब्जियों का मिश्रण होते थे। खस की जड़ और चंदन की लकड़ी भी ‘चांदनी तथा मोती या ओस की बूंदों की तरह ठंडक पहुंचाने वाले समझे जाते थे। विडंबना यह है कि आज ‘स्ट्रॉबेरी’, ‘ऑरेंज’ या ‘मैंगो’ तथा ‘पाइनेप्पल’ फलों के ‘स्क्वैश’ पीने वाले अपने देशी शरबतों को लगभग पूरी तरह भूल चुके हैं।
जो शरबत घर पर तैयार किए जाते थे, वे फलों के कुदरती खट्ठे, मीठे या कसैले जायके को बचाए रखते थे। किसी तरह के कृत्रिम रंग या रासायनिक संरक्षक का प्रयोग नहीं किया जाता था। जो बात अटपटी लगती है, वह यह कि शरबत बनाना काफी सरल है और इसके संदर्भ में यह शिकायत करना गलत है कि यह प्रक्रिया जटिल है या इसमें बहुत समय लगता है। एक अन्य क्लेशदायक बात यह है कि फालसा या जामुन जैसे फलों का मौसम दो-तीन हफ्ते का ही होता है। बेल भी साल भर नजर नहीं आता। यह अगर आज लुप्तप्राय है, तो इसका मुख्य कारण इनका घरों पर न बनाया जाना ही है।
शरबत शब्द तुर्की और अरबी भाषा के शार्बियत का बदला रूप है, जिसका अर्थ होता है ‘पेय’। खानपान के जानकारों का मानना है कि भारत में यह फारस (प्राचीन ईरान) के पुल को पार कर पहुंचा। ईरान में ही फलों के रस को कुटी बर्फ के साथ मिलाकर पिघली आइसक्रीम सरीखा एक शरबती पेय लोकप्रिय है, जिसका विकास तरह-तरह के शरबतों में हुआ। रेशम राजमार्ग पर सौदागरों के काफिलों ने इसे पूरब तथा पश्चिम की दिशा में फैलाया।
फ्रांस में व्यंजनों की लंबी श्रृंखला के बीच मुंह का जायका बदलने या साफ करने के लिए जिस ‘शोरबे’ का प्रयोग किया जाता है, वह शरबत का ही अपभ्रंश है। मिस्र में फलों का शरबत पानी में नहीं, ठंडे दूध की मदद से तैयार किया जाता है। तुर्की में बाजार में शरबत बेचने वाले भिश्ती की मशक जैसे टोंटी लगे पात्र को पीठ पर लाद ग्राहकों की प्यास बुझाते हैं, इसे धातु के चौड़े मुंह वाले प्यालों में ढाल कर!