डॉक्टरों ने एचआईवी के 12 मरीजों की प्रतिरोधक प्रणाली यानी उनकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए जीन थैरेपी का इस्तेमाल किया है और इसके नतीजे काफी उत्साहजनक हैं।
ऐसे में इस बात संभावना बढ़ गई है कि मरीजों को एचआईवी के संक्रमण पर काब़ू पाने के लिए रोज़ाना दवा लेने की ज़रूरत न पड़े।
एचआईवी या ह्युमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस से एड्स नाम की बीमारी होती है, जो शरीर में रोग से लड़ने की क्षमता को कम या ख़त्म कर देती है।
जीन थैरेपी के दौरान मरीज़ की श्वेत रक्त कोशिकाओं को उनके शरीर से निकाल कर उनमें क्लिक करें एचआईवी प्रतिरोधक क्षमता विकसित की गई और उन्हें दोबारा शरीर में डाल दिया गया।
न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक छोटे अध्ययन में कहा गया है कि यह तकनीक पूरी तरह से सुरक्षित है।
टी-सेल में बदलाव
अध्ययन में बताया गया है कि कुछ लोग बेहद दुर्लभ म्यूटेशन या कोशिकाओं में होने वाले परिवर्तन वाले होते हैं, जो उन्हें एचआईवी से बचाता है।
म्यूटेशन के तहत प्रतिरोधक प्रणाली के तहत आने वाले टी-सेल की संरचना में बदलाव आता है और वायरस भीतर दाखि़ल नहीं हो पाते हैं और अपनी संख्या को बढ़ा नहीं पाते हैं।
टिमोथी रे ब्राउन ऐसे पहले व्यक्ति हैं, जो एचआईवी से मुक़ाबला करने में कामयाब रहे और उनकी सेहत में सुधार हुआ। ल्यूकिमिया ट्रीटमेंट के दौरान उनकी प्रतिरोधक प्रणाली काफ़ी कमज़ोर हो गई थी और फिर म्यूटेशन के ज़रिए किसी दूसरे व्यक्ति की मदद से वो इसे वापस पा सके।
अब पेंसिलवेनिया यूनीवर्सिटी में शोधकर्ता बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए मरीज की प्रतिरोधक क्षमता का इस्तेमाल कर रहे हैं।
इसके तहत ख़ून से लाखों टी-सेल लिए गए और प्रयोगशाला में उनकी संख्या को अरबों तक बढ़ा दिया गया।
उम्मीद की रोशनी
चिकित्सकों ने टी-सेल के अंदर डीएनए का संपादन किया ताकि उनमें शील्डिंग म्यूटेशन का विकास किया जा सके। इसे सीसीआर5-डेल्टा-32 के नाम से भी जाना जाता है।
इसके बाद क़रीब दर अरब कोशिकाओं को दोबारा शरीर में डाला गया, हालांकि करीब 20 प्रतिशत कोशिकाएं ही सफलता के साथ संशोधित हो सकीं।
इसके बाद जब मरीज को चार सप्ताह तक दवा नहीं दी गई तो ये पाया गया कि शरीर में असंरक्षित टी-सेल की संख्या तो तेजी से घटी, लेकिन संशोधित टी-सेल टिकाऊ साबित हुईं और कई महीने बाद तक खून में बनी रहीं।
पेंसिलवेनिया यूनीवर्सिटी में क्लीनिकल सेल एंड वैक्सीन प्रोडक्शन फैसिलिटी के निदेशक प्रोफेसल ब्रूस लेविन ने बीबीसी को बताया, "यह पहली पीढ़ी का संपादन है जिसका प्रयोग अब से पहले कभी भी इंसानों पर नहीं किया गया था।"
उन्होंने बताया, "हम इस तकनीक का इस्तेमाल क्लिक करें एचआईवी में कर सके हैं और नतीजों से पता चलता है कि ये सुरक्षित और व्यवहारिक है। इससे एचआईवी के इलाज में काफी मदद मिलेगी।"