बरसात के मौसम में अदरक वाली गर्म चाय के साथ पकौड़े किसे पसंद नहीं? उन पकौड़ों का बेस भी बेसन ही तो है, लेकिन बेसन सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। देश के किसी भी कोने में जाएं, तो इसके कई रूप देखने को मिलेंगे। कहीं, गट्टे का आनंद मिलेगा, तो कहीं बेसन की बर्फी का।
पुरानी कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर उसी चने की संतान बेसन अकेले कितने गुल खिलाता है, इसकी हम आसानी से कल्पना भी नहीं कर सकते। भारतीय, खासकर उत्तर भारतीय खानपान में उसका खास साम्राज्य पंजाब से लेकर बिहार और बंगाल तक फैला है, तो उत्तराखंड तथा उत्तर प्रदेश को भी समेटता है। इनकी कल्पना बेसन के बिना असंभव है। यही बात कढ़ी के बारे में कही जा सकती है। इसके तमाम क्षेत्रीय अवतार भी बेसन की ही सौगात हैं-सिंधी, गुजराती, उड़िया या हिंदी पट्टी। राजस्थानी खाटा भी बेसन से तैयार होता है।
राजस्थान में जो गट्टे की सब्जी नायाब समझी जाती है, उसके लिए बेसन अनिवार्य है। गट्टे चाहे तलकर खाए जा रहे हों या भाप से नरम बनाकर, बेसन बिना गट्टे की सब्जी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। इसके अलावा जैन संप्रदाय में कई लोग अनेक सब्जियों से परहेज करते हैं। उनके लिए उन सब्जियों का विकल्प बेसन ही है, जिससे कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। गुजराती सेव की सब्जी का मजा भी बेसनी ही होता है। इसी प्रदेश में नाश्ते में फरसाण नाम से चबैने के जो बहुत सारे व्यंजन खाए-खिलाए जाते हैं, फाफड़ा, ढोकला, गांठिये सरीखे, वह सब भी बेसन से ही बनाए जाते हैं। सेव भावनगर की हो या रतलाम की, बीकानेर की भुजिया की तरह बेसन की बुनियाद पर ही टिकी रहती है।
यह न समझें कि बेसन की जुगलबंदी नमक के साथ ही सुहाती है। बूंदी का लड्डू, खमीर उठाए बेसनी बक्खर की वजह से इतराती जलेबी और बेसन की बर्फी सिर्फ कुछ चुनिंदा उदाहरण हैं। यों दक्षिण भारत में बेसन की जगह चावल का आटा ज्यादा इस्तेमाल होता है, पर कर्नाटक के मैसूर पाक की त्रिवेणी बेसन, घी और चीनी के संगम से सजती है। बेसन की बर्फी का परिष्कृत रूप सेव की बर्फी है।
बेसन और चने के सत्तू का फर्क समझना उतना ही जरूरी है जितना बेसन से बने और पिसी चने की दाल से बने व्यंजनों का। कुछ मांसाहारी कबाबों और शाकाहारी कोफ्तों को बांधने के लिए भी बेसन को सूखा या उसका घोल बनाकर इस्तेमाल किया जाता है।
पारंपरिक विधि के अनुसार, भले ही आटे में दाल को सानकर परांठे बनाए जाते रहे हों, लेकिन आजकल झटपट प्रणाली में बेसन का ही उपयोग होता है। नमकीन बूंदी का नाममात्र का प्रयोग भी आम रायते को खास बना देता है। नाश्ते के वक्त आप बेसन का आनंद स्वादिष्ट चीले के रूप में ले सकते हैं।
बेसन की तासीर ठंडी समझी जाती है और यह सुवासित और पौष्टिक होने के कारण ग्रीष्म ऋतु में लाभदायक समझा जाता है। खानपान के जानकारों का मानना है कि भारत में बेसन का इस्तेमाल हजारों साल से गोता मार रहा है। वैदिक साहित्य में जिस चणक का उल्लेख मिलता है, वह चना ही तो है। बेसन की उबटन त्वचा और केशों के लिए फायदेमंद बतलाई गई है। यह तो हुई घरेलू नुस्खों की बात। आधुनिक चिकित्सा पद्धति वाले डॉक्टर भी हृदय रोग, रक्तचाप और मधुमेह के पीड़ितों को बेसन के उपयोग की सलाह देने लगे हैं।
जो लोग बेसन से नाहक परहेज करते हैं, उन्हें यह समझने की दरकार है कि परेशानी बेसन की वजह से नहीं, अति से होती है। पकौड़ों से जो अपच होती है, वह तेल में तलने से होती है। बेचारे बेसन को दोष न दें। यह बात भी कम दिलचस्प नहीं कि भारत के बाहर बेसन का प्रयोग देखने को नहीं मिलता। जापानी पकौड़े सरीखे टेंपुरा के लिए चावल के आटे का इस्तेमाल करते हैं। पश्चिम में तले प्रैट्जल या फ्रिटर्स बनाने के लिए मकई के आटे का इस्तेमाल होता है।