हार्ट, मधुमेह और कोलस्ट्रॉल के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाएं मांसपेशियों और नसों को कमजोर कर रही हैं। ऐसे में चिकित्सकों को एलर्ट रहना चाहिए। उनकी लापरवाही का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ सकता है। यदि मरीज मांसपेशियों या नसों में दर्द की शिकायत कर रहा है तो उसका ब्लड टेस्ट कराना चाहिए।
साथ ही यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि किसी दवा के चलते तो उसकी मांसपेशियां और नसें कमजोर नहीं हो रहीं। अगर ऐसा हो तो उन दवाओं के कम इस्तेमाल की सलाह दी जाना चाहिए।
यह कहना है कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के केक स्कूल आफ मेडिसिन आफ यूएससी के प्रो. एसके मिश्रा का। शुक्रवार को बीएचयू के न्यूरोलाजी विभाग में अंतरराष्ट्रीय न्यूरो मस्कुलर सम्मेलन में भाग लेने आए प्रो. मिश्रा ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में बताया कि अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में पिछले साल हुए शोध से पता चला है कि हार्ट, मधुमेह और कोलस्ट्रॉल की बीमारियों का इलाज करने वाले 25 प्रतिशत मरीजों की मांसपेशियां और नसें दवा के चलते कमजोर हो गई थीं।
बाद में इन मरीजों को न्यूरोलॉजी से संबंधित बीमारियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि भारत में भी ऐसी ही स्थिति है। यहां भी शोध और सर्वे का काम होना चाहिए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि मांसपेशियों में दर्द हो तो उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि कुछ बीमारियों के उपचार में दी जाने वाली दवाएं मांसपेशियों में सूजन पैदा कर देती हैं। प्रो. मिश्र ने कहा कि मांसपेशियों और नसों की बीमारी वंशानुगत भी होती है लेकिन यह कम लोगों में पाई जाती है।
उधर, बीएचयू के न्यूरोलाजी विभाग में आयोजित सेमिनार में भी प्रो. मिश्रा ने चिकित्सकों को ऐसे ही सुझाव दिए। सम्मेलन में प्रो. दीपिका जोशी, डा. आरएस चौरसिया, प्रो. मधुकर राय समेत काफी संख्या में न्यूरोलाजी और मेडिसिन विभाग के डॉक्टर शामिल हुए। संचालन डॉ. वी.एन. मिश्रा ने किया।