विश्व में अस्थमा के बारे में जागरूकता प्रसारित करने के लिए समर्पित दिवस है। यह दिवस प्रतिवर्ष मई महीने के पहले मंगलवार को मनाया जाता है। बढ़ते कल कारखाने, जंगलों की कटाई और प्रदूषण...। विश्व में बढ़ रहे दमा के रोगियों के लिए ये सबसे अहम वजह बनती जा रही है। इसके चलते हवा की शुद्धता कम होती जा रही है और लोगों का सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है।
इसका नतीजा सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग के तौर पर हमारे सामने नहीं है, बल्कि विश्व में दमा के रोगी भी वायुमंडल में होने वाली ऑक्सीजन की कमी के चलते बढ़ रहे हैं। यही वजह है कि इस साल विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व अस्थमा दिवस की थीम भी ‘अस्थमा : बेटर एयर बेटर ब्रीदिंग’ रखी है।
बीएचयू के चेस्ट विभाग के प्रो. जीएन श्रीवास्तव ने बताते हैं कि मौजूदा वक्त में 15-20 मीलियन दमा के मरीज हिंदुस्तान में है और इसमें 15 प्रतिशत मरीजों की संख्या बच्चों की है। इसके अलावा बदलती जीवन शैली भी युवाओं को इस बीमारी की ओर ढकेल रही है।
स्मोकिंग के चलते ही अस्थमा के मरीज बढ़ रहे हैं। एलर्जी के कारण ये बीमारी बढ़ती है। ठंडा गर्म, धूल, धुआं, तापमान में एकाएक बदलाव के कारण ये बीमारी बढ़ती है। मरीजों को इससे बचना चाहिए।
एक ओर जहां वायुमंडल में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है, वहीं घर में भी धूल और गर्द, पालतू जानवरों, पेंट वगैरह से भी एलर्जी होने के कारण ये बीमारी बढ़ रही है। हर सांस का फूलना दमा नहीं होता लेकिन अगर किसी को दमा रोग है तो उसकी सांस फूलती ही है।
सीने में जकड़न, सांस लेने में परेशानी होना, ये इस बीमारी के आम लक्षण हैं। अस्थमा को नियंत्रित करने में दवा का नियमित सेवन जरूरी है। इसके अलावा इंहेलर थेरेपी सही ढंग से लेना भी जरूरी है।