भारतीय संगीत की अनुपम धरोहर को उन्नत बनाने में संगीतकारों के महान योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता है।
भारत में उत्तरी संगीत एवं दक्षिणी संगीत कर्नाटक शैली प्रचलन में रही हैं। संगीत को शास्त्रीय संगीत,उपशास्त्रीय संगीत और सुगम संगीत तीन भागों में विभक्त किया गया हैं। उपशास्त्रीय संगीत में ठुमरी,कजरी, टप्पा एवं डोरी आते हैं।सुगम संगीत में भजन,भारतीय फिल्मी गीत,गज़ल, पॉप संगीत एवं लोक संगीत को स्थान दिया गया हैं।भारतीय संगीत सात स्वरों सा, रे, ग, म, प, ध, नि के मेल से बना हैं। इनके प्रभाव से उत्पन्न संगीत मन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
भारतीय संगीत की अनुपम धरोहर को उन्नत बनाने में संगीतकारों के महान योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता है। नौशाद, शंकर-जयकिशन,मनमोहन,रवि, सी.रामचंद्र, खय्याम, ए.आर.रहमान, राजेश रोशन, अनिल विश्वास जैसे अनेक ख्यातिनाम संगीतकारों का भारतीय संगीत को नई ऊंचाइयां देने में उल्लेखनीय योगदान रहा।
सदाबहार नगमों की बात करें तो लता मंगेशकर, आशा भौंसले, मुकेश, महेंद्र कपूर, मोहम्मद रफी, मन्नाडे और किशोर कुमार ने बरसों दिलों पर राज किया और इनके गीतों का जादू आज भी कायम है। इनके बाद अलका याग्निक, कुमार सानू, सोनू निगम, कविता कृष्णमूर्ति ने भी 90 के दशक में अपने गीतों की गायकी का खूब रंग जमाया।
आगे के दौर में अरिजीत सिंह, आतिफ,अरमान मलिक एवं श्रेया घोषाल की आवाज युवा दिलों पर छा गई। इन प्रमुख संगीतकारों के साथ-साथ अन्य संगीतकारों ने भी संगीत को समुन्नत बनाया। भीमसेन जोशी,रवि शंकर,डी.के.पट्टममाल, तंजावुर वृंदा एवं पवन सिंह ऐसे सुविख्यात नाम हैं जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को सहेजने और गर्वित बनाने में अपना चिरस्मरणीय योगदान दिया।
संगीत प्रेमियों एवं संगीतज्ञों के लिए यह गर्व का विषय है कि प्रतिवर्ष योग दिवस के साथ-साथ 21 मई 1982 से फ्रांस में कई गई घोषणा के मुताबिक विश्व में विश्व संगीत दिवस भी मनाया जाता है। विश्व में संगीत महोत्सव के आयोजन कर गीत, संगीत, नृत्य, संगीतज्ञों को प्रोत्साहन देना हैं।
भारत में कुरूक्षेत्र का अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव, खजुराहो महोत्सव, कोणार्क महोत्सव, राजस्थान के करीब एक दर्जन से अधिक महोत्सव तथा अन्य राज्यों के आयोजित किए जाने वाले महोत्सव विश्व संगीत दिवस की उपादेयता को प्रतिपादित करते हैं।
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