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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2024: भारी पड़ सकता है काम का तनाव, बढ़ रहे हैं ऑक्यूपेशनल डेथ के मामले

सार

भारत में हाल के दिनों में ऑफिस और फक्ट्रियों के कर्मचारियों पर काम के दबाव के कारण मौत के कई मामले सामने आए हैं। रिसर्च में खुलासा हुआ है कि ज्यादातर युवाओं की मौतें वर्क लोड की वजह से हुई हैं, इसे डॉक्टर ऑक्यूपेशनल डेथ कहते हैं। ये मौतें काम करते-करते हुई हैं। इनको वर्क रिलेटेड डेथ ट्रीट किया जाना चाहिए इनको मुआवजा मिलनी चाहिए।
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स्ट्रेस की समस्या - फोटो : Freepik.com
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विस्तार
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पिछले दिनों लखनऊ में एचडीएफसी बैंक में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी (45 वर्षीय सदफ फातिमा) की वर्क प्रेशर के चलते जान चली गई। इसके पहले पुणे में 'अर्न्स्ट एंड यंग'  में काम करने वाली एक युवा सीए 26 साल की ऐना सेबेस्टियन पेरायिल की वर्क प्रेशर के चलते मौत हो गई थी। इन दोनों ही घटनाओं ने एक बार फिर से भारत में वर्किंग आवर और वर्क लाइफ बैलेंस को लेकर बहस छेड़ दी है।

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सिर्फ 4 महीने की नौकरी में पुणे की ऐना सेबेस्टियन पर काम का इतना बोझ पड़ गया कि उसकी जान चली गई। वहीं, एचडीएफसी बैंक में काम करने वाली फातिमा कुर्सी पर बैठ-बैठे गिरी तो कभी नहीं उठी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत में ऑक्यूपेशनल डेथ के आंकड़े आने वाले दिनों में और बढ़ेंगे।  

ऐना और फातिमा की मौत के बाद देश में वर्क प्रेशर को लेकर बहस और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक दलों के साथ-साथ बड़े-बड़े डॉक्टरों ने भी सरकार को चेताया है। डॉक्टरों की मानें तो भारत में ओवरवर्क का ट्रेंड बेहद कॉमन है।
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भारत में हाल के दिनों में ऑफिस और फक्ट्रियों के कर्मचारियों पर काम के दबाव के कारण मौत के कई मामले सामने आए हैं। रिसर्च में खुलासा हुआ है कि ज्यादातर युवाओं की मौतें वर्क लोड की वजह से हुई हैं, इसे डॉक्टर ऑक्यूपेशनल डेथ कहते हैं। ये मौतें काम करते-करते हुई हैं। इनको वर्क रिलेटेड डेथ ट्रीट किया जाना चाहिए इनको मुआवजा मिलनी चाहिए। आने वाले दिनों में भारत विकसित देश बनेगा तो कंपनियां और फैक्ट्रियों में इस तरह की घटनाएं और बढ़ेंगी. इसलिए भारत सरकार को इसके लिए तुरंत ही कानून लाना चाहिए ।


जापान में पहली ऑक्यूपेशनल डेथ

जापान में इस तरह की पहली  मौत हुई थी , साल 1969 जापान में एक 29 साल का लड़का न्यूज पेपर के शिपिंग डिपार्टमेंट में काम करते-करते मर गया था। उस लड़के के मरने के बाद उसकी पत्नी ने कंपनी से मुआवजा मांगा। कंपनी ने मुआवजा नहीं दिया तो इसको लेकर एसोसिएशन बना। धीरे-धीरे कई और लोग भी सामने आए, इसके बाद यह मांग पश्चिम के देशों में भी उठने लगी। इसके बाद एक डेथ ड्यूटू ओवर वर्क एसोसिशन बना।

बाद में डब्ल्यूएचओ ने भी माना कि लॉन्ग वर्किंग आवर्स की वजह से दुनिया में 60 लाख से ज्यादा लोग हर साल मरते हैं. यहां तक डेथ ड्यू टू ओवर वर्क में कोई शख्स सुसाइड करता है तो भी उसके परिवारवालों को अब जापान में मुआवजा मिलता है।

साल 2014 में जापान की सरकार एक एक्टलेकर आई, जिसे करोशी एक्ट कहते हैं। इस एक्ट के तहत वर्क रिलेटेड डेथ ऑक्यूपेशनल डेथ को लेकर कई सारी गाइडलाइंस हैं, जिसे वहां की कंपनियां फॉलो करती हैं। जैसे साल 2018 के बाद जापान ने ओवरटाइम घंटों को सीमित कर दिया। एक वर्कर महीने में 45 घंटे सेज्यादा और साल में 360 घंटे तक ही ओवरटाइम कर सकता है।

भारत में वैसे तो वर्किंग आवर 8 से 9 घंटे का होता है। इस तरह लोग हर हफ्ते 45 से 48 घंटे काम करते हैं। हालांकि, कुछ कंपनियों में लोगों को वर्किंग आवर के बाद भी काम करना पड़ता है। इसकी वजह से ना सिर्फ उनकी शारीरिक स्थिति पर असर पड़ता है, बल्कि काम के दबाव के चलते मानसिक तौर पर भी कर्मचारी कमजोर हो जाता है। हालांकि, दुनिया के कुछ ऐसे भी मुल्क हैं, जहां वर्क लाइफ बैलेंस काफी ज्यादा अच्छा है। वहां लोग हफ्ते में 30 घंटे या उससे भी कम काम करते हैं।

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तनाव का बढ़ता खतरा - फोटो : freepik.com

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रशांत महासागर में स्थित वनातू नाम के देश में सबसे कम घंटे तक लोग काम करते हैं। रिपोर्ट तैयार करने के लिए जितने भी देशों में सर्वे किया गया है, उसमें वनातू में सबसे कम वर्किंग ऑवर देखा गया है। यहां एक कर्मचारी हर हफ्ते सिर्फ 24.7 घंटे काम करता है। वनातू की सिर्फ 4 फीसदी आबादी ही हफ्ते में 49 घंटे या उससे ज्यादा काम करती है।

वनातू के बाद दूसरे नंबर पर प्रशांत महासागर में ही मौजूद एक और देश है, जिसका नाम किरिबाती है। यहां पर एक कर्मचारी हर हफ्ते औसतन 27.3 घंटे काम करता है। हैरानी की बात ये है कि भारत सबसे कम वर्किंग आवर वाले देशों में टॉप 20 में भी शामिल नहीं है। भारत की 51 फीसदी वर्कफोर्स हर हफ्ते 49 घंटे या उससे ज्यादा काम करती है। इसकी वजह से भारत दुनिया में सबसे ज्यादा घंटों तक काम करने वाले मुल्कों में दूसरे स्थान पर है।

वर्क लाइफ बैलेंस  महत्वपूर्ण

ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में प्रोफेशनल्स के लिए राइट टू डिसकनेक्ट की घोषणा की थी इसका साफ मतलब है कि ऑफिस के घंटे पूरे हो जाने के बाद प्रोफेशनल्स के लिए बॉस की कॉल रिसीव करना जरूरी नहीं माना जाएगा।वह चाहें तो उस कॉल को इग्नोर कर सकते हैं. ऐसा कई जगहों पर होता है। 

इससे पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ के बीच में लिमिट तय करना आसान हो जाता है। काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करें. ऑफिस और पर्सनल लाइफ में अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करें।घर और ऑफिस, दोनों जगहों पर टाइम मैनेजमेंट के लिए शेड्यूल बनाएं. फिजिकल और मेंटल हेल्थ और फिटनेस का ख्याल रखें।

कंपनियों के जबरन ओवरटाइम के ऑर्डर से पेशेवर लोगों के वर्क-लाइफ बैलेंस पर गहरा असर पड़ रहा है। यही वजह है कि, कर्मचारी कार्यालय में अत्यधिक घंटे देने के बजाय अपने निजी जीवन को प्राथमिकता देना पसंद करते हैं। इन दिनों एक्स पर एक वायरल पोस्ट पर  बहस छिड़ गई है। जिसमें, रोना वांग नामक यूजर ने शेयर किया।

वे लिखती हैं कि, 'माइक्रोसॉफ्ट में काम करने वाले अपने दोस्त से बात कर रही हूं और जाहिर तौर पर वह हफ़्ते में 15-20 घंटे काम करता है और बाकी समय लीग खेलता है और इसके लिए उसे 300k डॉलर मिलते हैं।'

हाल ही में, गूगल के सिंगापुर कार्यालय में एक कॉर्पोरेट कर्मचारी का वीडियो भी वायरल हुआ। सिंगापुर में काम करने वाली एक कोरियन यूजर ने अपने फॉलोवर्स को गूगल के प्रभावशाली ऑफिस में काम करने के अपने जीवन के एक दिन के बारे में बताया।

ऑफिस से भी मिल सकती है मदद

हर एंप्लॉई वर्क लाइफ बैलेंस कर पा रहा है या नहीं, इसकी जिम्मेदारी कंपनियों के हाथ में भी होनी चाहिए। इससे एंप्लॉइज अपनी बेस्ट परफॉर्मेंस दे पाएंगे। वर्कप्लेस पर सभी के लिए साइकोलॉजिकल सपोर्ट सेंटर उपलब्ध होने चाहिए. इससे लोग कोई भी परेशानी होने पर साइकोलॉजिस्ट से कंसल्ट कर सकते हैं। तनाव भरे माहौल में काम करने से प्रोडक्टिविटी और मेंटल हेल्थ, दोनों को नुकसान पहुंचता है, इसलिए एम्प्लॉइज और बॉस के बीच रेगुलर मीटिंग होनी चाहिए. इससे अपनी बात को खुलकर रख पाएंगे। कंपनी में नए एंप्लॉइज के लिए मेंटरशिप प्रोग्राम होना चाहिए. इसमें उन्हें सीखने और बढ़ने के लिए एक मंच भी दिया जा सकता है. उन्हें पता होना चाहिए कि परेशानी के समय किससे संपर्क करना है।

भारत में जितनी भी कंपनियां हैं या फैक्ट्री हैं, सभी श्रम संसाधन मंत्रालय के अंदर आती है, खासकर आईटी और मीडिया कंपनियों में डबल वर्क करने पर ज्यादा मौतें हो रही हैं। ये कंपनियां घर में भी डबल वर्क लेती है, जबकि, लेबर मीनिस्ट्री की गाइडलाइंस है कि जिस कंपनी या फैक्ट्री मंस 500 कर्मचारी रहते हैं वहां पर ऑक्यूपेशनल हेल्थ सेंटर होने चाहिए. एक डॉक्टर, एक सेफ्टी ऑफिसर, एक ऑक्यूपेशनल हाईजिनिस्ट होना चाहिए। अगर किसी को हार्ट से संबंधित समस्या आती है तो ये तुरंत उसका इलाज करते हैं। 

इसके साथ फैक्ट्री में अलग-अलग इश्यू हैं, इनका काम होता है कि इन वर्कर्स में अवेयरनेस लाए.लेकिन, भारत में अभी तक ऑक्यूपेशनल हेल्थ सेंटर 5 प्रतिशत भी कंपनियों और फैक्ट्रियों में नहीं है. सच बात यह है कि  भारत में  डॉक्टरों को ऐसी स्थिति से निपटने के लिए ट्रेंड नहीं  किया जाता ह।    

कार्यस्थल पर बढ़ता वर्क प्रेशर  

ऐना की असमय मौत से बहुत लोगों को धक्का लगा है और इसने अधिकांश कॉर्पोरेट और स्टार्ट-अप्स में बढ़ावा दिए जाने वाले ‘हसल कल्चर’ को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है, जिसमें कर्मचारियों को उत्पादकता बढ़ाने के लिए अक्सर अपनी सेहत की क़ीमत पर भी काम करने पर ज़ोर दिया जाता है।

पिछले साल देश की उत्पादकता बढ़ाने के लिए  सप्ताह में 70 घंटे काम करने का सुझाव देने  को लेकर इन्फ़ोसिस के सह संस्थापक नारायण मूर्ति की काफ़ी आलोचना हुई थी।  इस पर संसद में भी चर्चा हुई थी। ताजा बहस के बीच माइक्रोसॉफ्ट चर्चा में है ,जहां के कर्मचारी सप्ताह में मात्र 15-20 घंटे ही काम करतें हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार काम से जुड़ी समस्याओं से भारतीयों में आत्महत्या की दर दो दशकों में 2.4  गुना बढ़ी है। डब्ल्यूएचओ और आईएलओम की रिपोर्ट के अनुसार ,लम्बे समय तक काम करने से हृदय रोग और स्ट्रोक से होने वाली मौतें बढ़ रहीं हैं।
 
आपके मानसिक स्वास्थ्य पर आपके काम का तनाव भरी पड़ सकता है। कई बार लोग काम की चिंता, कार्यस्थल के प्रदर्शन और नौकरी में मन न लगने के कारण मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। दरअसल आप जिस जगह पर काम या नौकरी कर रहे हैं वहां पर तनाव के कई कारण हो सकते हैं लेकिन कभी-कभी यह स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है और इसकी वजह से लोग मानसिक समस्याओं का शिकार भी बन जाते हैं। कुछ दिनों पहले हुए एक शोध के मुताबिक 50 प्रतिशत से अधिक लोग अपने काम या नौकरी से संतुष्ट नहीं हैं या फिर वे काम की चिंता यानि वर्क एंग्जायटी  से ग्रसित होते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार अगर आप काम को लेकर बाउंड्री बनाकर नहीं रखेंगे, तो इससे आपकी मेंटल हेल्थ पर भी बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए अपनी पर्सनल लाइफ और वर्क लाइफ के बीच बाउंड्री बनाकर रखें। काम के वक्त आप पर्सनल-लाइफ से दूरी बनाए रखें और फैमिली टाइम के वक्त वर्क-लाइफ से दूरी बनाए रखें। हम सब भविष्य या करियर को लेकर हमेशा चिंतित रहते हैं। आप भी जानते हैं कि आजकल हर कोई अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षित सा महसूस करता है। इससे कारण लोग मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान रहते हैं। हर कोई इस बात को लेकर परेशान रहता है कि उन नौकरी उनके पास हमेशा रहेगी भी या नहीं।  

सरकार कामकाजी वर्ग के लिए सेफ्टी नॉर्म्स और साइकोलॉजिकल इश्यू को लेकर संतोषजनक  काम नहीं कर रही है। वर्क रिलेटेड डेथ जैसे ब्रेन हेमरेज हार्ट अटैक, एम्यूनिटी खराब, नींद खराब होने से रोकने के लिए क्या भारत भी जापान की तरह करोशी एक्ट लागू करेगी? कुलमिलाकर वर्क प्रेशर को मैनेज करने के लिए सरकारी के साथ साथ सामुदायिक स्तर पर पहल करने की जरुरत है साथ ही देश में काम के घंटों को प्रॉपर रेगुलेट करने की जरुरत हैं।

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(लेखक एचएलएम ग्रुप ऑफ इंस्टीटूशन  में संयुक्त निदेशक हैं )

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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