लंबी उम्र पाने के लिए क्या करें
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Longer Lifespan: इंसानों की हमेशा से दो सबसे बड़ी ख्वाहिशें रही हैं, शरीर स्वस्थ रहे और आयु लंबी हो। बड़े बुजुर्ग हमें आशीर्वाद भी दिया करते थे- सौ बरस जीयो, खुश रहो। लेकिन आज की हकीकत कुछ और ही कहती है। भागदौड़ भरी जिंदगी, वायु प्रदूषण, तनाव, जंक फूड्स और बिगड़ी लाइफस्टाइल ने हमारी औसत आयु को काफी कम कर दिया है। एक-दो दशक पहले तक जहां लोग 80-90 साल तक स्वस्थ रूप से जिया करते थे वहीं अब लोगों की औसत उम्र घटकर 60-70 रह गई है।
कई अध्ययन बताते हैं कि दुनिया के कई देशों में औसत जीवनकाल धीरे-धीरे घटता जा रहा है और यह हमारे लिए खतरे की घंटी है। एक हालिया रिपोर्ट में विशेषज्ञों की टीम ने बताया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के शतायु होने की संभावना लगभग पांच गुना अधिक होती है, यानी की महिलाएं 100 साल के उम्र की सीमा को आसानी से पार कर सकती हैं।
इंग्लैंड में हुए इस सर्वे में पाया गया कि यहां महिलाएं अधिक जी रही हैं। जब इसके कारणों का पता लगाया गया तो कई ऐसी रोचक बातें सामने आईं जिनपर अगर हम सब भी ध्यान दे लें तो 100 साल जीना इतना भी मुश्किल नहीं है।
महिलाओं के 100 साल जीने की संभावना अधिक
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पुरुषों की तुलना में लंबे समय तक जीती हैं महिलाएं
आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 में इंग्लैंड और वेल्स में करीब 12,500 महिलाएं 100 साल जीवित रहने के मील के पत्थर तक पहुंचीं। इसके विपरीत, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (ओएनएस) के आंकड़ों के अनुसार, दोनों देशों में लगभग 2,800 पुरुष ही 100 साल की उम्र तक पहुंच पाए।
कई अन्य पश्चिमी देशों में किए गए सर्वे के परिणाम भी इसी से मिलते जुलते देखे गए। जब शोधकर्ताओं ने इसके कारणों को समझने की कोशिश की तो पाया कि पुरुषों में ऐतिहासिक रूप से धूम्रपान और शराब पीने का स्तर अधिक रहा है जो न सिर्फ कई प्रकार की बीमारियों का प्रमुख कारण है बल्कि समय से पहले मृत्यु के खतरे को भी बढ़ा देता है। यही वजह है कि महिलाएं वर्तमान में पुरुषों से अधिक जीवित रह रही हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
रिपोर्ट से पता चलता है कि ब्रिटेन में मौत का कारण बनने वाले दो सबसे बड़े रोग- हृदय रोग और कैंसर की घटनाएं महिलाओं में तो अधिक हो रही हैं पर पुरुषों की तुलना में इनका इलाज अधिक प्रभावी ढंग से किया जाता है, जिसके कारण महिलाएं अधिक समय तक जीती हैं। साथ ही महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली पुरुषों की तुलना में अधिक मजबूत होती है और वृद्ध पुरुषों की तुलना में उनमें संक्रमणों के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता देखी गई है।
ये है पुरुषों के कम जीने की वजह
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में क्लिनिकल डेटा साइंस के विशेषज्ञ और हृदय रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर अमिताव बनर्जी कहते हैं पुरुषों के कम जीने का एक बड़ा कारण है धूम्रपान और शराब पीने की अधिक आदत। हम शायद इसके इस पीढ़ी पर गंभीर प्रभाव देख रहे हैं।
जनसंख्या के स्तर पर, चूंकि सबसे बड़ी जानलेवा समस्या कैंसर और हृदय रोग है। या तो महिलाओं को ये कम हो रहे हैं या उनकी बीमारी का बेहतर इलाज हो रहा है। दिल के दौरे से होने वाली मृत्यु दर में भी काफी बदलाव आया है और अब लोगों के बचने की संभावना ज्यादा है।
100 साल की लंबी उम्र कैसे प्राप्त की जाए?
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जड़ों तक लौटना लंबी उम्र पाने के लिए जरूरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, हम अभी भी लंबी उम्र जीने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, लेकिन हमें यह पूछना चाहिए कि क्या 100 साल के लोगों की निर्भरता के स्तर में लिंग-भेद है। ओएनएस के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल अनुमानित 15,330 शतायु लोग जीवित थे, जो 2023 में 14,800 से 4 प्रतिशत अधिक है।
जरा सोचिए, हमारे पूर्वज बिना आधुनिक दवाओं के भी लंबा जीवन जी लेते थे। वजह थी उनकी सादी दिनचर्या, पौष्टिक खाना, शारीरिक श्रम और प्रकृति के साथ जुड़ाव। आज हमारे पास आधुनिक तकनीक, सुपरफूड्स और दवाओं का खजाना है, फिर भी लाइफस्पैन घट रहा है।
इसका मतलब है कि असली समस्या सिर्फ दवाओं या सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि हमारी सोच और जीवनशैली में छिपी है।
आहार में सुधार करने से क्या लाभ हैं?
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लाइफस्टाइल में सुधार से लंबी आयु पाना संभव
विशेषज्ञ कहते हैं, यदि हम रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों को सुधार लें– जैसे समय पर सोना, सही आहार लेना, तनाव को काबू करना और शरीर को सक्रिय रखना, तो इससे न सिर्फ औसत उम्र बढ़ सकती है, बल्कि जिंदगी भी ज्यादा स्वस्थ और आनंदमयी हो सकती है।
असल में, लंबी उम्र का राज किसी जादुई दवा में नहीं, बल्कि हमारी दिनचर्या और नजरिए में छिपा है।
तो सवाल ये है कि क्या हम सौ साल जीने की इस पुरानी ख्वाहिश को फिर से सच कर सकते हैं? जवाब है हां, बशर्ते हम अपनी आदतों को बदलकर शरीर और मन, दोनों को स्वस्थ रखने की दिशा में ईमानदारी से कदम बढ़ाएं।
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स्रोत
Differences across the lifespan between females and males in the top 20 causes of disease burden globally: a systematic analysis of the Global Burden of Disease Study 2021
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