दावा किया गया है कि जिन बच्चों को मां का दूध पहले घंटे में मिलता है वो तुलनात्मक रूप से ज़्यादा स्वस्थ रहते हैं और उन्हें कई तरह के संक्रमण से भी सुरक्षा मिलती है। मां और बच्चे का यह संपर्क ब्रेस्टमिल्क प्रोडक्शन के लिहाज से भी जरूरी है। इस पहले संपर्क से ही कोलोस्ट्रम बनने में भी मदद मिलती है।
साइंसडेली के अनुसार, कोलोस्ट्रम को पहला दूध भी कहते हैं। मां बनने के बाद कुछ दिनों तक कोलोस्ट्रम ही प्रोड्यूस होता है। कोलोस्ट्रम गाढ़ा, चिपचिपा और पीलापन लिए हुए होता है। कोलोस्ट्रम कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, एंटी-बॉडीज का खजाना होता है। इसमें फैट बहुत कम होता है, इस लिहाज से बच्चा इसे आसानी से पचा भी लेता है। बच्चे के पहले स्टूल (मेकोनियम) के लिए भी ये जरूरी है।
रिपोर्ट के अनुसार, मां के पहले दूध को बच्चे के पहले वैक्सीन के तौर पर भी माना जाता है। यूनिसेफ ने 76 देशों में अध्ययन के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है। इसके अनुसार, पूर्वी और दक्षिणी अफ़्रीका में ब्रेस्टफीडिंग को लेकर सबसे अधिक जागरुकता (65 फ़ीसदी) है जबकि पूर्वी एशिया में सबसे कम (32 प्रतिशत)। 76 देशों की इस सूची में भारत 56वें नंबर पर है जबकि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान 75वें पर। श्रीलंका इस क्रम में पहले नंबर पर है।
रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि सी-सेक्शन यानी ऑपरेशन से होने वाली डिलीवरी में तेजी आने की वजह से भी कई बार मां, बच्चे को एक घंटे के भीतर दूध नहीं पिला पाती। साल 2017 के आकड़ों के आधार पर पाया गया है कि दुनिया भर में सी-सेक्शन के मामलों में 20 फीसदी की वृद्धि हुई है। मिस्र का उदाहरण देते हुए इसके प्रभाव को समझाने की कोशिश की गई है। यहां सी-सेक्शन से पैदा सिर्फ़ 19 फीसदी बच्चों को ही पहले घंटे में मां का दूध मिला जबकि नॉर्मल डिलीवरी से पैदा हुए 39 फीसदी बच्चों को एक घंटे के भीतर मां का दूध मिल गया।
सी-सेक्शन के अलावा एक और भी बहुत बड़ी वजह है जिसके चलते बच्चे को पहले घंटे में मां का दूध नहीं मिल पाता। रिपोर्ट में संबंधित देशों की सरकारों से आग्रह किया गया है कि वे नवजात बच्चों के लिए तैयार फॉर्मूले और दूसरे उत्पादों के बाज़ारीकरण के खिलाफ़ सख़्त कानूनी प्रक्रिया अपनाएं ताकि पहले घंटे में मां के दूध का ही विकल्प प्राथमिकता रहे।
लेकिन क्या कहना है भारतीय महिलाओं का?
यूनिसेफ की इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए हमनें बीबीसी के फेसबुक ग्रुप लेडीज कोच पर महिलाओं से उनके अनुभव साझा करने को कहा। ज़्यादातर महिलाओं का मानना है कि मां, बच्चे को पहले घंटे में दूध पिला पाएगी या नहीं ये बहुत हद तक अस्पताल, डॉक्टर, नर्स और उस वक़्त मौजूद लोगों पर निर्भर करता है।
अनुमेधा प्रसाद का कहना है कि कुछ बातों को भारत के ज़्यादातर अस्पतालों में तवज्जो नहीं दी जाती है जबकि विकसित देशों में बच्चे के पैदा होते ही उसे उसी तरह मां को दे दिया जाता है। इसके बाद कहीं जाकर नाल काटी जाती है और साफ-सफाई की जाती है। वहां और यहां में ये बड़ा अंतर है।
बतौर अनुमेधा "ज़्यादातर लोग ऐसा मानते हैं कि बच्चों को जन्म के तुरंत बाद स्तन से लगाते ही दूध आता नहीं है। लेकिन बच्चे को छाती से सिर्फ दूध पिलाने के लिए नहीं लगाया जाता, ये भावनात्मक लगाव के लिए भी जरूरी है।"
अनुमेधा के दोनों बच्चों की डिलीवरी नॉर्मल हुई थी। वो बताती हैं कि उनके पिता डॉक्टर हैं इसलिए उन्हें पहले से ही पता था कि मां का पहला दूध एक घंटे के भीतर देना जरूरी होता है।
वहीं दिप्ति दुबे भी उन मांओं में से हैं जिन्हें ये पता था कि बच्चे के जन्म के एक घंटे के भीतर बच्चे को दूध पिलाना जरूरी है। उन्होंने भी अपने बच्चे को जन्म के तुरंत बाद स्तनपान कराया था। अनुमेधा से अलग खदीजा के दोनों बच्चे सी-सेक्शन से हुए। खदीजा के अनुसार, "सी-सेक्शन में चुनौती तो होती है लेकिन जब ये पता हो कि बच्चे को कैसे ब्रेस्टफीड कराना है तो ज़्यादा परेशानी नहीं होती।"
खदीजा के एक बच्चे का जन्म लंदन में हुआ।जहां उन्हें डॉक्टरों ने ये बता दिया था कि क्योंकि उन्हें स्टिचेज हैं तो बैठने की जरूरत नहीं वो लेटे-लेटे भी बच्चे को दूध पिला सकती हैं। वो कहती हैं "मैंने अपने बच्चे को आधे घंटे के भीतर फीड कराना शुरू कर दिया था। लेकिन वहीं जब मेरी पहली डिलीवरी दिल्ली में हुई थी तो मुझे डॉक्टरों की पूरी मदद नहीं मिली थी। मेरी बच्ची भी मुझे दो दिन बाद मिली थी। मेरे टांके में दर्द हो रहा था। ऐसे में मैं अपनी बेटी को पहला दूध नहीं पिला सकी थी।"
खदीजा मानती हैं कि सही जानकारी हो तो सी-सेक्शन में भी बच्चे को दूध पिलाया जा सकता है लेकिन कई बार जानकारी के अभाव में बच्चा इससे अछूता रह जाता है।
लेकिन मां का पहला दूध इतना जरूरी है क्यों?
दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाले बच्चों के डॉक्टर डॉ. दिनेश सिंघल का कहना है इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मां का दूध बच्चे के लिए बहुत जरूरी है.डॉ. सिंघल के मुताबिक, "सबसे अच्छा तो यही होता है कि बच्चे को जन्म के फ़ौरन बाद मां का दूध मिले लेकिन अगर किसी वजह से बच्चा दूध नहीं पी पा रहा है तो सक्शन पंप से दूध निकालकर ड्रिप से पिलाया जा सकता है। इसके अलावा अगर मां ही दूध पिलाने में अक्षम है तो बच्चे को फॉर्मूला मिल्क देना ही विकल्प रह जाता है।"
रिपोर्ट में भी इस बात का जिक्र है। रिपोर्ट के मुताबिक, "बहुत से देशों में लोग बच्चे को मां का पहला दूध देने के बजाय शहद, चीनी का पानी और फॉर्मुला मिल्क देना सही समझते हैं लेकिन इससे बच्चे और मां के बीच संपर्क बनने में देर हो जाती है।"
डॉ. सिंघल मानते हैं कि मां का दूध जिंदगी भर बच्चे को बीमारियों से बचाएगा ये पूरी तरह से सही नहीं है लेकिन जन्म के बाद बच्चे को कई तरह के संक्रमण होने का डर होता है, ऐसे में मां का ही दूध दिया जाना चाहिए। वो मानते हैं कि इस बात की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए कि बच्चे को मां का पहला दूध मिल जाए क्योंकि ऐसा नहीं होने पर बच्चे को पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाती है।
डॉ. सिंघल का कहना है कि कई बार ऐसा भी होता है कि बच्चे को अगर मां के दूध के अलावा कोई और दूध दिया जाए तो बच्चा मां के दूध से रीलेट नहीं कर पाता और स्तनपान ही नहीं करता। ये स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है। पूरी दुनिया में एक अगस्त से लेकर 7 अगस्त तक वर्ल्ड ब्रेस्टफीडिंग वीक मनाया जाता है।