प्रजनन संबंधित समस्याएं और आईवीएफ की जरूरत
विशेषज्ञ बताते हैं कि पुरुषों में शुक्राणुओं की गुणवत्ता और संख्या में कमी, हार्मोनल गड़बड़ियां और अस्वस्थ जीवनशैली प्रजनन की समस्याएं बढ़ा रही हैं। यानी संतान प्राप्ति में आने वाली दिक्कत एक साझा स्वास्थ्य मुद्दा है, जिसे केवल किसी एक पक्ष से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
भारत में प्रजनन संबंधी चुनौतियों पर गंभीर चर्चा की जरूरत पहले से कहीं अधिक है। समय पर जांच, स्वस्थ जीवनशैली, सही पोषण, नियमित व्यायाम और विशेषज्ञ की सलाह कई मामलों में जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।
प्रजनन संबंधित समस्याओं और आईवीएफ के बारे में अमर उजाला से बातचीत में
आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ गौरी अग्रवाल ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं। किन कपल्स को आईवीएफ की जरूरत है, कब इसके लिए आपको जाना चाहिए? डॉ गौरी ने सरल तरीके से सभी सवालों के जवाब दिए हैं।
पहले नेचुरल प्रेग्नेंसी को जानना जरूरी
डॉ गौरी बताती हैं, सामान्य रूप से हर महीने महिला के शरीर में एक अंडा फूटता है। यौन संबंध के दौरान जब स्पर्म रिलीज होता है, तो ये स्पर्म गर्भाशय से होकर उस ट्यूब तक पहुंचता है जहां अंडा पहले से मौजूद होता है। वहीं पर शुक्राणु और अंडा मिलकर बच्चे का निर्माण करते हैं।
- पांच दिन बाद ये ट्यूब बच्चे को गर्भाशय में डाल देता है जहां 9 महीने तक बच्चा बढ़ता रहता है।
- अगर किसी महिला के ट्यूब ब्लॉक हैं, अंडे कम बन रहे हैं, शुक्राणु कम (10 मिलियन से कम) हैं या फिर गर्भाशय में गांठ या कोई अन्य समस्या है, इन स्थितियों में सामान्य तौर पर गर्भधारण कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में आईवीएफ की जरूरत होती है।
आईवीएफ में होता क्या है?
आईवीएफ में 10-12 दिन तक हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं। इन इंजेक्शन से दोनों अंडाकोष में अंडे बनते हैं। हालांकि अंडे बनने की प्रक्रिया आपकी कई शारीरिक स्थितियों पर निर्भर करती है।
- अगर महिला में अंडे बन रहे हैं तो इसे एक प्रक्रिया द्वारा बाहर निकालकर लैब में स्पर्म के साथ मिलाया जाता है। इससे भ्रूण तैयार होता है।
- 3-4 दिन के भीतर इस भ्रूण को गर्भाशय में स्थापित कर दिया जाता है।
- अगर किसी महिला का गर्भाशय भ्रूण के लिए तैयार नहीं है तो फिर कुछ और प्रक्रियाएं की जाती हैं।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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