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Coronavirus: दोबारा कोरोना संक्रमण होने के क्या कारण हैं, वैक्सीन और हर्ड इम्यूनिटी के बाद भी रहेगा खतरा?

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Coronavirus Research - फोटो : iStock/Amar Ujala
हांगकांग में कोरोना वायरस के दोबारा संक्रमण के मामले ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। 33 वर्षीय युवक मार्च में पहली बार संक्रमित होने के बाद अगस्त में दोबारा कोरोना पॉजिटिव पाया गया। कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि दोबारा संक्रमण के मामले चीन, नीदरलैंड और बेल्जियम में भी सामने आ चुके हैं। भारत में तेलंगाना और गुजरात में भी ऐसे कुछेक मामले सामने आने की बात कही जा रही है। अहमदाबाद में भर्ती हांगकांग के ही एक मरीज को कोरोना ने दोबारा जद में लिया। हालांकि अभी भी बहुत सारे विशेषज्ञों का यही कहना है कि दोबारा संक्रमण के मामले दुर्लभ हैं। जानकारों के अनुसार, इस वायरस से जो पूरी तरह रिकवर नहीं हो पाते तो ऐसी स्थिति में उसके दोबारा संक्रमण होने की संभावना बनी रहती है। 
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कोरोना वायरस - फोटो : iStock
हांगकांग वाले मामले में साढ़े चार महीने के अंदर शख्स के शरीर में कोरोना वायरस के खिलाफ बनी एंटीबॉडी खत्म हो गई। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि 50 दिन के अंदर ही एंटीबॉडी खत्म हो सकती है। वहीं, मुंबई के जेजे अस्पताल में की गई एक स्टडी में पाया गया कि तीन से पांच हफ्ते पहले कोरोना पॉजिटिव हुए लोगों में से 90 फीसदी लोगों में महज 38.8 फीसदी एंटीबॉडी ही बची थी। अब सवाल यह है कि वैक्सीन से विकसित हुई एंटीबॉडी लोगों के शरीर में कितने दिनों तक रह पाएगी! या फिर टीकाकरण अभियानों से पैदा हुई हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति कबतक कोरोना से बचा पाएगी? 
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कोरोना वायरस (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : iStock
हांगकांग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता दोबारा संक्रमण वाले मामले पर अग्रेतर शोध में लगे हैं। इस केस में न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुरोध पर रिपोर्ट की समीक्षा करने वालीं येल यूनिवर्सिटी के इम्यूनोलॉजिस्ट यानी प्रतिरक्षाविद् अकीको इवासाकी का कहना है कि दूसरी बार हुआ संक्रमण एसिम्प्टोमैटिक था और उस शख्स के इम्यून रेस्पॉन्स यानी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया ने संक्रमण को बहुत गंभीर होने से रोक दिया। यह डॉक्यूमेंटेड यानी दस्तावेज में दर्ज उदाहरण जैसा है।

वैक्सीन के महत्व को रेखांकित करते हुए इवासाकी कहती हैं कि जिनमें लक्षण नहीं होते, वे भी संक्रमण फैला सकते हैं। वैक्सीनेशन के बाद इस संभावना पर तो विराम लगेगा। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक रूप से विकसित हुई इम्यूनिटी बीमारी को रोकती है, लेकिन दोबारा संक्रमण को भी किस हद तक रोकेगी, यह कह पाना थोड़ा मुश्किल है। 

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एंटीबॉडी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
इवासाकी ने कहा कि हर्ड इम्यूनिटी विकसित करने के लिए एक मजबूत, सुरक्षित और कारगर वैक्सीन की जरूरत पड़ेगी, जो बीमारी और दोबारा संक्रमण की संभावना, दोनों को रोके। 

अमेरिका और अन्य जगहों पर भी डॉक्टरों ने दोबारा संक्रमण के कई मामलों की सूचना दी थी, लेकिन उन मामलों की ठोस पुष्टि नहीं हुई। मरीज हफ्तों तक वायरस के पार्टिकल्स के वाहक हो सकते हैं और दोबारा संक्रमित होने अथवा करने की संभावना भी रखते हैं। हांगकांग यूनिवर्सिटी के सूक्ष्मजीव विज्ञानी केल्विन काई-वांग टू के मुताबिक, 33 वर्षीय शख्स का मामला दोबारा संकम्रण का ऐसा पहला केस है, जिसकी पुष्टि जीनोम सिक्वेंसिंग के आधार पर की गई है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हांगकांग के शोधकर्ताओं ने उस शख्स के दोनों बार संक्रमित होने का कारण कोरोना वायरस के अलग-अलग स्ट्रेन को बताया। क्लिनिकल इंफेक्शनल डिजीज नामक रिसर्च जर्नल में प्रकाशित होने वाले इस शोध के मुताबिक मार्च-अप्रैल में पाए गए वायरस का स्ट्रेन और शख्स को दोबारा संक्रमित करने वाले वायरस का स्ट्रेन बहुत अलग है। 

एंटीबॉडी की गारंटी कबतक?
विशेषज्ञों के मुताबिक, वायरस या बैक्टीरिया संक्रमण होने पर शरीर में एंटीबॉडीज बनती हैं। अलग-अलग बीमारियों में एंटीबॉडीज बनने का समय अलग-अलग होता है। कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद शरीर में वायरस से लड़ने के लिए विकसित होने वाली एंटीबॉडी ही वायरस को दोबारा लौटने से रोकती है। लेकिन इस एंटीबॉडी की भी वैधता होती है। 
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इम्यूनिटी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
अभी ये पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि एंटीबॉडी वायरस से कबतक बचाएगी! माना यह भी जा रहा है कि कोरोना वायरस के खिलाफ शरीर में बनी एंटीबॉडी कुछ महीने बाद कम होने लगते हैं। वहीं, भारत में हुई एक रिसर्च स्टडी के परिणाम भी चौंका रहे हैं। मुंबई के जेजे ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स में एंटीबॉडी से संबंधित हुई रिसर्च में अस्पताल के कुछ वैसे कर्मचारियों को भी शामिल किया था, जो कोरोना वायरस से ठीक हो चुके थे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
प्रमुख शोधकर्ता डॉ. निशांत कुमार का कहना है कि कुछ लोगों का आरटी-पीसीआर टेस्ट किया गया, लेकिन उनमें से किसी में भी एंटीबॉडी नहीं मिली।  शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग तीन से पांच हफ्ते पहले कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे, उनमें से 90 फीसदी लोगों में महज 38.8 फीसदी ही एंटीबॉडी शेष थी। शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि समय के साथ कोरोना के खिलाफ बनी एंटीबॉडी भी धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। दुनियाभर में हुए कुछ सर्वे के मुताबिक, संक्रमित होने के तीन हफ्ते बाद शरीर में सबसे ज्यादा एंटीबॉडीज होती हैं, लेकिन ये समय के साथ खत्म भी हो जाती हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हांगकांग के मामले पर भी अलग राय
हांगकांग में 33 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल युवक में दोबारा संक्रमण का मामला स्क्रीनिंग के बाद सामने आया। यूरोप से लौटने पर हांगकांग एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग के दौरान उसका पीसीआर टेस्ट हुआ तो जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई। मामला चौंकाने वाला इसलिए था क्योंकि वह साढ़े चार महीने पहले ही कोरोना से ठीक हो चुका था। 

कुछ विशेषज्ञों की राय है कि व्यक्ति की रिपोर्ट या तो गलती से पॉजिटिव आई है या फिर ये व्यक्ति उन लोगों में से एक है जिनमें वायरस का आरएनए कई महीनों तक रहता है। अमेरिका के एमोरी वैक्सीन सेंटर की प्रोफेसर सिंथिया डेरडेन का कहना है कि जो लोग कोरोना महामारी में जल्दी संक्रमित हो जाते हैं उन लोगों में ये चार से पांच महीने तक बना रह सकता है। इसी वजह से व्यक्ति फिर से संक्रमित हो सकता है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में ऐसे मामले और आएं। 

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Coronavirus Vaccine - फोटो : Pixabay/Amar Ujala
वैक्सीन और हर्ड इम्यूनिटी का असर
विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना वैक्सीन इंसानों के अंदर की इम्यूनिटी को बहुत ज्यादा बढ़ाएग और यह जो इम्यूनिटी है, वह कोरोना वायरस से ज्यादा ताकतवर हो जाएगी और लंबे समय तक मरीज को इस वायरस से बचाएगी। कोरोना वायरस से लोगों के बीच हर्ड इम्यूनिटी तभी विकसित होगी, जब या तो 60 फीसदी जनसंख्या संक्रमित हो जाए या फिर इम्यून हो जाए यानी 60 फीसदी आबादी का सुरक्षित टीकाकरण हो जाए। हालांकि 60 फीसदी के इस आंकड़े को लेकर भी अभी तक विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दुनिया में सिर्फ एक देश स्वीडन ही है, जो हर्ड इम्यूनिटी को लेकर प्रयोग पर काम कर रहा है। हालांकि मार्च में ब्रिटेन में भी कोरोना संक्रमण की लहर थी, तब ऐसा कहा जा रहा था कि हर्ड इम्यूनिटी विकसित होने के लिए सरकार लोगों को संक्रमित होने दे रही है। हालांकि आलोचनाओं के बाद ब्रिटिश सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया था। विशेषज्ञों के मुताबिक, हर्ड इम्यूनिटी के लिए आबादी को संक्रमित होने देना खतरनाक कदम साबित होता है।

...ज्यादा विस्तार से शोध अध्ययन की जरूरत
कोरोना वायरस का आनुवंशिक विश्लेषण करते हुए शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि हांगकांग का वह शख्स वायरस से अलग-अलग स्ट्रेन से संक्रमित हुआ है। यह भी एक कारण हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मत है कि दोबारा कोरोना संक्रमण होने और एंटीबॉडी की वैधता पर विस्तार से शोध अध्ययन की जरूरत है।

राम मनोहर लोहिया अस्पताल, नई दिल्ली के विशेषज्ञ डॉ. ए के वार्ष्णेय का कहना है कि इस एक मामले को लेकर चिंता की बात नहीं है। आकाशवाणी के एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, "कई बार ऐसा होता है कि वायरस अपना रूप बदल कर आता है। ऐसे में पहले वाली एंटीबॉडीज प्रभावी तौर पर अपना काम नहीं कर पातीं।"

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
उन्होंने कहा कि कोरोना की जांच नाक और मुंह से की जाती है, कई बार वायरस का प्रभाव फेफड़े में रह जाता है। ऐसे में बाद में वह प्रभावित कर सकता है। इसलिए एक मामले से नतीजे पर पहुंचना सही नहीं है। डॉ. वार्ष्णेय ने इस मामले पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की राय भी बताई। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, यह दुनिया का पहला मामला है, इसलिए अभी इसे लेकर बहुत ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि कई ऐसे मामले सामने आए हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हालांकि यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि पहले संक्रमण से पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद लोगों को दोबारा संक्रमण हुआ, या फिर उनके शरीर में पहले संक्रमण का वायरस मौजूद ही रह गया था। बड़ी संख्या में विशेषज्ञों का मत है कि इस विषय पर अभी और ज्यादा विस्तार से अध्ययन की जरूरत है। 

(नोट: यह रिपोर्ट कोरोना वायरस संबंधित कई शोध अध्ययन और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार की गई है। इस मामले में शोध जारी हैं, इसलिए इसे अंतिम परिणाम नहीं माना जा सकता।)

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