टाइप-1 डायबिटीज और इसका खतरा
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पहले टाइप-1 डायबिटीज के बारे में जान लीजिए
टाइप-1 डायबिटीज शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की गड़बड़ी से जुड़ी बीमारी है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम पैंक्रियाज (अग्नाशय) में मौजूद इंसुलिन बनाने वाले बीटा-सेल्स पर हमला कर देता है। इंसुलिन ही वह हार्मोन है जो शरीर में शुगर को ऊर्जा में बदलता है। इम्यून सिस्टम की इस प्रतिक्रिया के कारण जब इंसुलिन नहीं बन पाता तो खून में शुगर बढ़ने लगती है और यही डायबिटीज का कारण बनती है।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) और कई मेडिकल जर्नल्स के अध्ययन बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में टाइप-1 डायबिटीज का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। यह चिंता की बात इसलिए भी है क्योंकि इस प्रकार के डायबिटीज का कोई स्थायी इलाज नहीं है ये लाइलाज है, इसे केवल नियमित इंसुलिन थेरेपी और संतुलित जीवनशैली से कंट्रोल किया जा सकता है।
अब विषय पर वापस आते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि टाइप-1 डायबिटीज सालाना औसतन 2% से 5% की दर से बढ़ रही है। यह वृद्धि यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम सहित विभिन्न क्षेत्रों में देखी जा रही है। हालांकि एशिया और दक्षिण अमेरिका में यह अब भी कम है। इस वृद्धि के कारणों को पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है, लेकिन शोध आनुवंशिक प्रवृत्ति और पर्यावरणीय कारकों के संयोजन की ओर इशारा करते हैं।
बच्चों में डायबिटीज के मामले
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टाइप-1 डायबिटीज के बढ़ते मामलों के पीछे क्या कारण है?
विशेषज्ञ टाइप-1 डायबिटीज के मामलों में वृद्धि के लिए कुछ कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। आनुवंशिकी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किसे टाइप-1 डायबिटीज होगा। जिन लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है, उनमें कुछ पर्यावरणीय कारक जोखिमों को और भी बढ़ाने वाले हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, बचपन में होने वाले संक्रमण जैसे मम्प्स, रूबेला और इन्फ्लूएंजा बी, बचपन में मोटापा और एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग, विटामिन-डी की कमी की स्थिति प्रतिरक्षा प्रणाली को अतिसक्रिय कर सकती है जिसके कारण कई बार इम्यून सिस्टम शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी क्षति पहुंचाने लगता है।
(ये फ्री वाला उपाय डायबिटीज हो या कोलेस्ट्रॉल सभी में लाभकारी)
डायबिटीज के जोखिम कारक और इसका खतरा
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों का कहना है कि हम इतिहास में टाइप-1 डायबिटीज के उपचार के सबसे आशाजनक युग में हैं, जिसमें नई दवाएं हैं जो बीमारी के बढ़ने की गति को धीमा करती हैं, उन्नत इंसुलिन प्रणाली है जिससे रोगियों को गंभीर जोखिमों से बचाया जा सकता है। हालांकि जिस तरह से इस रोग के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है वो चिंताजनक है। जिन बच्चों में इसका पता चल रहा है उन्हें नियमित रूप से इसपर विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है।
वेंडी नोवाक डायबिटीज इंस्टीट्यूट के बाल रोग विशेषज्ञ कुपर ए. विंटरगेर्स्ट कहते हैं, पहले की तुलना में टाइप-1 डायबिटीज के रोगी बेहतर जीवन गुणवत्ता के साथ लंबा जीवन जी रहे हैं, हालांकि हर साल बढ़ते डायबिटीज के मामले स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव भी बढ़ाते जा रहे हैं।
टाइप-1 डायबिटीज में हमेशा लेना पड़ता है इंसुलिन इंजेक्शन
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जागरूकता और बचाव के उपाय जरूरी
इंडियाना स्थित पार्कव्यू एंडोक्राइनोलॉजी में मेडिकल एक्सपर्ट एलेक्जेंड्रा डी लेलिस कहती हैं, टाइप-1 रोगियों में
इंसुलिन रेजिस्टेंस एक बड़ी भूमिका निभाता है।
डॉक्टर कहते हैं टाइप-1 डायबिटीज के कारण धमनियों में संकुचन (एथेरोस्क्लेरोसिस) दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा हो सकता है। इसके अलावा आंखों, तंत्रिकाओं और किडनी आदि पर भी इसका प्रभाव पड़ता है इसलिए जरूरी है कि सभी लोग इन जोखिमों को जानें और लक्षणों की समय पर पहचान करें। अगर वैश्विक स्तर पर डायबिटीज को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए तो संभव है कि हम आने वाले वर्षों में टाइप-1 डायबिटीज के बढ़ते ग्राफ को कंट्रोल कर सकें।
(ये भी पढ़िए- शरीर को धीरे-धीरे खोखला बना देती है इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति)
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स्रोत
Global, regional, and national burden of type 1 diabetes in adolescents and young adults
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